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छत्तीसगढ़: धान तैयार है मगर कटाई के लिए कैश नहीं

शिरीष खरे | Updated on: 20 November 2016, 8:06 IST
(एएफ़पी )
QUICK PILL
  • धान का कटोरा कहे जाने वाले राज्य छत्तीसगढ़ के किसान दो साल सूखे की मार झेलने के बाद नोटबंदी का शिकार हो गए हैं. 
  • राज्य में तेज़ी से घट रहे किसानों के सामने सबसे बड़ा संकट अपनी तैयार फसल को कटवाना है जिसके लिए उन्हें हाथ में नकद की ज़रूरत है. 

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में प्रेमलाल यादव धान के किसान हैं. नई करेंसी नहीं होने के नाते उन्हें खेतों में काम करने वाले मजदूर नहीं मिल रहे हैं. वह कहते हैं अगर बहुत जल्द ही पैसों का इंतज़ाम नहीं हुआ तो धान बर्बाद हो जाएगा. फसल ख़राब होने की कल्पना भी डरावनी है मेरे लिए क्योंकि दो साल से लगातार सूखा पड़ रहा है और इस साल धान की फसल से पुराना कर्ज चुकता हो जाने की उम्मीद थी. धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ में ज्यादातर धान उत्पादकों का यही हाल है. प्रदेश में करीब 28 लाख धान उत्पादक हैं और अब उनपर नोटबंदी की मार पड़ गई है. 

यह स्थिति इसलिए और भयावह है क्योंकि जनगणना रिपोर्ट के मुताबिक बीते एक दशक में यहां किसानों की संख्या 12 फीसदी घट गई है. इस दौरान 70 प्रतिशत किसान खेतीहर मजदूर बन गए. कृषि विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसा औद्योगिकीकरण और खेती में बार-बार घाटे के कारण हुआ. प्रदेश में 70 प्रतिशत किसान आदिवासी समुदाय से हैं जो बीते दो वर्षों से सूखे की मार झेल रहे हैं.   

    

प्रेमलाल यादव पुराने नोटों को बदलवाने के लिए अपने गांव कौंदकरा से 20 किमी दूर महासमुंद आए हैं. लाइन में खड़े-खड़े वह ख़ुद से यही सवाल कर रहे हैं कि अगर कांउटर पर उनका नंबर आया भी तो उन्हें महज 2000 रुपए मिल पाएंगे. वे कहते हैं कि इतने कम रुपयों से तो काम नहीं चलने वाला. धान को काटने से लेकर उसे सोसाइटी में बेचने तक सारा काम बिना मजदूरों के संभव ही नहीं है. और मज़दूरों को बिना दिहाड़ी दिए नहीं जुटाया जा सकता.  

कौंदकारा गांव में राशन की दुकान चलाने वाले हेमंत साहू कहते हैं कि चावल, शक्कर और नमक के लिए 500 रुपए जमा कराने पड़ रहे हैं. 50 रुपए का सामान कोई ले रहा है तो 450 रुपए कैसे लौटाएं? उनके कार्ड में बकाया लिख रहे हैं, जिससे अगली बार उन्हें पैसे लौटाए जा सकें या उतने रुपए का राशन दिया जा सके. धमतरी जिले के दुगली में धान उत्पादकों ने बताया कि वह धान के बदले रोजमर्रा की चीजों को खरीद रहे हैं. ऐसे समय में उन्हें धान की सही कीमत नहीं मिल पा रही है.

सहकारी बैंकों में नहीं है सुविधा

सरकार ने प्राथमिक समितियों में समर्थन मूल्य पर धान खरीदने का इंतज़ाम किया है. धान बेचने के बाद सरकार किसानों को चेक तो देगी, लेकिन उससे उन्हें पैसे नहीं मिलेंगे. वजह यह है कि रिजर्व बैंकों ने जिला सहकारी बैंकों को 500 और 2,000 रुपए के नए नोट दिए ही नहीं हैं. इन जिला सहकारी बैंकों को 500 और 1,000 रुपए के पुराने नोट बदलने का अधिकार नहीं है. छत्तीसगढ़ में अपेक्स बैंक के चेयरमेन अशोक बजाज ने कैच को बताया, नोटबंदी के बाद पुराने नोटों की अदला-बदली और उन्हें जमा कराने से संबंधित कामों के लिए जिला सहकारी बैंकों को निर्देशित नहीं किया गया है. 

खर्च और रोजमर्रा की जरुरतों के लिए मजबूरी में किसानों को अपना धान 1,000 और 1,200 रुपए क्विंटल में दलालों और व्यापारियों को बेचना पड़ रहा है. नोटों के अदला-बदली के संकट की स्थिति शहरों के मुकाबले गांव में कहीं ज्यादा ख़राब है. कई आदिवासी और ग्रामीण इलाकों की स्थिति बहुत खराब बताई जा रही है. वे नोटों की अदला-बदली के लिए शहरों की ओर आ रहे हैं. 

राजधानी रायपुर के जयस्तंभ चौक स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया की कतार में खड़े अछोटी गांव के रतन सोनी बताते हैं कि वे अपने 500-500 के छह नोटों को बदलने के लिए आए हैं. उन्होंने बताया कि रायपुर से सटे नारधा, चेटवा, मुरंमुंदा, ओटेबंध, गोड़ी और मलपुरी गांवों के कई किसान पुराने नोटों की बदलने या उन्हें जमा कराने के लिए रायपुर आकर अपना पूरा दिन खराब कर रहे हैं.  

कहां से लाएं कैश?

