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शालिनी गेरा: उम्मीद करती हूं कि एनएचआरसी बस्तर पुलिस की मनमानी पर कार्रवाई करेगा

सुहास मुंशी | Updated on: 30 December 2016, 8:10 IST
(फाइल फोटो )

गैर सरकारी संस्था, जगदलपुर लीगल एड, बस्तर और उसके आसपास के इलाके के आदिवासियों को मुफ़्त कानूनी सेवाएं देती है. इसी के चलते संस्था की संस्थापिका एडवोकेट शालिनी गेरा ने 13 साल के एक बच्चे का मुकदमा हाथ में लिया है. इस बच्चे को पिछले दिनों नक्सल-विरोधी अभियान में सुरक्षा बलों द्वारा मार दिया गया था. इस मामले में गेरा को बस्तर-पुलिस का काफी विरोध झेलना पड़ा. इसी सिलसिले में उनसे लंबी बातचीत हुई.

बातचीत से 48 घंटे पहले उनके साथ जो हुआ, वह उन्हें बिलकुल हास्यास्पद लगता है. उन्हें बस्तर के बदनाम पुलिस विभाग से धमकी मिली. उन पर माओवादियों के लिए काले धन को वैध बनाने, स्थानीय लोगों को उकसाने और पुलिस के अत्याचार की कहानिया बनाने का आरोप है.

कुछ हफ्ते पहले ही स्थानीय पुलिस ने मशहूर प्रोफेसर नंदिनी सुंदर पर एक स्थानीय आदिवासी की हत्या का आरोप लगाया था और एफआईआर दर्ज की थी. बेला भाटिया और सोनी सोरी जैसी एक्टिविस्टों को बराबर परेशान किया गया. पुलिस विभाग या अग्नि और सामाजिक एकता मंच जैसे मोर्चों ने उन पर अक्सर हमले किए. इनकी शिकायत है कि उन्होंने सिर्फ मजबूरों की मदद की.

गेरा पर भी ऐसे हमले हुए. जब उन्हें लगातार परेशान किया गया, तो उन्हें जगदलपुर अपने घर भागना पड़ा. दो दिन पहले ही, हक़ीक़त जानने बस्तर आई वकीलों, छात्रों और एक पत्रकार की सात सदस्यीय टीम को स्थानीय पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया. आरोप था कि उन्होंने माओवादी बागियों को पुराने करेंसी नोट बदलवा कर दिए. उन्हें छतीसगढ़ पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत गैर जमानती वारंट जारी कर गिरफ्तार किया गया. वे अब जेल में हैं. पर इस इलाके में गेरा के साथ नक्सल-विरोधी सुरक्षा बलों की नाराजगी की खास वजह है. 

अब तक की कहानी

पिछले हफ्ते ही गेरा ने 13 साल के एक बच्चे का मामला अपने हाथ में लिया था. उस बच्चे पर 16 दिसंबर को राज्य के सुरक्षा बलों ने अत्याचार किया था और संगीनों की नोक से कोंच-कोंच कर मार डाला था. नक्सल विरोधी सुरक्षा बलों ने पिछले तीन महीनों में ऐसे काफी संख्या में लोगों को संदेहास्पद तरीके से मारा.

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट से गेरा ने लडक़े की दफनाई लाश को निकालने की अनुमति ली और पोस्टमार्टम करवाया. इस मामले पर कार्रवाई जल्दी शुरू हो सकती है.

कैच के साथ अपने इंटरव्यू में गेरा ने 48 घंटे से ज्यादा समय तक अपने साथ हुए उत्पीड़न को बयान किया. इसे पढ़कर आप समझ सकते हैं कि बस्तर में हो रही ज्यादतियों की पड़ताल और पूछताछ करने में रोजाना निजी तौर पर कितने जोखिमों का सामना करना पड़ता है.

सवाल-जवाब

आप का आरोप है कि सोमवार को आपके कमरे में पुलिस जबर्दस्ती घुस गई. एक दिन आपको न केवल वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने धमकी दी, बल्कि माओवादियों के लिए काले धन को वैध करने की शिकायत दर्ज की गई है. पिछले 48 घंटों में क्या हुआ? 

हम 13 साल के बच्चे का मामला देख रहे हैं. सोमवार को उसका पोस्टमार्टम पूरा हो गया था और गांव वाले 1 बजे के आसपास गांव लौट गए थे. अचानक शाम 7 बजे धर्मशाला में हमारे घर पर एक पुलिस अधिकारी के नेतृत्व में 7-10 पुलिस वालों की एक टुकड़ी आई. उन्होंने पूरी लीगल टीम को बाहर बुलाया. कहा कि उन्होंने हमें अनधिकृत तरीके से कमरे में रहते हुए ‘पकड़’ लिया है.

संदेहास्पद स्थितियों में पाए जाने का आरोप लगाते हुए इस पुलिस अधिकारी ने हमें पूछताछ के लिए पुलिस स्टेशन बुलाया. हमने यहां आने की हमारी वजह बताई और यह भी कहा कि हमने यहां रुकने की अनुमति कमिश्नर से ले ली थी. जब हमने यह सारी बात कमिश्नर को बताई, तो उन्होंने पुलिस अधिकारी से सीधे बात की, तब जाकर उन्होंने हमें छोड़ा. 

