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रायगढ़: कभी पॉवर हब रहा फिलहाल घुट-घुट का मर रहा एक शहर

शिरीष खरे | Updated on: 13 January 2017, 8:14 IST
(शिरीष खरे/पत्रिका)

90 के दशक से पॉवर हब की पहचान बनाकर औद्योगिक विकास की बुलंदी पर पहुंची छत्तीसगढ़ की रायगढ़ नगरी अब औद्योगिक ढलान पर है. तीन साल पहले कोयला खदानें और पॉवर प्रोजेक्ट बंद होने के बाद इनमें काम कर रहे अधिकांश परिवारों के चूल्हे बुझ गए या बुझने वाले हैं. इनमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 60 हजार कामगारों को रोजगार मिला था. इनसे करीब ढाई लाख लोगों का पेट भरता था. 

रायगढ़, तमनार और इसके आसपास से यह आबादी धीरे-धीरे पलायन कर रही है. 'पावर हब' अब 'डाइंग सिटी' बनने की ओर बढ़ रहा है. तमनार और आसपास की रौनक गायब हो चुकी है. रायगढ़ के बाजार और बस्तियों में खालीपन सबको अखरने लगा है.

खैरपुर में पान चलाने वाले विजय ठाकुर बताते हैं कि वे तमनार की डोंगामहुआ खदान में 13 साल तक काम करते रहे. फिर एक दिन मेरे जैसे 5 हजार कर्मचारियों को अचानक निकाल दिया, खाने के लाले पड़ गए. तीन साल पहले कर्ज लेकर जिस जगह जमीन खरीदकर पान की दुकान खोली, अब वहां से भी आधी आबादी जा चुकी है. उस पर कर्ज बाकी है, जबकि आमदनी न के बराबर. उन्हें डर है कि अगर यह बस्ती भी खाली हो गई तो पूरा परिवार फिर दर-दर भटकेगा.

पॉवर की चमक के पीछे फैला अंधेरा

भगवानपुरा बस्ती के शिवचरण सिंह बताते हैं, 'मेरे 18 कमरों के मकान में अब सिर्फ 6 ही भरे हैं. तीन साल में आमदनी 25 हजार से 3 हजार रुपए महीने पर आ गई है. यहां साढ़े सात सौ में 400 मकान खाली हैं. शहर में ऐसी कई बस्तियां किराएदारों के दम पर चलती थीं, जिन्होंने कर्ज लेकर 20-20 कमरे तक बना लिए थे लेकिन अब पूरी बस्ती सूनी है.'

पहली बार यहां के मकान मालिक काम की तलाश में इधर से उधर भटक रहे हैं. सरायपाली रोड पर स्थापित एक स्टील प्लांट में छंटनी के बाद कई कर्मचारी किराए के मकानों को छोड़कर चले गए हैं. यही हाल खैरपुर, किरोड़ीमल और पतरापाली जैसी कई बस्तियों का भी है.

रायगढ़ से 60 किमी दूर डौंगामहुआ कोल खान के पास कंपनी के बड़े अधिकारियों की ऑलीशान कॉलोनी के सौ बंगलों में ताले लटके हैं, स्कूल, हेल्थ-सेंटर, दुकाने, सड़क और पार्क सूने हैं. पूरी कॉलोनी की सुरक्षा के लिए गार्ड के हवाले है. गार्ड वेदप्रकाश यादव ने बताया कि यहां से 500 लोगों की आबादी चली गई. इसके आसपास कुंजेमरा, लिबरा, धौराभाटा और हमीरपुर जैसे 25-30 गांव से मजदूर जा चुके हैं.

किसानों से ली जमीन बेकार

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6 कंपनियों को अपनी सैकड़ों एकड़ जमीन देने के बाद भी किसानों की जमीन पर निर्माण के लिए ईंट तक नहीं रखी जा सकी है. इनके पास न खेत हैं, न ही रोजगार. इससे जिले के पतरापाली, सियारपाली, कोटमार, भोजपुर खम्हार, भेंगारी, चिराईपानी और गेरवानी क्षेत्र प्रभावित हैं. खनन विभाग के मुताबिक यहां प्रस्तावित और बंद उद्योगों के पास किसानों की लगभग 750 हेक्टेयर जमीन है. इनमें जेएसडब्ल्यू, टॉपवर्थ, सिंघल, एई स्टील, वीसा स्टील और इंड्स एग्रो आदि का नाम शामिल है.

