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नंदिनी सुंदर को बस्तर से दूर रखने की साजिश?

शिरीष खरे | Updated on: 9 November 2016, 7:29 IST
(मलिक/कैच न्यूज़)

छत्तीसगढ़ के माओवाद प्रभावित सुकमा जिले के नामा गांव में एक आदिवासी की हत्या के आरोप में दिल्ली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद, दिल्ली के जोशी अधिकार संस्थान के विनीत तिवारी और भाकपा के प्रदेश सचिव संजय पराते सहित मंजू कवासी तथा मंगल राम कर्मा पर हत्या का मामला दर्ज किया गया है.

सुकमा के एएसपी जितेन्द्र शुक्ला ने कैच को बताया, 'नंदनी सुंदर सहित छह लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 120बी, 302, 147, 148, 149, 452 और 25, 27 आर्म्स एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की है.'

यह घटना शुक्रवार, चार नवंबर की रात की है. दरभा क्षेत्र के अंतर्गत कुमाकोलंग पंचायत में आने वाले नामा गांव के आदिवासी सामनाथ बघेल की हत्या संदिग्ध माओवादियों ने कर दी थी.

बताया जाता है कि रविवार को पुलिस समर्थित संगठन अग्नि की अगुवाई में ग्रामीणों ने दरभा ब्लॉक के तोंगपाल में इस हत्या के खिलाफ प्रदर्शन किया और नंदिनी सुंदर सहित कई मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हत्या का मुकदमा दर्ज करके उनकी गिरफ्तारी की मांग की थी. एक आमसभा में अग्नि की ओर से फारुख अली और पी विजय ने इन कार्यर्ताओं की गिरफ्तारी की मांग की थी. अग्नि का आरोप है कि बघेल की हत्या में दिल्ली निवासी दिल्ली यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर का हाथ है.

नंदिनी सुंदर की प्रतिक्रिया

इस हत्या पर अपनी प्रतिक्रिया में नंदिनी सुंदर ने एक वाट्स-ऐप ग्रुप में लिखा था, 'जिसका अंदेशा था, वहीं हुआ. हमने पहले ही कहा था कि पुलिस बेकसूर, निहत्थे और कमजोर ग्रामीणों को माओवादियों से लड़ाने के लिए मोहरा बना रही है, जबकि पुलिस को खुद ग्रामीणों की सुरक्षा करनी थी.' उन्होंने कहा कि आईजी कल्लूरी के दिमाग में कोई बड़ी साजिश चल रही है.

इसी प्रकरण में आरोपी बनाए गए एक अन्य कार्यकर्ता विनीत तिवारी ने कैच को बताया, 'मेरे खिलाफ राजनीतिक साजिश के तहत मामला दर्ज किया गया है, क्योंकि हमने अपनी रिपोर्ट के शोध निष्कर्ष में बस्तर की हिंसा के लिए पुलिस, सरकार और माओवादियों को जिम्मेदार बताया था. हमने एक सामान्य बात कही थी कि माओवादियों और पुलिस के संघर्ष में आदिवासी पिस रहा है.'

इस मामले में आरोपी बनाए गए भाकपा के प्रदेश सचिव संजय पराते कहते हैं, 'जो बस्तर में शांति के पक्ष में बात करना चाहता है, पुलिस सरकार के इशारे पर उनके खिलाफ साजिश कर रही है.'

बस्तर जोन के आईजी एसआरपी कल्लूरी का कहना है कि नामा गांव के ग्रामीणों की शिकायत पर नंदनी सुंदर सहित बाकी लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है. गौरतलब है कि नंदनी सुंदर और बाकी लोगों के खिलाफ नामा गांव के डोमू राम, राम कुमार, सन्नू राम, नकुल बघेल और वागा सहित कुछ ग्रामीणों ने अपने हस्ताक्षर वाला एक ज्ञापन भेजा था.

