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कोई फ़िज़ा कोई मंज़र किसी के नाम करो

हिमांशु बाजपेयी | Updated on: 11 February 2017, 6:44 IST

निदा फ़ाज़ली का न रहना सिर्फ एक शाइर, नस्र-निगार या फिल्मी गीतकार का न रहना भर नहीं है, उनके जाने के बाद एक सघन सांस्कृतिक व्यक्तित्व हमारे बीच से उठ गया. हिन्दी-उर्दू के बीच का सबसे मज़बूत, सबसे मोतबर पुल. उनके बेशुमार शेर अवाम को मुहावरों की तरह याद हैं, उनका गद्य संस्कृत की इस सूक्ति पर पूरा उतरता है कि गद्य कवियों की कसौटी होता है, उनकी नज़्में अकादमिक हल्क़ों में हमेशा चर्चा का विषय रहीं.

उनके दोहों ने दोहे की विधा को न सिर्फ नई ज़िन्दगी दी बल्कि हिन्दी-उर्दू के साझे दामन में अनगिनत सितारे जड़ दिए, उनके फिल्मी नगमे हमेशा इस बात की ज़मानत रहेंगे कि शाइरी करना शाइर को ही ज़ेब देता है, भले ही वो फिल्मी शाइरी क्यों न हो. उनके संस्मरणों ने गुमनामी के अंधेरों में खो गए बहुत से चेहरों को उनके हिस्से का उजाला बख़्शा, ख़राब से ख़राब मुशायरे भी उनके माइक पर आते ही बावकार हो उट्ठे, उनकी बातचीत ने बहुत से लोगों को गुफ्तगू का अंदाज़ सिखाया, उनकी तकरीरें साझी तहज़ीब के तरफदारों ने हर्फ-ब-हर्फ याद कीं, उनकी बेबाकी और जुरअत को उनके विरोधियों ने भी सलाम किया.

उनके दोहों ने दोहे की विधा को न सिर्फ नई ज़िन्दगी दी बल्कि हिन्दी-उर्दू के साझे दामन में अनगिनत सितारे जड़ दिए

बशीर बद्र की तरह निदा फाज़ली भी उन शाइरों में रहे जिन्हे नौजवान शाइरी की तरफ माइल होने पर सबसे पहले पढ़ते हैं. जो नौजवां नहीं रहे उनके दिलों में भी निदा की शाइरी का फूल हमेशा शिगुफ्ता रहा. ख़ुद बशीर बद्र ने एक दफा कहा कि निदा का मतला कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता, टूटे दिलों को बहुत बड़ी तस्कीन है...

हालांकि अपने आख़िरी दौर में निदा साहब खुद ये कहते रहे कि हमारे यहां शाइरी और समाज दोनों के हालात दिल तोड़ने वाले हैं. इसे लेकर उनके अंदर बहुत गुस्सा रहा जिसे वो बिना किसी मसनूई एहतियात के ज़ाहिर करते रहे. फिर चाहें फिल्मों में ख़राब गाने लिखे जाने का मामला हो, मुशायरों का स्तर गिरने का मामला हो या हालिया असहिष्णुता का, वे अपनी राय ज़ाहिर करने में न कभी चूके, न डरे, न डिप्लोमैटिक हुए.

इस सन्दर्भ में वे हमारे दौर के सबसे हिम्मती अदीबों में थे. लेकिन हिम्मत के साथ अपनी बात कहने की इसी सिफत के चलते लोग उनसे ख़फा भी ख़ूब रहे. पाकिस्तान में उन्होने बिना किसी संकोच के घर से मस्जिद है बहुत दूर... शेर पढ़ा और डटकर आलोचकों को जवाब दिया.

निदा फाज़ली उन शाइरों में रहे जिन्हे नौजवान शाइरी की तरफ माइल होने पर सबसे पहले पढ़ते हैं

हिन्दुस्तान में भी दहशतगरों के हाथ में इस्लाम रह गया... मिसरे पर कट्टरपंथियों ने उनको निशाने पर लिया मगर वो इससे बेनियाज़ रहे. अपनी बेबाकी की वजह से ही 1964 में फिल्मी दुनिया में जाने के बावजूद तकरीबन बीस साल तक उनका नाम लगभग अनजाना ही रहा.