हालिया मामले में जनता की दिलचस्पी के कारण जगदलपुर में हमारी उस दिन की मौजूदगी काफी चर्चा में रही. और इस कारण यह नहीं माना जा सकता कि उनके साथ पुलिस का कठोर रवैया महज संयोग था.

फिर मंगलवार को मेरे पास अज्ञात नंबर से एक कॉल आया. उस शख्स ने खुद को बस्तर का पुलिस अधीक्षक बताया और कहा कि उन्हें मेरे विरुद्ध शिकायत मिली है और कुछ पूछना चाहते हैं. वे जानना चाहते थे कि क्या मैंने गांव वालों को आधार कार्ड के विरुद्ध उकसाया है. मैंने उनसे कहा कि मैंने ऐसा कुछ नहीं किया है. बाद में उन्होंने बहुत ही गुस्से में दावे के साथ कहा कि हम छोटे बच्चों के सामने पुलिस के अत्याचार की झूठी कहानियां फैला रहे हैं.

फिर उस शख्स ने मुझसे पूछा कि क्या बैठक में जेएनयू के छात्र थे. मैंने कहा कि जहां तक मुझे मालूम है, वहां जेएनयू का कोई छात्र नहीं था. हालांकि उन्होंने कहा कि उन्हें जानकारी है कि वहां जेएनयू के सात छात्र थे.

उन्होंने फिर मुझे बहुत ही तल्खी से पूछा कि मैं बार-बार बस्तर क्यों आ रही हूं. इन सवालों का उनके द्वारा की जा रही किसी भी तरह की ‘जांच’ से कोई सरोकार नहीं था. यह सब केवल मुझे डराने-धमकाने के मकसद से था.

उसके बाद फोन वाले उस शख़्स ने कहा कि उन्हें मेरे विरुद्ध लिखित शिकायत मिली है कि मैं कल गोयल धर्मशाला में थी. नक्सलियों के लिए पुराने नोट बदलवा रही थी. मैंने उन्हें इससे भी इनकार किया. मैंने कहा, मैं कल गोयल धर्मशाला में रहने के लिए बस्तर डिविजन के कमिश्नर द्वारा बाकायदा अधिकृत थी. छत्तीसगढ़ के माननीय हाईकोर्ट के आदेशों की पालना के लिए.

कॉल खत्म होने के बाद, मैंने ट्रू कॉलर पर उस नंबर को चेक किया, जो बस्तर के तथाकथित पुलिस अधीक्षक का था. पता चला कि वह किसी फारुख अली का है. आपको बता दूं, एक फारुख अली बस्तर के पुलिस समर्थित मोर्चे अग्नि से ताल्लुक रखते है. 

इस कॉल के बाद क्या आपने किसी पुलिस अधिकारी से बात की?

हां, मैंने बस्तर के पुलिस अधीक्षक के ऑफिशियल नंबर पर बात की. जब मैंने उन्हें बताया कि मैं शालिनी हूं, तो उन्होंने पूछा ‘कौन शालिनी’. मैंने फिर कहा, मैं ‘एडवोकेट शालिनी गेरा’. फिर भी बस्तर के पुलिस अधीक्षक ने जताया कि वे मुझे नहीं जान सके. फिर मैंने उन्हें मेरे खिलाफ दर्ज शिकायत की याद दिलाई. 

बस्तर के पुलिस अधीक्षक ने मुझे बहुत ही धृष्टता से बताया कि मेरे विरुद्ध शिकायत थी और उसी ने मुझे कॉल किया था, और इस तरह के कॉल्स करके मैं उनका समय नष्ट नहीं करूं.

इन कॉल्स के कुछ घंटों बाद, मुझे बताया गया कि उसी फारुख अली ने बस्तर के पुलिस अधीक्षक को किसी विनोद पांडेय की ओर से शिकायत की खबर पोस्ट की है. यह दावा करते हुए कि मैं जगदलपुर में गोयल धर्मशाला में नक्सलियों के नोट बदलवा रही थी.

यह बेहद आपत्तिजनक है कि बस्तर जिले का एक पुलिस अधीक्षक एक आम व्यक्ति से गोपनीय जानकारी साझा करे. फिर वह व्यक्ति बस्तर पुलिस से दुखी अन्य लोगों को बदनाम करने के लिए उसका उपयोग करता है.

सुरक्षा बलों को लेकर अपने विरोध के बारे में क्या कहेंगी?

जाहिर है यह एक्टिविस्टों, शिक्षकों और उनकी नीतियों की आलोचना के खिलाफ बस्तर पुलिस का रवैया है. यह उसी ट्रेंड का हिस्सा है. हमने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत की है और गंभीरता से उम्मीद करते हैं कि इस जुल्म के खिलाफ यह संस्था इस बार ठोस कदम उठाएगी और बस्तर पुलिस की मनमानी के विरुद्ध कार्रवाई करेगी.

First published: 30 December 2016, 8:10 IST
 
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