संस्था अग्नि की तहरीर पर मुक़दमा

पुलिस समर्थित अग्नि संस्था के संयोजक आनंद मोहन मिश्रा बताते हैं, 'सामनाथ बघेल दरभा इलाके के प्रमुख आदिवासी नेता थे. उन्होंने टंगिया समूह बनाकर सैकड़ों युवाओं को माओवादियों के खिलाफ लामबंद किया था.' एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि सामनाथ बघेल ने कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर नंदनी सुंदर और कुछ अन्य लोगों खिलाफ एक शिकायत भी दर्ज कराई थी. इसमें ग्रामीणों को पुलिस के खिलाफ भड़काने का आरोप लगाया था.

दरअसल, इस वर्ष 12 से 16 मई को नंदिनी सुंदर के साथ एक प्रतिनिधिमंडल ने बीजापुर, सुकमा, बस्तर और कांकेर जिला का दौरा किया था. दौरे का मकसद माओवाद प्रभावित क्षेत्र में ग्रामीणों की स्थितियों का जायजा लेना बताया गया था. प्रतिनिधि मंडल ने अपने शोध-निष्कर्ष में राज्य और केंद्र सरकार के साथ न्यायपालिका से बस्तर में शांति स्थापित करने के लिए अपील की थी. साथ ही माओवादियों को यह संदेश भी दिया था कि वे विकास कार्यों की अनुमति दें और मुखबिरी के आरोप में लोगों की हत्याएं बंद करें.

नामा गांव के कुछ ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि नंदिनी सुंदर ने उनके गांव में घुसने के लिए 'ऋचा केशव' के छद्म नाम का सहारा लिया. साथ ही माओवादियों के साथ बैठक करके उन्हें हिंसा के लिए उकसाया.

नंदिनी का काम आदिवासियों पर

इस बारे में नंदिनी सुंदर का कहना है कि वे वहां बीते 25 वर्षों से जा रही हैं, उनकी पीएचडी बस्तर के ग्रामीण और उनकी समस्याओं पर है. उन्होंने बस्तर की स्थितियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में भी याचिकाएं दर्ज की हैं, इसलिए उन्हें बस्तर के इलाकों में घूमना पड़ता है.

उन्होंने कुछ दिनों पहले दिए बयान में साफ किया था कि वे ग्रामीणों का हाल-चाल पूछने सुकमा जिले के गांवों में गई थीं. उन्हें वहां सभी लोग नाम से जानते हैं, पुलिस को सही नाम बताने पर वह परेशान करती है इसलिए सही नाम नहीं बताया. उन्होंने यह भी कहा था कि उनके दौरे का मकसद यह जानना भी था कि मनरेगा के बाद इस तरह के इलाके में ग्रामीणों की जीवन शैली में क्या कोई सुधार हुआ है.

नंदिनी सुंदर बीते दो दशकों से अकादमिक शोध के कारण बस्तर आती रही हैं. उन्होंने हाल ही में बस्तर के माओवादी स्थितियों पर 'द बर्निंग फारेस्ट-इंडियाज वार इन बस्तर' नाम से किताब लिखी है. नंदनी सुंदर की याचिका पर ही माओवादियों के खिलाफ सरकारी संरक्षण में चलाया जाने वाले सलवा जुडूम को सुप्रीम कोर्ट ने अवैध घोषित किया था.

पिछले 29 अक्टूबर को उनकी एक याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को फटकार लगाते हुए बस्तर में शांति बहाली का सुझाव दिया था. तब सरकार की ओर से पेश महाधिवक्ता ने कहा था कि नंदिनी सुंदर जैसे लोगों को बस्तर से दूर रखने के निर्देश दिया जाना चाहिए. उनका मत था कि एेसे लोग सिर्फ आग सुलगाए रखना चाहते हैं. इस पर सुप्रीमकोर्ट का सीधा जवाब था कि यह समस्या को सुलझाने का कोई समाधान नहीं है. सुप्रीम कोर्ट में अब अगली सुनवाई 11 नंवबर, 2016 को है.

First published: 9 November 2016, 7:29 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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