मुंबई में कभी वे बहुत बड़े गीतकारों के बहुत करीब रहे मगर अपनी साफगोई के चलते हर जगह संबंध बिगाड़ बैठे. फिर चाहें साहिर हों, कैफ़ी हों, मजरूह हों या गुलज़ार. साहिर या शकील पर जैसा उन्होने लिख दिया सार्वजनिक तौर पर वैसा लिखने या कहने के लिए बहुत हिम्मत चाहिए.

कहा तो ये भी जाता है कि उन्होने एक दफा अटल बिहारी वाजपेयी से उनके मुंह पर कह दिया था कि आप कविता की बजा राजनीति अच्छी करते हैं. जांनिसार अख़्तर साहिर के लिए घोस्ट राइटिंग करते थे ये मान्यता इसलिए मज़बूत हो पाई क्योंकि निदा ने इस बाबत लिख दिया.

तीन मुद्दों पर मेरी भी उनसे बहस हुई. एक दफा जब एक वेबसाइट को दिए गए इंटरव्यू में उन्होने कहा कि साहिर की मार्केट वैल्यू कम थी इसलिए उनकी कब्र बदहाल है, इसके उलट रफी की कब्र ग्रेनाइट की है. ये बात तथ्यात्मक रुप से ग़लत थी.

मुंबई में वे बहुत बड़े गीतकारों के करीब रहे मगर अपनी साफगोई के चलते हर जगह संबंध बिगाड़ बैठे

दूसरा मुद्दा वो के उन्होंने कहा सरदार जाफरी से पहले बेकल उत्साही को पद्मश्री मिल गया. ये बात भी तथ्यात्मक रुप से ग़लत तो थी ही बेकल उत्साही के रचनात्मक योगदान को भी नकार रही थी.

तीसरी बार तब जब उन्होंने कहा कि मजाज़ इसलिए मशहूर हुए क्योंकि इस्मत चुगताई और हमीदा सालिम ने उन पर एख लेख लिख दिया. मजाज के बारे में ऐसा सुनना थोड़ा अजीब लगा. खैर तीनों बार दृढ़ता से उन्होने अपना पक्ष रखा मगर उससे भी ज़्यादा दृढ़ता से मेरी बात सुनी... और इससे भी बड़ी बात यह कि इन सारी बहसों के बाद भी जब भी उनसे बात हुई उन्होने पूरी शफकत और मोहब्बत से बात की.

इस मामले में वो दिलदार शख़्स थे. एक लेख के चलते बशीर बद्र उनसे बहुत नाराज़ रहे मगर हाल ही में निदा फ़ाज़ली ने बशीर बद्र के बारे में बात करते हुए इस बात पर गहरा अफसोस जताया था कि उर्दू का इतना मकबूल शाइर बुढ़ापे में एकदम अकेला और उपेक्षित है. अहमद फ़राज़ को उनके आख़िरी मुशायरे में लखनऊ में हूट कर दिया गया था इस बात से भी निदा फ़ाज़ली को बहुत धक्का लगा था और बाद में उन्होने अहले लखनऊ को बहुत खरी-खोटी सुनाई थी.

इस बात पर उनका गहरा अकीदा था कि अगर जनता अच्छे शाइरी का सम्मान करना और बुरी शाइरी को नकारना सीख जाए तो शाइरी ही नहीं समाज की बुराइयां भी काफी कम हो जाएंगी. निदा फाज़ली का जाना साहित्य के लिए तो बड़ा नुकसान है ही उस साझी तहज़ीब के लिए भी बहुत बड़ा झटका है, निदा उम्र भर जिसके परस्तार रहे.

किसी भी शहर में जाओ, कहीं कयाम करो

कोई फ़िज़ा कोई मंज़र किसी के नाम करो

दुआ सलाम ज़रूरी है शहर वालों से

मगर अकेले में अपना भी एहतराम करो

First published: 10 February 2016, 3:03 IST
 
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