Home » छत्तीसगढ़ » Two families of Chhattisgarh asking for 'freedom' in Kashmir
 

कश्मीर में छत्तीसगढ़ के दो परिवार मांग रहे 'आजादी'

शिरीष खरे | Updated on: 23 December 2016, 8:20 IST

रोजी रोटी की तलाश में जम्मू कश्मीर गए कोरबा (छत्तीसगढ़) के दो आदिवासी परिवार आजादी मांग रहे हैं. दरअसल, इन दो परिवारों के 14 सदस्यों को वर्षों से घर लौटने का इंतजार है. एक परिवार 30 साल से बंधक है, जबकि दूसरा परिवार 12 साल से घर नहीं लौटा.

जम्मू कश्मीर में बंधक दोनों परिवार आदिवासी बहुल कोरबा जिले में कुसमुंडा थाना क्षेत्र के गांव बिरदा के रहने वाले हैं. लगभग 30 साल पहले गांव से बृजलाल सोनी, पत्नी और बच्चों के साथ रोजी रोटी की तलाश में जम्मू-कश्मीर गए थे. वे बताते हैं, बीते 30 साल से पूरा परिवार एक साथ घर नहीं लौटा. 

इस बार मैं आया हूं तो अकेला. असल में ईंट भट्ठे का मालिक हमें एक साथ घर नहीं आने देता. हम घर आते हैं, लेकिन बारी-बारी से. कभी मैं, कभी बच्चे तो कभी पत्नी को भेजा जाता है. पत्नी अब इस दुनिया में नहीं रही.

जम्मू तवी जिले के चकमोड़ गांव में बृजलाल को तीन दशक पहले ईंट भट्ठे में रोजगार मिला था. बृजलाल ने परिवार के साथ घर आने की कोशिश की तो भट्ठे के मालिक ने रोक दिया. पूरे परिवार के बजाय एक सदस्य को घर जाने के लिए कहा.

पहले तो बृजलाल को लगा कि भट्ठे में काम होने के कारण मालिक सभी को नहीं छोड़ रहा है, लेकिन बाद में पता चला कि मालिक ने उसको और उसके परिवार को बंधक बना लिया है. यह परिवार कोरबा लौटना चाहता है, लेकिन मालिक आने नहीं दे रहा है.

परेशान बृजलाल कुछ दिन पहले गांव पहुंचे हैं. अपनी व्यथा पहले इन्होंने गांव वालों को सुनाई. फिर कुछ दिन पहले उन्होंने इसकी शिकायत पुलिस से की है. ग्रामीणों ने श्रम विभाग और छत्तीसगढ़ शासन से इस परिवार के घर लौटने के लिए मदद मांगी है.

इस बारे में कैच ने कोरबा के जिला पुलिस अधीक्षक तारकेश्वर पटेल से बात की. उन्होंने बताया कि ग्राम बिरदा के दो परिवारों को जम्मू कश्मीर के राजौरी और जम्मूतवी जिले में बंधक बनाने की जानकारी उन्हें मिली है.

पटेल के मुताबिक जम्मू कश्मीर देश के दूसरे राज्यों से अलग हैं. वह शांत प्रदेश नहीं है, इसलिए वहां की परिस्थितियों को देखकर ही आगे की कार्यवाही की जा सकती है. उन्होंने कहा कि इसके लिए जल्द ही टीम भी बनाई जा सकती है. इसके लिए राज्य स्तरीय विभागीय प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा. एक बार टीम बन जाए तो बंधकों को छुड़ाने का काम उतना मुश्किल भी नहीं है

पीड़ित बृजलाल ने अपनी कहानी बताते हुए कहा कि वे दीपावली जैसे त्यौहार के दिन भी अपने घर पर एक साथ जमा नहीं हो सकते. कई शादी-ब्याह के मौके पर भी सपरिवार नहीं आ सके. इसके अलावा उनके बेटी और बेटे शादी लायक हो गए हैं. उनके सारे रिश्तेदार और जान-पहचान वाले कोरबा तथा इसके आसपास के इलाकों में ही रहते हैं, लेकिन यहां एक साथ न आ पाने के कारण उनकी शादियां तक नहीं हो पा रही हैं.

बृजलाल ने पुलिस को दी शिकायत में कहा है कि ईंट भट्ठे के मालिक ने उनके सहित उनके परिवार के आठ सदस्यों को बंधक बना रखा है. इनमें लक्ष्मी बाई (35), सरस्वती (33), सरोज बाई (31), वृहस्पति बाई (29), सरोज बाई (31), राहुल (20) और संतोष सोनी (19) के नाम हैं.

बृजलाल के जैसे ही बिरदा में रहने वाले घासीराम कश्यप की कहानी भी यही है. फर्क इतना है कि घासीराम का परिवार 12 साल से जम्मू कश्मीर के राजौरी जिले में बंधुआ मजदूर की तरह काम कर रहा है. घासीराम कश्यप का परिवार राजौरी के गांव बल, थाना सुन्दरी के ईंट भट्ठा में बंधक है.

घासीराम ने विधिक सेवा को बताया है कि उनके परिवार के 6 सदस्य बंधक हैं. उनके मुताबिक फूलसाय (43), त्रिवेणी (40), रामधन (20), भूरवा और छोटू (14) साल भी ईंट भट्ठा में बंधक है. घासीराम ने परिवार को बंधकों के चंगुल से मुक्त कराने की गुहार लगाई है. उनका कहना है कि उनका नाती तक बंधक बना लिया गया है.

इस मामले में बीते दिनों विधिक सेवा के न्यायाधीश ने कोरबा पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखा है. न्यायाधीश ने पत्र के जरिए विधिक सेवा प्राधिकरण को पूरी घटना से अवगत कराया है. विधिक सेवा के अध्यक्ष और जिला व सत्र न्यायाधीश जीके मिश्रा ने परिवार की शिकायत को गंभीरता से लिया है. उन्होंने पुलिस अधीक्षक को लिखे पत्र में कहा है कि बंधकों को मुक्त कराने के लिए आवश्यक कदम आठाए जायं.

इसके बाद पुलिस ने तुरंत कलक्टर को पत्र लिखकर उन्हें भी मामले से अवगत कराया है. इन मामलों को शासन ने गंभीरता से लिया तो बंधक परिवार को छुड़ाने के लिए पुलिस, श्रम और महिला एवं बाल विकास विभाग की संयुक्त टीम गठित की जा सकती है. इसके पहले भी टीम गठित करके राज्य सरकार छत्तीसगढ़ के बंधक श्रमिकों को विभिन्न राज्यों से मुक्त करा चुकी है.

First published: 23 December 2016, 8:20 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

पिछली कहानी
अगली कहानी