Home » कल्चर » bankim chandra chatterjee death anniversary tribute to Vandematram writer Bankim Chandra Chatterjee
 

वंदे मातरम्: जानिए 'राष्ट्रवादी रचनाकार' के राष्ट्रगीत से मुस्लिमों को एतराज क्यों?

ऋचा मिश्रा | Updated on: 8 April 2017, 10:08 IST
Bankimchandra Chattapadhay

भारत के राष्ट्र गीत वंदे मातरम् के रचयिता बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय का जन्म 26 जून, 1838 को कांठल पाड़ा, परगना (बंगाल) में यादव चंद्र चटर्जी के घर हुआ था. बंकिम चंद्र को उनकी साहित्यिक रचनाओं के लिए युगों-युगों तक याद किया जाता रहेगा. उन्होंने अपने उपन्यासों के माध्यम से देशवासियों में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह की चेतना का निर्माण करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था.

इन दिनों पूरे भारत में राष्ट्र भक्ति चरम पर है, आए दिन राजनेताओं के तीखे बयान सामने आ रहे हैं. लेकिन, क्या आपको पता है कि आज जिस 'भारत माता की जय' ने देश में बवाल मचा रखा है उसी के समान एक नारे ने देश की आजादी में सबसे अहम रोल निभाया था.

जी हां हम बात कर रहे हैं 'वन्दे मातरम्' की. यूं तो बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय द्वारा दिए गए इस नारे से भी तमाम तरह के विवाद जुड़े, लेकिन अंग्रेजों को भारत से खदेड़ने की जो ऊर्जा भारतीयों में इस नारे ने भरी वैसा कोई दूसरा उदाहरण खोजने पर भी नहीं मिलेगा.

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय बंगला के प्रख्यात उपन्यासकार, कवि, गद्यकार और पत्रकार थे. भारत के राष्ट्रीय गीत 'वन्दे मातरम्' उनकी ही रचना है, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के काल में क्रान्तिकारियों का प्रेरणास्रोत बन गया था.

बंकिम चन्द्र चट्टोपाध्याय का जन्म 27 जून सन् 1838 को उत्तरी चौबीस परगना के कन्थलपाड़ा में एक परंपरागत और समृद्ध बंगाली परिवार में हुआ था. उनकी शिक्षा हुगली कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज में हुई. 1857 में उन्होंने बीए पास किया और 1869 में क़ानून की डिग्री हासिल की.

इसके बाद उन्होंने सरकारी नौकरी कर ली और 1891 में सरकारी सेवा से रिटायर हुए. उनका निधन 8 अप्रैल 1894 में हुआ. बंकिम प्रेसीडेंसी कालेज से बीए की उपाधि लेने वाले पहले भारतीय थे. शिक्षा समाप्ति के तुरंत बाद डिप्टी मजिस्ट्रेट पद पर इनकी नियुक्ति हो गई. कुछ काल तक बंगाल सरकार के सचिव पद पर भी रहे. इन्हें रायबहादुर और सीआईई की उपाधियां भी मिलीं. 

प्रमुख रचनाएं
उनके द्वारा रचित उपन्यासों में ‘दुर्गेशनंदिनी’, ‘आनंदमठ’, ‘कपालकुंडला’, ‘मृणालिनी’, ‘राजसिंह’, ‘विषवृक्ष’, ‘कृष्णकांत का वसीयतनामा’, ‘सीताराम’, ‘राधारानी’, ‘रजनी’ और‘इंदिरा’ प्रमुख हैं. इन सभी उपन्यासों की विशेषता यह है कि इनके पात्र ऐतिहासिक या तत्कालीन समाज से लिए गए हैं.

बंगाल के शीर्ष उपन्यासकार
बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय बंगला के शीर्षस्थ उपन्यासकार हैं. उनकी लेखनी से बंगला साहित्य तो समृद्ध हुआ ही है, हिन्दी भी उपकृत हुई. वे ऐतिहासिक उपन्यास लिखने में सिद्धहस्त थे. वे भारत के एलेक्जेंडर ड्यूमा माने जाते हैं.

