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भिखारी ठाकुर: हंसी... हंसी पनवा खियउले बेइमनवा कि अब ना बसे रे परदेस

राजेश कुमार | Updated on: 18 December 2016, 18:49 IST
(एजेंसी)

भोजपुरी के 'शेक्सपीयर' कहे जाने वाले प्रसिद्ध कवि और रचनाकार भिखारी ठाकुर का रविवार जन्मदिन है.

बिहार के सारन जिले के कुतुबपुर (दियारा) गांव में 18 दिसंबर 1887 को एक नाई परिवार में जन्मे ठाकुर की रचनाओं से ही भोजपुरी बोली को पूरे विश्व में एक अलग पहचान मिली.

भिखारी ठाकुर का परिचय इन दो पंक्तियों से समझा जा सकता है.

केहु कहत बा राय बहादुर, केहु कहत बा शेक्सपीयर,

केहु कहत बा कवि भिखारी, घर कुतुबपुर दीपक.

भिखारी ठाकुर के पिता का नाम दल सिंगार ठाकुर और माता का नाम शिवकली देवी था. भिखारी ठाकुर की मातृभाषा भोजपुरी थी और इसी को लेकर उन्होंने आगे चलकर अपनी काव्य और नाटकों की भाषा बनाया.

भिखारी ठाकुर के बारे में हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह ने अपनी कविता में लिखा था-

अब तो ये बहस चलती ही रहेगी

कि नाच का आज़ादी से

रिश्ता क्या है

और अपने राष्ट्रगान की लय में

वह ऐसा क्या है

जहां रात-बिरात जाकर टकराती है

बिदेसिया की लय

भोजपुरी समाज में बाबा भिखारी ठाकुर की लोकप्रियता को देखते हुए ही महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने भिखारी ठाकुर को भोजपुरी का अनगढ़ हीरा कहा था.

वहीं, बेहतरीन नाटकों को रचने के लिए प्राचार्य मनोरंजन प्रसाद सिन्हा ने उन्हें भोजपुरी का 'शेक्सपीयर' कहा था.

भिखारी ठाकुर की अमर रचना 'बिदेसिया' पर जब एसएन त्रिपाठी ने 1963 में फिल्म बनाई, तो भिखारी ठाकुर राष्ट्रीय फलक पर आ गए. फिल्म का गीत और संगीत आज भी यादगार है.

इस फिल्म के गाने भिखारी ठाकुर के नाटक बिदेसिया से ही लिए गए थे. फिल्म में 'बिदेसिया' का नायक कहता है कि मैंने इतना धन कमाया कि दरिद्र हो गया. ये समाज की सच्चाई को शब्द देने की तरह है.

भिखारी ठाकुर जब अपनी रचनाओं को शब्द देने में जुटे हुए थे, उस वक्त समाज तेज़ी से बदल रहा था. बदलने वाला समाज मूल रूप से अर्थव्यवस्था के साथ ही कदमताल करने लगा था.

गांव में खेती पर निर्भरता धीरे-धीरे कम हो रही थी. घरेलु कुटीर उद्योग घट रहे थे, गांव की बड़ी आबादी शहरों की तरफ पलायन कर रही थी.

ऐसे वक्त में भिखारी ठाकुर ने लोकधुनों, बिरहा-कजरी, लोरिक-व्रिजभान और आल्हा की तर्ज पर अपने संगीतमय नाटकों की रचना की.

आज भी भोजपुरी मनोरंजन की दुनिया भिखारी ठाकुर से ही शुरू होती है. उनका संगीत लोककंठ में बसा कभी ना थकने वाला संगीत है.

कई लोग आरोप लगाते हैं, कि स्वाधीनता संग्राम के उथल-पुथल भरे दौर में बाबा भिखारी ठाकुर निरपेक्ष होकर नाचते रहे, लेकिन सच्चाई ये है कि भिखारी ठाकुर के नाच का आज़ादी से सघन रिश्ता था.

अंग्रेजों से देशमुक्ति के कोलाहल के बीच उनका नाच आधी आबादी के मुक्ति संघर्ष की ज़मीन रच रहा था. भिखारी ठाकुर की आवाज़ अधरतिया की आवाज़ थी. अंधेरे में रोती-कलपती और छाती पर मुक्के मार-मार कर विलाप करती स्त्रियों की आवाज़ थी.

ये आवाज़ मुक्ति संग्राम में नारों और जयघोषों को चीर कर गूंजती रही और आज भी गूंज रही है.

भिखारी ठाकुर की पढ़ाई-लिखाई ढंग से नहीं हो पाई, लेकिन अब उनकी किताबों पर पढ़े-लिखे लोग शोध करते हैं.

जिस समाज में नाच देखना अच्छा नहीं माना जाता था, वहां बाबा भिखारी ठाकुर ने नाच के जरिये ही समाज के ज्वलंत मुद्दों को सुर देने का काम किया.

उस दौर में भिखारी ठाकुर का बस नाम ही काफी था, सुनते ही लोग बरबस ही खिंचे चले आते थे. 10-10 कोस से लोग भिखारी ठाकुर का नाच देखने के लिए आते थे. कहा जाता है कि इतनी भीड़ जुटती थी कि इंतजाम के लिए कई थानों की पुलिस बुलानी पड़ती थी.

भिखारी ठाकुर की लिखी क़िताबें वाराणसी, हावड़ा और छपरा से प्रकाशित हुई, जिसमें प्रमुख हैं, 'बिदेसिया', 'भाई-बिरोध', 'बेटि-बेचवा', 'कलयुग प्रेम', 'गबर घिचोर', 'गंगा स्नान', 'ननद-भौजाई', 'बहरा बहार', 'कलियुग-प्रेम', 'राधेश्याम-बहार' और 'बिरहा-बहार'.

10 जुलाई 1971 को 84 साल की उम्र में भोजपुरी भाषा के सबसे बड़े कलाकार का निधन हो गया. भिखारी ठाकुर हमारे बीच नहीं रहे, लेकिन उनके गाए गीत आज भी गूंज रहे हैं.

First published: 18 December 2016, 18:49 IST
 
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