खेतों में मजदूरी से लेकर सारे भुगतान कैश में होते हैं. मजदूरों के संकट और कटाई में लगने वाले कम वक्त की वजह से ज्यादातर धान उत्पादक हार्वेस्टर की मदद से धान कटाई करवाते है. पंजाब और हरियाणा से बड़ी संख्या में हारर्वेस्टर छत्तीसगढ़ में पहुंच गए हैं. कटाई करने वाले प्रति एकड़ 1,500 रुपए लेते हैं. मगर यह भुगतान चेक की बजाय नकदी में होता है. को-ऑपरेटिव बैंकों के खाते बंद हो चुके हैं. दुर्ग जिले के धान उत्पादक रिखीराम साहू बताते हैं, किसान खेती के सीजन से पहले नकदी को पहले ही निकालकर रख लेता है, ताकि वह खेती से जुड़े कुछ बेहद जरूरी कामों पर पैस खर्च कर सकें. हारर्वेस्टर के मालिक पंजाब और हरियाणा से आते हैं. इन्हें काम से पहले कुछ नकदी देना जरूरी होता है.   

फसल का कटना ज़रूरी

रिखीराम बताते हैं, कई गांवों में मजदूरों का संकट है. वजह है कि मजदूर पुराने नोटों को बदलवाने के लिए बैंकों के चक्कर लगा रहे हैं. फिर शादियों का सीजन भी चल रहा है. अर्ली वेराइटी के अलावा धान की मध्यम और देरी से पकने वाली किस्में भी पककर तैयार हो चुकी हैं.

इसलिए धान की बालियों में कीड़े लगने और बीजों के झड़ने की समस्या पैदा होने का खतरा है और तुरंत धान की कटाई करना किसानों की मजबूरी है. रायपुर, राजनांदगांव, महासमुंद, जांजगीर-चांपा, दुर्ग और बिलासपुर जैसे धान उत्पादक जिलों से बीते दिनों इसी तरह की ख़बरें आ रही हैं.   

सरकार ने इस वर्ष 15 नवंबर से समर्थन मूल्य पर धान की खरीदी करना शुरू कर दिया है. मगर धान उत्पादक अभी धान बेचने से बच रहे हैं. वजह है कि धान की राशि उन्हें को-ऑपरेटिव बैंकों से चेक के तौर पर मिलती है. इसलिए इसका पैसा तुरंत मिलता नहीं दिख रहा है. किसानों को अभी नकद राशि की जरुरत है क्योंकि सालभर का खर्च, उधारी का भुगतान वह धान को बेचकर ही करता है.

सस्ते में फसल बेचने की मजबूरी

छत्तीसगढ़ में सरकार ने पतले धान का समर्थन मूल्य 1,510 रुपए प्रति क्विंटल और मोटे धान का समर्थन मूलय 1,470 रुपए प्रति क्विंटल रखा है. फिलहाल किसानों के पास मोटा धान उपलब्ध है. सरकारी मंडी में इसे बेचने पर किसानों को प्रति एक किलो पर 14.70 रुपए मिलेंगे.

मगर वह अपनी जरुरतों को पूरा करने के लिए इसे 10 से 12 रुपए किलो में बेचने का मजबूर हैं. रायपुर से 25 किलोमीटर दूर अछोटी गांव के संता साहू कहते हैं, 'घाटे में अपनी फसल बेचना किसे पसंद हैं. जिंदा रहना है, इसलिए सस्ते में फसल बेच रहे हैं. हम पर कई तरह की आपदाएं आती रहती हैं. इस आपदा से पहली बार सामना हो रहा है.'

देखा जाए तो केंद्र सरकार ने किसानों को एक हफ्ते में 25 हजार रुपए का भुगतान करने की घोषणा की है. दूसरी तरफ, छत्तीसगढ़ में ज्यादातर किसानों ने जिला सहकारी बैंकों से कर्ज़ ले रखा है. वहां से आज की हालत में वे एक ढेला नहीं निकाल पाए हैं और कर्जदार किसानों को रुपए निकालने में परेशानी का सामना करना पड़ सकता है. इसलिए जांजगीर-चांपा की जयंती यादव का कहना है कि केंद्र सरकार की इस पहल से राज्य के ज्यादातर धान उत्पादकों को कोई खास मदद नहीं मिलेगी.

पहली बार नोटबंदी का संकट

कृषि मामलों के विशेषज्ञ डॉ. संकेत ठाकुर बताते हैं कि राज्य के गांवों में हाहाकार मचा हुआ है. किसी को धान उत्पादकों की चिंता नहीं है. फसल की कटाई और दूसरे खर्चों के लिए नकद राशि के लिए दर-दर भटक रहा धान उत्पादक मजबूरी में व्यापारियों को वाजिब कीमत से कम में अपनी धान बेच रहा है. जिला सहकारी बैंकों के खाते बंद हैं. ऐसे मुश्किल हालात से किसान पहली बार गुजर रहा है.

दूसरी तरफ, गांवों में सबसे बुरा हाल मजदूरों का है. उनकी तकलीफ यह है कि धान उत्पादकों के हाथों से 500 और 1000 के नोटों को लेने के बाद वे बुरे फंसेंगे. ज्यादातर मजदूर अभी भी सरकार की बैंकिंग व्यवस्था से दूर हैं. इसीलिए दुर्ग जिले के अहिवारा-बेरला रोड पर स्थित कई सब्जी बाड़ी में टमाटर और लोकी की तुड़ाई नहीं हो पा रही है. बाड़ी में लगीं सब्जियां सड़ रही हैं. दूसरे पौधों को इनसे नुकसान न पहुंचे, इसलिए फार्म हाउस के मालिक उन्हें सड़कों पर फेंकवा रहे हैं. यहां काम करने वाले एक मजदूर ने बताया, हमने पांच-छह दिनों में सैकडों क्विंटल टमाटर सड़क पर फेंक दिया.

First published: 20 November 2016, 8:06 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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