खनन विभाग के मुताबिक सरकार के खजाने में बीते तीन साल से रायगढ़ से 70 प्रतिशत उत्पादन कम हो गया है. इसके कारण सरकार को केवल कोल सेक्टर में पहले के मुकाबले 30 प्रतिशत ही रायल्टी मिल पा रही है. तीन साल पहले रायगढ़ जिले से 120 लाख टन सलाना कोल उत्पादन होता था, जो अब घटकर 30 लाख टन हो गया है. वहीं, विद्युत विभाग ने बताया कि बिजली की खपत कम होने से इस साल रायगढ़ के बिलों में 30 करोड़ रुपए की कमी आई है.

बीते तीन साल में रियल एस्टेट सेक्टर में कोई नया रेज़िडेंशियल प्रोजेक्ट नहीं आया. जहां कभी एक फ्लैट के लिए सैकड़ों खरीदार थे, वहां पुराने फ्लैट ही बिकने बंद हो गए हैं. 'हाउसिंग बोर्ड' को नुक्कड़ों पर कैंप लगाने के बाद भी सफलता नहीं मिल रही है. रियल इस्टेट कारोबारी बताते हैं कि छंटनी के बाद कई कर्मचारी तो फ्लैट की बुकिंग के बाद उसे रद्द करने का दबाव बना रहे हैं.

गौरतलब है कि जल, जंगल और जमीन का जमकर दोहन करके रायगढ़ जिले में बीते दो दशकों से तेजी से औद्योगिक विकास हुआ. विधानसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक 79.407 हेक्टेयर राजस्व भूमि उद्योगों के नाम पर कुर्बान कर दी गई. 63.580 हेक्टेयर वन भूमि 11 उद्योगों को आवंटित की गई.

क्या कहते हैं विशेषज्ञ

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छत्तीसगढ़ उद्योग मंत्री अमर अग्रवाल ने कैच को बताया कि कर्मचारियों की छंटनी सरकारी निर्णय का परिणाम नहीं है. वे मानते हैं, उच्चतम न्यायालय के निर्णय की सही समीक्षा के बाद ही इस संकट से निपटने की रणनीति बन सकती है. 

इस बारे में राज्य के उद्योग डायरेक्टर कार्तिकेय गोयल का कहना है कि अगर उद्योगों में उत्पादन कम हो रहा है तो ज़रूरी नहीं कि कोल की कमी ही इसके लिए जिम्मेदार है. वित्तीय कुप्रबंधन और कर्ज के कारण भी पॉवर और स्टील प्लांटों में उत्पादन प्रभावित हो सकता है. उन्हें कितनी मात्रा में कोल की जरुरत है, यह साफ़ नहीं किया है.

जिला खनिज अधिकारी एसएस नाग बताते हैं कि सरकारी कंपनी एससीएलएल की देखरेख में कुछ खदानों में उत्पादन हो रहा है, लेकिन इनमें कर्मचारियों की भर्ती नहीं हो रही है. इससे बेरोजगारी की समस्या बनी हुई है. वहीं, विद्युत विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी सीएस सिंह ने बताया कि रायगढ़ सर्किल के कुछ उद्योगों ने लोड को जीरो कर लिया है. इससे राजस्व प्रभावित हुआ है. स्टील के मुकाबले पॉवर सेक्टर की हालत बहुत खराब है. 

रायगढ़ स्पंज आयरन संघ के अध्यक्ष सुभाष अग्रवाल ने बताया कि यहां लगभग 34 प्रतिशत स्पंज आयरन उद्योग अपना उत्पादन बंद कर चुके हैं. कई छोटे और मध्यम उद्योग बंद की कगार पर है. उपयोगी वस्तुओं की ब्रिकी आधे से कम हो गई है.

सामाजिक कार्यकर्ता राजेश त्रिपाठी का मानना है कि पांच साल बाद भी कई उद्योगों ने किसानों की जमीन पर निर्माण कार्य नहीं किया है. सरकार को नियमों के मुताबिक किसानों को उनकी जमीन वापस करनी चाहिए.

इधर टूटी आस, हार रही जिंदगी

बीते साल 8 जनवरी की रात शहर के भगवानपुर बस्ती के रणविजय भारती ने अपने 14 साल के बड़े बेटे चंदन भारती की बलि दे दी. उन्होंने बताया कि पहले वह ठेकाकर्मी के रूप में फिटर का काम करते थे, लेकिन कंपनी ने निकाल दिया तो वह तमनार में मजदूरी करने लगे. वहां भी काम बंद हुआ तो फिर चूड़ी बेचने लगे. उसमें घाटा लगा तो कर्ज से दब गए. घर बेच दिया. पत्नी बीमार हो गई. फिर उसने इंद्रजाल नाम की किताब पढ़ी. उसे लगा कि यह अनुष्ठान करके उसकी आर्थिक विपन्नता दूर हो जाएगी. भारती इन दिनों जिले की कारागार में बंद है.

First published: 13 January 2017, 8:14 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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