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आखिर पिंक बॉल ही क्यों इस्तेमाल की जा रही है भारत और बांग्लादेश के बीच डे-नाइट टेस्ट मुकाबले में, जानिए कारण

कैच ब्यूरो | Updated on: 20 November 2019, 14:33 IST

कोलकाता के ऐतिहासिक ईडन गार्डन मैदान पर भारत और बांग्लादेश 22 नवबंर से अपना पहला डे-नाइट टेस्ट मुकाबला खेलेंगे. इस मुकाबले के लिए जिस गेंद का इस्तेमाल होगा उसका रंग पिंक होगा. भारतीय टीम में चेतेश्वर पुजारा और रिद्धिमान साहा दो खिलाड़ी है जिन्हें पिंक गेंद से खेलने का अनुभव है. जबकि स्पिन गेंदबाद कुलदीप यादव 2016 दलीप ट्रॉफी में गुलाबी गेंद से अपना जलवा बिखेर चुके है. लेकिन फिर भी इस मैच के लिए सभी खिलाड़ियों में काफी उत्सुकता देखी जा रही है.

भारत और बांग्लादेश के ज्यादातर खिलाड़ी को नहीं पता कि सफेद दुधिया रोशनी में यह गेंद किस तरह से व्यवहार दिखाएगी. पिंक गेंद से गेंदबाजों को रिवर्स होंगी या फिर स्विंग होंगी. वहीं एक सावल जो सबके मन में बना हुआ हैं कि आखिर इस गेंद का रंग पिंक ही क्यों है और जब पहले से ही सफेद गेंद और लाल गेंद से मैच हो रहे हैं तो पिंक गेंद की जरूरत ही क्यों पड़ी.

मेरठ में बन रही हैं पिंक गेंद

डे-नाइट टेस्ट मुकाबले के लिए जिस गेंद का इस्तेमाल हो रहा है उसे मेरठ की एसजी कंपनी बना रही है. कंपनी ने अपनी बेवसाइट पर इस बात की जानकारी दी हैं कि साल 1994 के बाद भारत ने अपने घरेलू सरजमीं पर जितने भी टेस्ट मुकाबले खेलें है उन मुकाबले के लिए गेंद इस कंपनी ने तैयार की है. वहीं रणजी ट्राफी मुकाबले के लिए भी कंपनी ही गेंद बीसीसीआी को उपलब्ध कराती है.

भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाले पहले डे-नाइट टेस्ट मुकाबले से पहले कंपनी ने बीसीसीआई को 120 पिंक गेंद दी है ताकि खिलाड़ी इस गेंद से प्रैक्टिस कर सके.

आखिर बॉल का रंग पिंक ही क्यों है

लेकिन सबके मन में एक सवाल बना हुआ है आखिर गेंद का रंग पिंक ही क्यों रखा गया है. इसका जवाब है कि अधिकारी एक ऐसी गेंद चाहते थे जो डे-नाइट टेस्ट मुकाबले में दिन और रात दोनों में खिलाड़ियों को अच्छी तरह दिखाई दे. इसके लिए लाल और सफद गेंद को अलग अलग पैमानों पर तौला गया और दोनों ही गेंद एक-एक पैरामीटर पर फेल हुई.

वनडे मैचों में खिलाड़ियों की जर्सी रंगनी होती है ऐसे में सफेद गेंद आसानी से नजर में आती है जबकि टेस्ट मुकाबलो में खिलाड़ियों की जर्सी का रंग सफेद होता है जिसके कारण लाल गेंद को दूर से ही देखा जा सकता है. लेकिन जब बात डे-नाइट टेस्ट मुकाबले के लिए शुरू हुई तो एक सवाल गेंद के रंग को लेकर भी बना रहा.

डे-नाइट टेस्ट मुकाबले में पिंक गेंद रखने का कारण है कि यह दूधिया रोशनी में साफ तौर पर दिखाई देगी. इतना ही नहीं यह गेंद कम से कम 80 ओवर तक खराब नहीं होगी. दरअसल, एक वनडे मुकाबले के दौरान दो सफेद गेंदों का इस्तेमाल होता है. दोनों एंड से सफेद गेंद से 25-25 ओवर फेंके जाते है. अगर मुकाबला सफेद गेंद से खेला जाता तो गेंद ज्यादा देर तक सही नहीं रहती.

बात अगर लाल गेंद की करें तो एक नई लाल गेंद में 60-70 मिनट ही शाइन रहती है, लेकिन पिंक बॉल में लगभग टेस्ट के एक सेशन तक बॉल में शाइन बनी रहती है. पिंक गेंद लगभग 30 ओवरों तक नई गेंद रहती है जिसके कारण गेंदबाजी को तो फायदा होता है जबकि बल्लेबाजों को काफी मुश्किल होती है.

मेरठ की एस जी कंपनी के मार्केटिंग डायरेक्टर पारस आनंद ने अंग्रेज़ी अखबार हिंदुस्तान टाइम्स से कहा,'दुधिया रौशनी में आसानी से गेंद दिखे इसके लिए पिंक बॉल में अधिक लाह लगाया जाता है, जिससे बॉल में शाइन लंबे वक्त तक बनी रहे.' उन्होंने आगे कहा,'ज्यादा शाइन होने की वजह से पिंक बॉल ज्यादा स्विंग होती है. पिंक बॉल में अधिक लाह इसलिए लगाया जाता है, जिससे यह बॉल लाल गेंद की तुलना में ज्यादा देर तक शाइन करती रहे.'

जब आंनद से इस बारे में सवाल पूछा गया कि आखिर यह पिंक गेस के किसे मदद मिलेगी तो उन्होंने कहा.'शायद ही पिंक बॉल रिवर्स होगा. हमने देखा है कि भारतीय तेज़ गेंदबाज़ 15 से 20 ओवर के बाद ही लाल गेंद से काम करना शुरू करते हैं. वे एक तरफ गेंद को भारी बनाते हैं और दूसरी तरफ गेंद को खुरदुरा रखते हैं.'उन्होंने आगे कहा,'हालांकि, पिंक बॉल में यह काफी मुश्किल होगा. गेंद की चमकदार और खुरदरी भुजाओं को बनाए रखने के लिए क्षेत्ररक्षकों को बहुत मेहनत करनी होगी.'

आंनद ने आगे कहा,'लगभग 70-80 ओवर तक सीम होने के कारण, स्पिनर स्पष्ट रूप से पूरे खेल में रहेंगे. यदि आप किसी अश्विन या जडेजा को एक सत्र में ज्यादा विकेट लेते हुए देखें तो आश्चर्यचकित न हों.'

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First published: 20 November 2019, 13:59 IST
 
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