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नौजवानों के 'यूथ आइकन' थे भगत सिंह, आजादी को बताते थे अपनी 'दुल्हन'

सुहेल खान | Updated on: 27 September 2018, 9:03 IST

आज भी जब हमें भगत सिंह का नाम सुनाते हैं तो सबसे पहले हम अपने देश के लिए कुछ कर गुजरने की बात सोचने लगते हैं, क्योंकि देश के सबसे महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अमर शहीद भगत सिंह भारत की उन महान विभूतियों में बहुत महत्वपूर्ण दर्जा रखते हैं जिन्होंने देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपना बलिदान दे दिया. मात्र 23 साल की उम्र में भगत सिंह ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए.

यही वजह थी कि अमर शहीद भगत सिंह स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में नौजवानों के लिए यूथ आइकन थे, जो देश के हर नौजवान को भारत की आजादी में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करते थे. भगत सिंह का जन्म एक सिख परिवार में जरंवाला पंजाब में 27 सितंबर 1907 को हुआ था. वो बचपन से उन्होंने अपने आसपास अंग्रेजों को भारतीयों पर जुर्म करते देखा. जिसके चलते कम उम्र में ही देश के लिए कुछ कर गुजरने की बात उनके मन में घर कर गई.

भगत सिंह सोचते थे कि नौजवान देश का काया पलट कर सकते हैं. इसीलिए उन्होंने देश के नौजवानों को एक नई दिशा दिखाने की कोशिश की. उनका पूरा जीवन संघर्ष से भरा रहा. आज भी देश के नौजवान उनके जीवन संघर्ष से प्रेरणा ग्रहण करते हैं.

ऐसे शुरु हुआ भगत सिंह का जीवन

भगत सिंह सिख परिवार में पैदा हुए थे. उनके जन्म के वक्त उनके पिता किशन सिंह जेल में बंद थे. भगत सिंह ने बचपन से ही अपने घर वालों में देशभक्ति का जज्बा देखा. उनके चाचा अजित सिंह बहुत बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे, जिन्होंने भारतीय देशभक्ति एसोसिएशन भी बनाई थी. जिसमें उनके साथ सैयद हैदर रजा भी थे. अंग्रेजी हुकूमत ने भगत सिंह के खिलाफ 22 केस दर्ज किए थे. जिनसे बचने के लिए उन्हें ईरान जाना पड़ा.

भगत सिंह के पिता ने उनका दाखिला दयानंद एंग्लो वैदिक हाई स्कूल में कराया था. 1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड से भगत सिंह बहुत दुखी हुए थे. उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन का खुलकर समर्थन किया. उसके बाद भगत सिंह ने खुलेआम अंग्रेजों को ललकारना शुरु कर दिया.

वो गांधी जी के कहे अनुसार ब्रिटिश हुक्म को जला दिया करते थे. चौरी-चौरा में हुई हिंसात्मक गतिविधि के चलते गांधी जी ने असहयोग आंदोलन बंद कर दिया. गांधी जी के इस फैसले भगत सिंह को दुखी कर दिया. इसके बाद उन्होंने गांधी जी की अहिंसावादी बातों को छोड़कर दूसरी पार्टी ज्वाइन करने की बात सोच ली.

जब वो लाहौर के नेशनल कॉलेज से BA कर रहे थे, तब उनकी मुलाकात सुखदेव, भगवती चरण और कुछ अन्य लोगों से हुई. उन दिनों आजादी की लड़ाई जोरों पर थी. देश की खातिर भगत सिंह ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी और पूरी तरह से आजादी की लड़ाई में कूद पड़े. इन्हीं दिनों में उनके परिवार ने उनके सामने शादी करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन भगत सिंह ने भारत की स्वतंत्रता के लिए शादी करने से इंकार कर दिया.

उन्होंने अपने परिवार से कहा, “अगर आजादी से पहले शादी करूं तो मेरी दुल्हन की मौत हो जाए.” भगत सिंह बहुत अच्छे एक्टर थे और वो बहुत से नाटकों में भाग भी लिया करते थे. उनके नाटकों की स्क्रिप्ट पूरी तरह से देशभक्ति से परिपूर्ण होती थी. जिसमें वो कॉलेज के नौजवानों को आजादी के लिए आगे आने के लिए प्रोत्साहित करते थे. साथ ही नाटकों के जरिए अंग्रेजों को नीचा दिखाया करते थे. भगत सिंह बहुत मस्त मौला इंसान थे, उन्हें लिखने का बहुत शौक था. इसीलिए उन्हें निबंध में बहुत से प्राइज मिला करते थे.

