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जब जेल के साथियों में भगत सिंह की निशानियां पाने की लगी होड़, जेलर को निकालना पड़ा ड्रॉ

कैच ब्यूरो | Updated on: 26 September 2018, 15:27 IST

भगत सिंह जयंती: भगत सिंह का नाम उन मतवाले देशभक्तों में शामिल है जिन्होंने अपनी जान की परवाह किये बिना अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लिया. भगत सिंह ने मात्र 23 साल की उम्र में वतन के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी. संसद में बम फोड़ के अंग्रेजों को धमाका सुनाने का काम करने वाले भगत सिंह आजादी के ऐसे क्रांतिकारी हैं जो आज भी देश के युवाओं के दिलों में बसते हैं.

भगत सिंह से जुड़े कुछ रोचक तथ्य हैं जो उनकी उनके साथियों में लोकप्रियता की कहानी बयान करते हैं. भगत सिंह को लाहौर षड़यंत्र केस में जेल हुई थी, जब उनके साथियों ने उनसे पूछा की आपने खुद का और अपने साथियों का बचाव क्यों नहीं किया? तो उनका जवाब था की आज़ादी के लिए क़ुरबानी दी जाती है, सरकार के सामने याचिका नहीं.

लाहौर सेंट्रल जेल में 23 मार्च, 1931 की शुरुआत रोज की तरह ही हुई. सबको पता था की भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जानी है. लेकिन किसी को ये नहीं मालूम था की वक़्त के पहले ही तीनों को मौत की सजा दे दी जाएगी. जेल के क़ैदियों को थोड़ा अजीब तब लगा जब चार बजे ही वॉर्डेन चरत सिंह ने उनसे आकर कहा कि वो अपनी-अपनी कोठरियों में चले जाएं. उन्होंने कारण नहीं बताया.

इधर भगत सिंह अपनी कोठरी में सुकून से बैठे किताबें पढ़ रहे थे. मानो मौत को गले लगाने के लिए बिल्कुल तैयार हों. जेल का नाई बरकत हर कमरे के सामने से फुसफुसाते हुए गुज़रा कि आज रात भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दी जाने वाली है. साथी कैदियों पर भगत सिंह का इतना असर था की वो इसी भी तरह उनके साथ को छोड़ना नहीं चाहते थे.

जब ये पता चला की वक़्त के पहले ही उन तीनों को फांसी दे दी जाएगी तो साथी क़ैदियों ने बरकत से मनुहार की कि वो फांसी के बाद भगत सिंह की कोई भी चीज़ जैसे पेन, कंघा या घड़ी उन्हें लाकर दें ताकि वो अपने पोते-पोतियों को बता सकें कि कभी वो भी भगत सिंह के साथ जेल में बंद थे.

बरकत भगत सिंह की कोठरी में गया और वहां से उनका पेन और कंघा ले आया. सारे क़ैदियों में होड़ लग गई कि किसका उस पर अधिकार हो. आखिर में ड्रॉ निकाला गया. भगत सिंह पर इस तरह से सब अपना हक़ जताना चाहते थे. भगत सिंह तब भी सबके दिलों में थे और भगत सिंह आज भी सबके दिलों में उतने ही जोश के साथ बसते हैं, जितना की 'इंकलाब जिंदाबाद'

 

First published: 26 September 2018, 14:24 IST
 
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