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नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा का ये गांव बना 'कैशलेस विलेज', इस मामले में भी है अव्वल

कैच ब्यूरो | Updated on: 2 July 2018, 13:47 IST

देश में जीएसटी लागू हुए एक साल बीत चुका है. इस एक साल में देश में कई बदलाव देखने को मिले. प्रधानमंत्री मोदी देश में कैशलेस व्यवस्था का सपना देखते हैं, बावजूद इसके लोग आज भी कैश में लेन-देन करने पर ज्यादा भरोसा करते हैं. लेकिन छत्तीसगढ़ में एक ऐसा गांव है जहां के लोग सौ फीसदी कैशलेस व्यवस्था अपना रहे हैं. ये गांव नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा जिले का गांव है जिसका नाम है पालनार.

पालनार गांव राज्य का एक ऐसा मात्र गांव है जहां शतप्रतिशत कैशलेस व्यवस्था है. सही मायने में यहां के लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के डिजिटल इंडिया का सपना पूरा कर रहे हैं. बता दें कि ज्यादातर लोग दंतेवाड़ा को नक्सल वारदतों की वजह से जानते हैं. यहां की मात्र33 फीसदी आबादी ही पढ़ी-लिखी है, लेकिन पालनार गांव ने लोगों की इस धारणा को तोड़ दिया. बता दें कि दंतेवाड़ा जिला अपनी भाषा, कला, संस्कृति के लिए दुनियाभर में जाना जाता है. यहां की संस्कृति और रीति-रिवाज यहां के लोगों के जीवन का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है.

यही वजह है कि पालनार गांव की भी अपनी खास कला और संस्कृति है. हालांकि पालनार गांव देश के सबसे अग्रसर गांव में सम्मिलित नहीं है, लेकिन यहां का हर एक व्यक्ति बदलाव में हिस्सेदारी करता है. विकास के पथ पर आगे बढ़ते हुए यहां के ग्रामीण अपनी कला और संस्कृति को जिंदा रखे हुए हैं.

दंतेवाड़ा जिले के आदिवासी विकास की राह में सरकार के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे हैं. नक्सल प्रभावित पालनार गांव नोटबंदी के बाद कैशलेस इकोनॉमी को अपनाने वाला छत्तीसगढ़ का पहला गांव है. यही नहीं इस गांव के लोग काफी हुनरमंद हैं. इस गांव की महिलाएं घर के कामकाज के साथ परिवार की आमदनी बढ़ाने में अपना योगदान देती हैं.

इस गांव में महिलाएं घर में ढोलक, पानी के लिए सुराही और मोरपंख से साज सज्जा के सामान बनाती है. इस सामान को स्थानीय बाजार में बेचकर आर्थिक रूप से मजबूत हो रही हैं. यही नहीं इन पैसों से वो परिवार का खर्च चलाती हैं.

बता दें कि दंतेवाड़ा के आदिवासियों का निशाना अचूक माना जाता है. यहां के तीरंदाज अपने तीर से अपने लक्ष्य को भेदने में महारत हासिल किए हुए हैं. जिन्हें देखकर हर कोई हैरान रह जाता है.

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First published: 2 July 2018, 13:47 IST
 
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