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नोटबंदी: छत्तीसगढ़ टिम्बर कारोबार पर भारी मार, 80 फीसदी तक गिरावट

शिरीष खरे | Updated on: 2 January 2017, 7:55 IST
(पत्रिका)

छत्तीसगढ़ में नोटबंदी की मार टिम्बर व्यवसाय पर इस हद तक पड़ी है कि उनकी कमर ही टूट गई है. यही वजह है कि टिम्बर व्यापारी अब नोटबंदी खिलाफ एक हो गए हैं और उन्होंने इस पर अपनी पीड़ा साझा की है. छत्तीसगढ़ राज्य टिम्बर मर्चेंट एसोसिएशन ने कहा कि नोटबंदी की मार टिम्बर व्यापारियों को झेलनी पड़ी है, जिससे वे लंबे समय तक उभर नहीं पाएंगे. 

एसोसिएशन के पदाधिकारियों से बातचीत में उन्होंने कैच को बताया कि नोटबंदी के बाद उनका कारोबार 80 फीसदी तक प्रभावित हुआ है. गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ जैसे वन संपदा से भरपूर राज्य में टिम्बर कारोबार बहुत सशक्त और फैला हुआ है और इससे आदिवासियों को बडी संख्या में रोजगार मिलता है.

दूसरी तरफ, नोटबंदी के बाद 50 दिनों के दौरान इस कारोबार का राज्य में असर देखें तो टिम्बर की बिक्री न के बराबर हो गई है. वहीं, यहां के व्यापारियों का कहना है कि अपने कारोबार को बचाए रखने के लिए उन्हें पैसा खर्च करना पड़ रहा है, लेकिन घाटा उठाना पड़ रहा है. 

आरा मिलों में कई कारीगर बेकार हो गए हैं, जबकि मिलों के अलावा खुद अपने पैरों पर खड़े छोटे बढ़ई के काम पर भी बहुत बुरा प्रभाव पड़ा है.

आरा मिलें ठप

इस बारे में कैच ने छत्तीसगढ़ राज्य टिम्बर एसोसिएशन के पदाधिकारियों के अलावा राज्य की राजधानी रायपुर के बढ़ई से भी बातचीत की और इस कारोबार पर पड़े असर को जानने की कोशिश की. रायपुर टिम्बर मर्चेंट एसोसिएशन के वाइस प्रेसिडेंट अमृत पटेल का कहना है कि अकेले रायपुर और उसके आसपास ही 300 से ज्यादा आरा मिलें हैं. मगर माल नहीं बिकने के कारण आरा मिलों में कामकाज ठप है. 

हालांकि, हम बिजली और कुछ मजदूरों की मजदूरी पर पैसा खर्च कर रहे हैं, लेकिन इस खर्च को वहन कर पाना मुश्किल है. 50 दिन से ज्यादा हो गए हैं, लेकिन बाजार और बैंक में नोटों की कमी है तो यह कारोबार ठीक कब होगा, यह सोचकर चिंतित हैं.

10,000 मजदूर खाली हाथ हो गए हैं, जिन्हें न मुआवजा मिलने वाला है और न ही राज्य सरकार से कोई राहत

पटेल ने बताया कि आरा मिलों द्वारा शासकीय काष्ठगार से ही टिम्बर की खरीदी की जाती है, लेकिन नोटबंदी के बाद से स्थानीय स्तर पर टिम्बर की बिक्री कम हो गई है.

वहीं, बढ़ई का काम करने वाले रायपुर के गुढ़ियारी बस्ती के अनिल कुमार का कहना है कि नोटबंदी के बाद से उन्हें पर्याप्त रोजगार नहीं मिल रहा है. बचत के पैसे से जिंदगी चल रही है, लेकिन परिवार का बोझ बढ़ गया है. नोटबंदी के पहले फर्नीचर, अलमारी, कुर्सी-टेबल, दरवाजा और खिड़की वगैरह बनाने का काम रोज मिल जाता था, लेकिन बीते 50 दिन में 20 दिन भी काम नहीं मिला. इसका असर उन्हें आगे भी पड़ेगा, क्योंकि उनकी बचत राशि खत्म हो जाएगी और आर्थिक तंगी बढ़ जाएगी. 

टिम्बर व्यवसाय से जुड़े लोगों के मुताबिक राज्य में 1,400 से ज्यादा आरा मिलें हैं. हर मिल में औसतन 800 मजदूर काम करते है. इस तरह, प्रदेश भर में कुल 1,400 मिलों से लगभग 10,000 मजदूरों की रोजी रोटी चलती है. मगर नोटबंदी के कारण उनके पास काम न के बराबर है. जाहिर है राज्य में सिर्फ 1,400 आरा मिल मालिक ही नहीं बल्कि लगभग 10,000 मजदूर भी खाली हाथ हो गए हैं, जिन्हें न मुआवजा मिलने वाला है और न ही राज्य सरकार से कोई राहत.

बिक्री 20 फ़ीसदी पर आई

टिम्बर कारोबारियों ने बताया कि 50 दिन पहले यानि नोटबंदी की घोषणा से पूर्व कई बड़े हाउसिंग प्रोजेक्ट में टिम्बर की मांग रहती थी. मगर इस तरह के बड़े और छोटे प्रोजेक्ट बंद होने से टिम्बर की बिक्री सिमटकर बमुश्किल 20 फीसदी रह गई है.

पटेल ने बताता कि टिम्बर कारोबार के होलसेल मार्केट पर भी नोटबंदी का असर पड़ रहा है. न सिर्फ छत्तीसगढ़ बल्कि अन्य राज्यों से भी टिम्बर की डिमांड काम आ रही है तो हमारी सप्लाई रुकी हुई है.

प्रदेश में टिम्बर व्यवसाय की समस्याओं को लेकर छत्तीसगढ़ राज्य टिम्बर मर्चेट एसोसिएशन ने 8 जनवरी, 2017 को एक बैठक बुलाई है. यह बैठक रायपुर के टिम्बर भवन में होगी, जिसमें 27 जिलों के आरा मिलों के मालिक भी आएंगे. बैठक में टिम्बर कारोबार पर नोटबंदी के अलावा इस कारोबार से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा होगी.

First published: 2 January 2017, 7:55 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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