राष्ट्रीय दृष्टि से 'आनंदमठ' उनका सबसे प्रसिद्ध उपन्यास है. इसी में सर्वप्रथम 'वन्दे मातरम्' गीत प्रकाशित हुआ था. ऐतिहासिक और सामाजिक ताने-बाने से बुने हुए इस उपन्यास ने देश में राष्ट्रीयता की भावना जागृत करने में बहुत योगदान दिया. बंकिम के दिए ‘वन्दे मातरम्’ मंत्र ने देश के सम्पूर्ण स्वतंत्रता संग्राम को नई चेतना से भर दिया था. 

कैसे हुर्इ 'वंदे मातरम्' की रचना

बात उस समय की है जब ब्रिटिश राज भारत में चरम पर था. सन् 1870-80 के दशक में ब्रिटिश शासकों ने सरकारी समारोहों में ‘गॉड! सेव द क्वीन’ गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था. अंग्रेजों के इस आदेश से बंकिमचन्द्र चटर्जी को, जो उन दिनों एक सरकारी अधिकारी (डिप्टी कलेक्टर) थे, बहुत ठेस पहुंची और उन्होंने संभवत: 1876 में इसके विकल्प के तौर पर संस्कृत और बांग्ला के मिश्रण से एक नये गीत की रचना की और उसका शीर्षक दिया- 'वन्दे मातरम्'.

शुरुआत में इसके केवल दो ही पद रचे गये थे जो संस्कृत में थे. इन दोनों पदों में केवल मातृभूमि की वन्दना थी. गीत का मुखड़ा विशुद्ध संस्कृत में इस प्रकार है: 'वन्दे मातरम्! सुजलां सुफलां मलयज शीतलाम्, शस्य श्यामलाम् मातरम्.'
मुखड़े के बाद वाला पद भी संस्कृत में ही है: 'शुभ्र ज्योत्स्नां पुलकित यमिनीम्, फुल्ल कुसुमित द्रुमदल शोभिनीम्; सुहासिनीं सुमधुर भाषिणीम्, सुखदां वरदां मातरम्.' 

उपन्यास में इस गीत के आगे जो पद लिखे गये थे वे उपन्यास की मूल भाषा अर्थात बांग्ला में ही थे. बाद वाले इन सभी पदों में मातृभूमि की दुर्गा के रूप में स्तुति की गई है.

डर गई थी ब्रिटिश सरकार

बंगाल में चले स्वाधीनता-आंदोलन के दौरान विभिन्न रैलियों में जोश भरने के लिए यह गीत गाया जाने लगा. धीरे-धीरे यह गीत लोगों में अत्यधिक लोकप्रिय हो गया. ब्रिटिश सरकार इसकी लोकप्रियता से डर उठी और उसने इस पर प्रतिबन्ध लगाने पर विचार करना शुरू कर दिया.

तीसरी बार बनारस में गाया गया था 'वन्दे मातरम्'

सन् 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने यह गीत गाया. पांच साल बाद यानी सन् 1901 में कलकत्ता में हुए एक अन्य अधिवेशन में श्री चरणदास ने यह गीत दोबारा गाया. सन् 1905 के बनारस अधिवेशन में इस गीत को सरला देवी चौधरानी ने अपना स्वर दिया.

यूं बढ़ता गया 'वन्दे मातरम्' का क्रेज

कांग्रेस-अधिवेशनों के अलावा आज़ादी के आन्दोलन के दौरान इस गीत के प्रयोग के काफी उदाहरण मौजूद हैं. लाला लाजपत राय ने लाहौर से जिस उर्दू साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरू किया था उसका नाम भी 'वन्दे मातरम्' रखा. अंग्रेजों की गोली का शिकार बनकर दम तोड़ने वाली आजादी की दीवानी मातंगिनी हाजरा की जुबान पर आखिरी शब्द 'वन्दे मातरम्' ही थे.

सन् 1907 में मैडम भीखाजी कामा ने जब जर्मनी के स्टुटगार्ट में तिरंगा फहराया, तो उसके मध्य में 'वन्दे मातरम्' ही लिखा हुआ था. आर्य प्रिन्टिंग प्रेस, लाहौर तथा भारतीय प्रेस, देहरादून से सन् 1929 में प्रकाशित काकोरी के शहीद पंडित राम प्रसाद 'बिस्मिल' की प्रतिबन्धित पुस्तक 'क्रान्ति गीतांजलि' में पहला गीत 'मातृ-वन्दना' वन्दे मातरम् ही था. 