स्वतंत्रता की लड़ाई में ऐसे हुए शामिल

पूरी तरह से देश के लिए समर्पित होने के बाद भगत सिंह ने सबसे पहले नौजवान भारत सभा ज्वाइन की. जब उनके परिवार ने उन्हें यकीन दिलाया कि अब वे उनसे शादी के बारे में बात नहीं करेंगे तो भगत सिंह अपने घर लाहौर लौट गए. वहां उन्होंने कीर्ति किसान पार्टी के लोगों से मेल जोल बढ़ाया और उनकी मैगजीन कीर्ति के लिए काम करने लगे.

भगत सिंह इस मैगजीन के जरिए देश के नौजवानों तक अपना संदेश पहुंचाते थे. भगत सिंह बहुत अच्छे लेखक थे, जो पंजाबी उर्दू-पेपर के लिए लिखा करते थे. 1926 में नौजवान भरत सभा में भगत सिंह को सेक्रेटरी बना दिया गया. इसके बाद 1028 में उन्होंने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ज्वाइन कर ली. जो मौलिक पार्टी थी

इस पार्टी को चंद्रशेखर आजाद ने बनाया था. इस पार्टी ने एक साथ मिलकर 30 अक्टूबर 1928 को भारत आए साइमन कमीशन का विरोध किया. जिसमें उनके साथ लाला लाजपत राय भी थे. “साइमन वापस जाओ” का नारा लगाते हुए वो लाहौर रेलवे स्टेशन में ही खड़े रहे. इसके बाद वहां लाठीचार्ज कर दिया गया. जिसमें लाला लाजपत राय बुरी तरह जख्मी हो गए और उनकी मृत्यु हो गई.

लाला लाजपत राय की मृत्यु से आघात भगत सिंह और उनकी पार्टी ने अंग्रेजों से बदला लेने की ठानी और लाला जी की मौत के लिए जिम्मेदार ऑफिसर स्कॉट को मारने का प्लान बनाया. लेकिन गलती से उन्होंने असिस्टेंट पुलिस ऑफिसर सांडर्स को मार डाला. खुद को बचाने के लिए भगत सिंह तुरंत लाहौर से भाग गए. लेकिन ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें ढूंढने के लिए चारों ओर जाल बिछा दिया. भगत सिंह ने खुद को बचाने के लिए दाढ़ी कटवा ली जो उनकी सामाजिक धार्मिकता के खिलाफ थी. लेकिन भगत सिंह ने उस समय देश के लिए सब कुछ त्याग दिया.

भगत सिंह ने चंद्रशेखर आजाद, राजदेव और सुखदेव के साथ मिलकर कुछ बड़ा धमाका करने की सोची. भगत सिंह कहते थे अंग्रेज बहरे हो गए हैं. उन्हें ऊंचा सुनाई देता है. जिसके लिए बड़ा धमाका जरूरी है. इस बार उन्होंने फैसला लिया कि वे कमजोर नहीं रहेंगे और अपने आपको पुलिस के हवाले कर देंगे.

जिससे देश को सही संदेश पहुंचे. दिसंबर 1929 में भगत सिंह ने अपने साथी बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर ब्रिटिश सरकार की असेंबली हॉल में बम ब्लास्ट कर दिया. ये ब्लास्ट सिर्फ आवाज के लिए था. जिसे खाली जगह पर फेंका गया था. इसके साथ ही उन्होंने इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाए और पर्चे बांटे उसके बाद खुद को पुलिस के हाथों गिरफ्तार करवा दिया.

भगत सिंह अपने आप को शहीद कहा करते थे. भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव पर मुकदमा चलाया गया. जिसमें उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई. कोर्ट में भी तीनों इंकलाब जिंदाबाद का नारा लगाते रहे. भगत सिंह को जेल में बहुत यातनाएं दी गईं. उन्हें ना अच्छा खाना दिया जाता था और ना ही कपड़े. तब कैदियों की स्थिति को सुधारने के लिए उन्होंने जेल के अंदर ही आंदोलन शुरु कर दिया. उन्होंने अपनी मांगें पूरी करवाने के लिए कई दिनों तक अन्न और पानी का त्याग कर दिया.

जिसके लिए पुलिस ने उनपर तमाम अत्याचार किए और तरह-तरह की यातनाएं भी दीं. लेकिन भगत सिंह अंग्रेजों के सामने झुकने वाले कहां थे. आखिर में 23 मार्च 1931 को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी गई. इस तरह तीनों हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गए.

कहा जाता है कि तीनों की फांसी की तारीख 24 मार्च थी लेकिन पूरे देश में उनकी रिहाई के लिए चल रहे आंदोलनों की वजह से अंग्रेजों ने उन्हें 23-24 मार्च की मध्यरात्रि में फांसी के फंदे पर लटका दिया और अंतिम संस्कार कर दिया.

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First published: 26 September 2018, 15:27 IST
 
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