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छत्तीसगढ़ में लागू नहीं होतीं एनएचआरसी की सिफारिशें

राजकुमार सोनी | Updated on: 13 January 2017, 7:40 IST
(फ़ाइल फोटो )

माओवाद प्रभावित बस्तर की महिलाओं से बलात्कार के मसले पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की हालिया नोटिस के बाद यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या छत्तीसगढ़ में आयोग की सिफारिशों पर कारगर ढंग से अमल होता है? अब तक के हालात तो यहीं बताते हैं कि आयोग की नोटिसों पर अमल नहीं होता. 

अभी हाल के दिनों में पूर्व केंद्रीय मंत्री और आदिवासी मामलों के जानकार अरविंद नेताम जब एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे तब उन्होंने यह माना कि देश में जितने भी तरह के आयोग हैं उनमें दांत नहीं हैं. नेताम का कहना था कि आयोग अनुशंसा करके मुक्त हो जाते हैं, अगर आयोगों को थोड़ा अधिकार संपन्न बना दिया जाए और पूरी गंभीरता के साथ यह देखा जाने लगे कि अनुशंसाओं पर अमल हुआ है या नहीं तो आधी समस्या खत्म हो सकती है. 

नेताम की बातों में इसलिए सच्चाई नजर आती है क्योंकि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ताजा सिफारिशों से पहले भी छत्तीसगढ़ सरकार को इस तरह की कई नोटिसें मिल चुकी हैं, लेकिन सरकार पर इसका असर हुआ हो ऐसा नजर नहीं आया.

घटना दर घटना

बस्तर के सिंगावरम इलाके में 8 जनवरी 2009 को सुरक्षाबल और माओवादियों के बीच मुठभेड़ हुई थी. इस मुठभेड़ के बाद तत्कालीन पुलिस अधीक्षक राहुल शर्मा ने जोर-शोर से यह प्रचारित किया था कि 19 माओवादियों को ढेर कर दिया गया है, लेकिन थोड़े ही दिनों बाद इस बात की पोल खुल गई कि जो मारे गए थे वे सभी माओवादी नहीं बल्कि ग्रामीण आदिवासी थे.

इस मामले में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सरकार को नोटिस देते हुए आदिवासी परिवारों को राहत देने और दोषी पुलिस अफसरों पर कार्रवाई की अनुशंसा की थी, लेकिन पूरे मामले में कई सालों तक चली कवायद के बाद भी मृतकों के परिजनों को राहत नहीं मिल पाई. 

इस घटना से पहले 18 मार्च 2008 को बीजापुर जिले के माटवाड़ा में तीन आदिवासियों को सुरक्षाबलों ने पीट-पीटकर मार डाला था. इतना नहीं आदिवासियों की आंखों में चाकू भी घोंपा गया. पूरे मामले के कुछ चश्मदीद गवाहों के बयानों के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने सरकार को नोटिस दिया. चौतरफा हो हल्ले के बाद महज एक सब इंस्पेक्टर को लापरवाही बरतने के आरोप में जेल भेजा गया, लेकिन पुलिस अधीक्षक अंकित गर्ग बच निकले. 

सलवा जुडूम अभियान के दौरान जलाए गए गांवों को बसाने और माओवाद के नाम पर प्रताडि़त किए गए आदिवासियों को राहत देने के मसले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी आ चुका है लेकिन इस मामले में भी सरकार अब तक यह बहाना करते हुए बचती रही है कि उनके पास प्रभावित गांवों की सूची नहीं है. सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार की पहल के बाद कलक्टरों को पांच सौ पचास परिवारों की सूची थमाई गई है बावजूद इसके आदिवासी राहत के पात्र नहीं बन पाए हैं.

बच रहे ढांड और कल्लूरी

अभी कुछ माह पहले जेएनयू की प्रोफेसर नंदिनी सुंदर मानवाधिकार कार्यकर्ता विनीत तिवारी, संजय पराते, अर्चना प्रसाद सहित कुछ अन्य लोगों के साथ बस्तर के दौरे पर आई थीं, लेकिन पुलिस ने इन सबके खिलाफ भी तोंगपाल में हुई एक ग्रामीण की हत्या के सिलसिले में मामला दर्ज कर दिया. 

फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने नंदिनी सुंदर सहित अन्य की गिरफ्तारी पर रोक लगा रखी हैं, लेकिन राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव विवेक ढांड और बस्तर आईजी शिवराम प्रसाद कल्लूरी को स्वयं उपस्थित होकर जवाब प्रस्तुत करने को कहा है. दोनों अफसर अब तक एक भी बार आयोग के समक्ष पेश नहीं हुए हैं.

बीजापुर और सुकमा जिले की 40 महिलाओं से दुष्कर्म के मामले में राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग भी सरकार पर अपनी नाराजगी जता चुका है, मगर उसकी नाराजगी का कोई असर दिखाई नहीं देता. 

आयोग ने सुरक्षादस्तों को आदिवासियों के घरों से दूर रखने की हिदायत दी थीं मगर अब गांवों से सुरक्षाबलों के द्वारा तलाशी अभियान के दौरान मुर्गी, बकरे, गहने और पैसे लूटे जाने की खबरें मिल रही है. केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने भी अपनी पड़ताल में यह मान लिया है कि पुलिसकर्मियों और सुरक्षाबलों ने ही ताड़मेटला सहित कुछ गांवों में आग लगाई थी. इस भयावह हकीकत के सामने आने के बाद भी सरकार ने खामोशी अख्तियार कर ली है. 

किसानों की मौत के पीछे शराब और अन्य घरेलू कारण बताए जाने के खिलाफ प्रगतिशील किसान संगठन के राजकुमार गुप्ता की शिकायत के बाद आयोग ने सरकार को तलब किया है, लेकिन इस मामले में भी नतीजा सिफर है. 

राज्य की सिफारिशें भी ठंडे बस्ते में

सरकार केवल केंद्रीय अनुशंसाओं को अनसुना नहीं कर रही, राज्य के आयोगों की सिफारिशें भी ठंडे बस्ते में डाली जा रही है. छह जुलाई 2011 को बलरामपुर जिले के चांदो थाने के अन्तर्गत एक गांव करचा में माओवादी बताकर मारी गई मीना खलको के बारे में अनीता झा आयोग की रिपोर्ट में यह साफ हो चुका है कि उसे पुलिसकर्मियों ने बेहद नजदीक से गोली मारी थी और उससे पहले रेप भी किया गया था. बावजूद इसके इस वारदात के आरोपी पुलिसकर्मी डयूटी पर हैं.

ताड़मेटला, सारकेगुड़ा और एटसमेटा इलाकों में फर्जी मुठभेड़ के बाद गठित आयोगों की रिपोर्ट अब तक तैयार नहीं हुई

सुकमा में कलक्टर रह चुके एलेक्स पाल मेनन के अपहरण के बाद सरकार ने जेलों में बंद निर्दोष आदिवासियों की रिहाई के लिए बुच कमेटी बनाई थी. इस कमेटी ने भी एक दो बैठकों के बाद अपना कामकाज बंद कर दिया है. ताड़मेटला, सारकेगुड़ा और एटसमेटा इलाकों में फर्जी मुठभेड़ के बाद गठित किए आयोगों की रिपोर्ट अब तक तैयार नहीं हुई है. 

इसी तरह आदिवासी नेत्री सोनी सोरी पर केमिकल हमले के लिए गठित एसआईटी और डीएसपी की जांच भी अटकी पड़ी है. अधिवक्ता शालिनी गेरा, सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार सहित अन्य के पुतला जलाने के मामले में भी पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई सिफर हैं. 

पीयूसीएल के प्रदेश ईकाई के अध्यक्ष लाखन सिंह कहते हैं, जब सरकार ने किसी भी मामले में कार्रवाई नहीं करने का फैसला कर लिया है तो फिर जनता के सामने एक ही रास्ता बचता है कि वह ऐसी सरकार को देर-सबेर बर्खास्त कर दें. 

नेता प्रतिपक्ष टीएस सिंह देव कहते हैं, जब कभी भी बस्तर का इतिहास लिखा जाएगा तो काली स्याही से यह भी लिखा जाएगा कि आयोग की सिफारिशें महज फजीहत से बचने के लिए लागू नहीं की जा रही है.

First published: 13 January 2017, 7:40 IST
 
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