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Ambedkar Jayanti 2020: ज्ञानी के साथ बेहद ईमानदार भी थे बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर

कैच ब्यूरो | Updated on: 13 April 2020, 14:10 IST

Ambedkar Jayanti 2020: बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर की जयतीं कल यानी मंगलवार को मनाई जाएगी. संविधान निर्माता की जयंती के मौके पर हम आपको उनके बारे में कुछ ऐसे तत्य और वक्तव्य बताने जा रहे हैं. जिन्हें कम ही लोग जानते हैं. बाबासाहेब (Babasaheb) का जीवन (Life) सतत संघर्ष और सफलता का ऐसा समन्दर है जिसमे खोजा जाए तो हमें ज्ञान और प्रेरणा रुपी बहुमूल्य रत्न प्राप्त हो सकते हैं.

बेहद ईमानदार थे बाबासाहेब अंबेडकर


बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर (Babasaheb Bhimrao Ambedkar) बुद्धिमान (Wise) के साथ बेहद ईमानदार (Honest) भी थे. दरअसल, आजादी के पहले (Before independence) साल 1943 में बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर को वाइसराय काउंसिल में शामिल किया गया. जिसमें उन्हें श्रम मंत्री बनाया गया था. इसके साथ ही लोक निर्माण विभाग (PWD) भी उन्ही के पास था. इस विभाग का बजट करोड़ों में था और ठेकेदारों में इसका ठेका लेने की होड़ लगी रहती थी.

इसी लालच में दिल्ली के एक बड़े ठेकेदार ने अपने बेटे को बाबासाहेब के पुत्र यशवंत राव के पास भेजा और बाबासाहेब के माध्यम से ठेका दिलवाने पर अपना पार्टनर बनाने और 25-50% तक का कमीशन देने का प्रस्ताव रखा. यशवंत राव उसके झांसे में आ गए और अपने पिता को यह सन्देश देने पहुंच गए.

यशवतं राव ने जैसे ही अपने पिता बाबासाहेब अंबेडकर को वो बात बताई ये सुनकर अंबेडकर आग-बबूला हो गए और उन्होंने कहा- “मैं यहाँ पर केवल समाज के उद्धार का ध्येय को लेकर आया हूं. अपनी संतान को पालने नहीं आया हूं. ऐसे लोभ-लालच मुझे मेरे ध्येय से डिगा नहीं सकते.” उसके बाद उसी रात बाबासाहेब ने यशवंत को भूखे पेट मुम्बई वापस भेज दिया. ये प्रसंग ‘युगपुरुष बाबासाहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर’ पुस्तक में मौजूद है.

बाबासाहेब और लाइब्रेरियन

डॉ. आंबेडकर ने अपने जीवन में बहुत से कष्ट सहे लेकिन कभी भी अपनी शिक्षा को प्रभावित नहीं होने दिया. वह हर दिन 14 से 18 घंटे पढ़ाई किया करते हैं. शिक्षा के प्रति उनकी ललक और जी तोड़ मेहनत का ही परिणाम था कि बड़ौदा के शाहू महाराज जी ने उन्हें उच्च शिक्षा के लिए इंग्लैंड भेज दिया था. बाबासाहेब को किताबें पढ़ने का बड़ा शौक था. माना जाता है कि उनकी पर्सनल लाइब्रेरी दुनिया की सबसे बड़ी व्यक्तिगत लाइब्रेरी थी, जिसमें 50 हजार से अधिक पुस्तकें थीं.

लंदन प्रवास के दौरान वे रोज एक लाइब्रेरी में जाया करते थे और घंटों पढ़ाई किया करते थे. एक बार वे लंच टाइम में अकेले लाइब्रेरी में बैठ-बैठे ब्रेड का एक टुकड़ा खा रहे थे कि तभी लाइब्रेरियन ने उन्हें देख लिया और उन्हें डांटने लगा कि कैफेटेरिया में जाने की बजाय वे यहां छिप कर खाना खा रहे हैं. लाइब्रेरियन ने उनपर फाइन लगाने और उनकी मेम्बरशिप ख़त्म करने की धमकी दी.

तब बाबासाहेब ने क्षमा मांगी और अपने और अपने समाज के संघर्ष और इंग्लैंड आने की वजह के बारे में बताया. उन्होंने यह भी बड़ी ईमानदारी से कबूल किया कि कैफेटेरिया में जाकर लंच करने के लिए उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं. उनकी बात सुनकर लाइब्रेरियन बोला, "आज से तुम लंच आर्स में यहां नहीं बैठोगे तुम मेरे साथ कैफेटेरिया चलोगे और मैं तुमसे अपना खाना शेयर करूंगा." वह लाइब्रेरियन एक यहूदी (Jew) था और उसके इस व्यवहार के कारण बाबासाहेब के मन में यहूदियों के लिए एक विशेष स्थान बन गया.

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First published: 13 April 2020, 14:10 IST
 
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