वंदे मातरम् से जुड़ा विवाद

संविधान सभा के अध्यक्ष और भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने 24 जनवरी 1950 को एलान किया कि वंदे मातरम् को राष्ट्रगीत का दर्जा दिया जा रहा है. वंदे मातरम् का इतिहास बड़ा ही दिलचस्प है. 

बंकिम चंद्र ने भारत को दुर्गा का स्वरूप मानते हुए देशवासियों को उस मां की संतान बताया. भारत को वो मां बताया जो अंधकार और पीड़ा से घिरी है. उसके बच्चों से बंकिम आग्रह करते हैं कि वे अपनी मां की वंदना करें और उसे शोषण से बचाएं.

भारत को दुर्गा मां का प्रतीक मानने के कारण आने वाले सालों में वंदे मातरम् को मुस्लिम लीग और मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग शक की नज़रों से देखने लगा. इसी विवाद के कारण भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू वंदे मातरम् को आज़ाद भारत के राष्ट्रगान के रूप में नहीं स्वीकार करना चाहते थे.

मुस्लिम लीग और मुसलमानों ने वंदे मातरम् का इस वजह से विरोध किया था कि वो देश को भगवान का रूप देकर उसकी पूजा करने के ख़िलाफ़ थे.

नेहरू ने स्वयं रवींद्रनाथ ठाकुर से वंदे मातरम् को स्वतंत्रता आंदोलन का मंत्र बनाए जाने के लिए उनकी राय मांगी थी. रवींद्रनाथ ठाकुर बंकिम चंद्र की कविताओं और राष्ट्रभक्ति के प्रशंसक रहे थे और उन्होंने नेहरू से कहा कि वंदे मातरम् के पहले दो छंदों को ही सार्वजनिक रूप से गाया जाए.

हालांकि बंकिम चंद्र की राष्ट्रभक्ति पर किसी को शक नहीं था, सवाल यह था कि जब उन्होंने 'आनंदमठ' लिखा उसमें उन्होंने बंगाल पर शासन कर रहे मुस्लिम राजाओं और मुसलमानों पर ऐसी कई टिप्पणियां की थीं जिससे हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच तनाव पैदा हुआ.

वंदे मातरम् को हालांकि कई वर्ष पहले एक कविता के रूप में लिखा गया था लेकिन उसे बाद में प्रकाशित हुए आनंदमठ उपन्यास का हिस्सा बनाया गया. आनंदमठ की कहानी 1772 में पूर्णिया, दानापुर और तिरहुत में अंग्रेज़ और स्थानीय मुस्लिम राजा के ख़िलाफ़ सन्यासियों के विद्रोह की घटना से प्रेरित है.

आनंदमठ का सार ये है कि किस प्रकार से हिंदू संन्यासियों ने मुसलमान शासकों को हराया. आनंदमठ में बंकिम चंद्र ने बंगाल के मुस्लिम राजाओं की कड़ी आलोचना की. एक जगह वो लिखते हैं, "हमने अपना धर्म, जाति, इज़्ज़त और परिवार का नाम खो दिया है. हम अब अपनी ज़िंदगी गंवा देंगे. जब तक इन...(को) भगाएंगे नहीं तब तक हिंदू अपने धर्म की रक्षा कैसे करेंगे."

इतिहासकार तनिका सरकार के मुताबिक बंकिम चंद्र इस बात को मानते थे कि भारत में अंग्रेज़ों के आने से पहले बंगाल की दुर्दशा मुस्लिम राजाओं के कारण थी. 'बांग्ला इतिहासेर संबंधे एकटी कोथा' में बंकिम चंद्र ने लिखा,"मुग़लों की विजय के बाद बंगाल की दौलत बंगाल में न रहकर दिल्ली ले जाई गई." 

इतिहासकार केएन पणिक्कर मानते हैं कि बंकिम चंद्र के साहित्य में मुस्लिम शासकों के ख़िलाफ़ कुछ टिप्पणियों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि बंकिम मुस्लिम विरोधी थे. आनंदमठ एक साहित्यिक रचना है. उनका कहना है कि बंकिम चंद्र अंग्रेज़ी हुकूमत में एक कर्मचारी थे और उन पर अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लिखे गए हिस्से 'आनंद मठ' से निकालने का दबाव था. 

First published: 8 April 2017, 10:08 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी