Home » छत्तीसगढ़ » Is IG kalluri is scared of women activists
 

आईजी कल्लूरी को चुभती हैं बस्तर में काम करने वाली औरतें

राजकुमार सोनी | Updated on: 25 January 2017, 8:12 IST

1994 बैच के आईपीएस शिवराम कल्लूरी छत्तीसगढ़ पुलिस के सबसे बदनाम अफ़सरों में शुमार होते जा रहे हैं. जब वह सरगुजा में तैनात थे, तब सिर्फ एक महिला ने उनपर बलात्कार का आरोप लगाया था. मगर बस्तर में तैनाती के बाद ऐसी महिलाओं की संख्या बढ़ गई है जो आईजी कल्लुरी से आतंकित हैं. 

मानवाधिकार और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि खुद को माओवादियों का काल बताने वाले कल्लूरी स्त्री विरोधी रवैए के लिए कुख्यात हैं. उनके राज में ना सिर्फ़ पुलिसबल आदिवासी महिलाओं से बलात्कार कर रहे हैं बल्कि उन्हें हर तरह की यातना का शिकार बनाते हैं. 

इन कार्यकर्ताओं के आरोप में कितना दम है, यह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की तरफ़ से छत्तीसगढ़ पुलिस को भेजी गई हालिया नोटिस से पता चलता है. आयोग की एक जांच रिपोर्ट में पाया गया है कि अक्टूबर 2015 से 17 जनवरी 2016 के बीच बीजापुर, सुकमा और दंतेवाड़ा जिले में पुलिस और सुरक्षाबल के जवानों ने आदिवासी महिलाओं से रेप और यौन हिंसा की. 

40 में से कम से कम 16 आदिवासी महिलाएं रेप का शिकार हुई थीं. 

मानवाधिकार आयोग की टीम हाल ही में दूसरी बार बस्तर पहुंची थी. तब इस टीम के साथ सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया भी थीं. मगर मानवाधिकार टीम के लौटने के बाद बेला भाटिया पर हमला किया गया है और उनपर बस्तर छोड़ने का दबाव बनाया जा रहा है. 

घर खाली करने को मजबूर बेला

बेला भाटिया बस्तर के जगदलपुर के पंडरीपानी इलाके में एक किराए का मकान लेकर रहती है. बेला का कहना है कि बेगुनाह आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करने वालों को बस्तर में माओवादी क़रार दे दिया जाता है. 23 जनवरी को जब बेला अपने घर पर अकेली थीं, तब जीप और बाइक पर सवाल कुछ लोग उनके घर पहुंचे और बस्तर छोड़ने की धमकी दी. 

चश्मदीदों के मुताबिक बेला भाटिया पर हमला पुलिस की मौजूदगी में हुआ. पुलिस की मौजूदगी में ही हमलावरों ने बेला और उनके मकान मालिक के बीच काग़ज़ पर एक समझौता करवाया. इसके तहत बेला को 24 घंटे के भीतर वह घर खाली करना है. 

पुलिस का कहना है कि ग्रामीणों इस बात को लेकर नाराज़ हैं कि बेला माओवादियों का समर्थन करती है. वहीं बेला ने दावा किया है कि हमलावर पंडरीपानी के नहीं थे क्योंकि वह इलाके के लोगों को ढंग से पहचानती है.

शालिनी और ईशा के घर पर हमला

बस्तर में बार-बार महिलाएं ही निशाना बनाई जा रही हैं. जगदलपुर में रहकर आदिवासियों को कानूनी मदद मुहैया करवाने वाली वकील शालिनी गेरा और ईशा खंडेलवाल के घर भी 17 फरवरी 2016 को पुलिस और सामाजिक एकता मंच के सदस्यों ने छापामार कार्रवाई की थी. 

पुलिस ने इनके मकान मालिक प्रवीण बघेल को घर से उठा लिया था. मकान देने के लिए उन्हें थाने ले जाकर धमकाया गया. साथ ही, आगाह भी किया किसी महिला को घर किराए पर दिया तो जेल की हवा खानी पड़ेगी. इसके बाद ईशा और शालिनी को जगदलपुर शहर छोडऩा पड़ा. 

ईशा कहती है 'पुलिस आदिवासियों के साथ की जाने वाली ज्यादतियों पर लोगों को खामोश देखने की पक्षधर है. बस्तर की पुलिस गांवों के बुर्जुगों को खदेड़कर महिलाओं से रेपकर उनकी हत्या देती है. हम कानून-सम्मत तरीके से फर्जी मुठभेड़ और आदिवासियों की गिरफ्तारियों को चुनौती दे रहे थे. इसीलिए आईजी कल्लूरी ने हमें ही माओवादियों का मददगार क़रार देकर बस्तर छोडऩे के लिए मजबूर कर दिया गया है'. 

पत्रकार मालिनी पर हमला

पत्रकार मालिनी सुब्रमण्यम बताती हैं कि फरवरी 2016 के पहले हफ्ते से पुलिस उन्हें आदिवासियों की हिमायत नहीं करने की धमकी दे रही थी लेकिन जब वह नहीं मानीं तो उनके मकान मालिक और घर में काम करने वाली एक महिला को पुलिस ने हिरासत में लिया. मकान मालिक पर घर खाली करवाने का दबाव बनाया गया. मगर जब मालिनी ने मकान खाली नहीं किया तो एक रोज सामाजिक एकता मंच के सदस्यों ने उनके घर और कार पर हमला कर दिया. 

सोनी सोरी पर केमिकल अटैक

फरवरी 2016 को जब वकील ईशा खंडेलवाल और शालिनी गेरा पुलिसिया दबाव में मकान खाली कर रही थीं, तब सोनी सोरी उनसे मिलने घर पहुंची थीं. दोनों वकील एक बस में बैठकर रायपुर के लिए निकली ही थीं कि उन्हें खबर मिली कि रास्ते में कुछ लोगों ने सोरी पर केमिकल अटैक कर दिया है. 

सोरी कहती हैं कि हमले के मास्टर मांइड कल्लूरी हैं, इसलिए जांच नहीं हो सकती. बस्तर की औरतों में वहां की पुलिस का ख़ौफ़ बहुत है. हर बच्ची बस्तर पुलिस के चरित्र से डरती है. हालात इसलिए बिगड़ गए हैं क्योंकि पहले बस्तर की महिलाएं खामोशी से अत्याचार सह लेती थीं, लेकिन जबसे पुलिस उनके पति और जवान बच्चों को माओवादी बताकर मार रही हैं तब से वे बोलने लगी हैं. औरतों का मुंह खोलना पुलिस को रास नहीं आ रहा हैं. 

लंबी फेहरिस्त

बस्तर में आदिवासियों के हक की बात करने वाली महिलाओं पर प्रताडऩा की फेहरिस्त काफी लंबी है. पिछले साल दिल्ली की दो महिला प्रोफेसर नंदिनी सुंदर और अर्चना प्रसाद बस्तर पहुंची थीं तो पुलिस ने इनके दौरे पर सवालिया निशान लगाते हुए इन्हें माओवादी समर्थक करार दे दिया था. इनपर एक ग्रामीण की हत्या के आरोप में एफ़आईआर भी दर्ज हो गई थी. इसके बाद महिला प्रोफेसरों को सुप्रीम कोर्ट में गुहार लगानी पड़ी, तब जाकर उनकी गिरफ्तारी टल पाई. 

बस्तर के कोंटा इलाके के एक गांव गोमपाड़ की युवती मड़कम हिड़मे और नागलगुड़ा गांव की चार युवतियों के साथ रेप के बाद हत्या की घटना के चलते भी पुलिस की खूब किरकिरी हुई. पिछले साल 19 दिसम्बर को पीयूसीएल की बैठक में शिरकत करने वकी प्रियंका शुक्ला और निकिता अग्रवाल बिलासपुर गई थीं, लेकिन रास्ते में पुलिस की वर्दी में कुछ लोगों ने उन्हें रोका और उनकी तस्वीरें खींच ली. 

बाद में इन तस्वीरों को सोशल मीडिया में यह कहते हुए प्रचारित किया गया कि दिल्ली से जेएनयू के कुछ लोग माओवादियों से मेल मुलाकात के लिए बस्तर आए हुए हैं. इन दोनों अधिवक्ताओं को पुलिसिया दुर्व्यवहार का सामना तब भी करना पड़ा जब वे ग्रामीण की संदिग्ध मौत के बाद हाईकोर्ट के निर्देश पर बस्तर पहुंची थीं. 

नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंहदेव का आरोप है कि एक अफसर को दी गई ज्यादतियों की छूट के चलते सरकार भी अच्छे-बुरे और नैतिक-अनैतिक की परिभाषा भूल गई है. सरकार की इस भूल के चलते देश और दुनिया के बीच यह संदेश चला गया है कि छत्तीसगढ़ में महिलाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित हैं और बस्तर को पुलिसकर्मियों ने व्यभिचार के एक बड़े ठिकाने में बदल दिया है.  

पीयूसीएल की प्रदेश ईकाई के अध्यक्ष लाखन सिंह का कहना है कि कल्लूरी शासन के एक नुमाइंदे हैं लेकिन उनके कार्य-व्यवहार का प्रतिबिंब सरकार के चेहरे पर साफ-साफ दिखाई देता है. फिलहाल तो सरकार का चेहरा स्त्री विरोधी बनकर उभरा है. कल्लूरी बस्तर के उन भोले-भाले आदिवासियों से बदला ले रहे हैं जिन्होंने पिछले चुनाव में सरकार से किनारा कर लिया था.

First published: 25 January 2017, 8:12 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी