Home » कल्चर » Mirza Ghalib was born on december 27, 1797 in Agra
 

मिर्ज़ा ग़ालिब के चुनिंदा 10 शेर जो रहेंगे हमेशा ज़िंदा

सुधाकर सिंह | Updated on: 27 December 2016, 10:57 IST

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़-ए बयां और...ख़ुद के बारे में ग़ालिब ने लिखा था कि दुनिया में बहुत से कवि-शायर ज़रूर हैं, लेकिन उनका लहजा सबसे निराला है. जी हां मिर्ज़ा असदुल्लाह बेग ख़ां उर्फ 'ग़ालिब'. शेरो-शायरी का वो नाम, जिसके चाहने वाले दुनिया के हर कोने में मिल जाएंगे. 

उर्दू और फ़ारसी भाषा के महान शायर मिर्ज़ा ग़ालिब को उर्दू का सर्वकालिक महान शायर माना जाता है. यही नहीं फ़ारसी कविता को हिन्दुस्तानी ज़ुबान में उतरवाने का भी श्रेय उनको है.  मीर तक़ी मीर के बाद ग़ालिब ने इस विधा को लोकप्रिय बनाया. 

27 दिसंबर 1797 को आगरा में जन्मे ग़ालिब का ताल्लुक सैनिक पृष्ठभूमि वाले परिवार से था. उन्होंने अपने पिता और चाचा को बचपन में ही खो दिया था. ग़ालिब का जीवनयापन अपने चाचा के मरणोपरांत मिलने वाले पेंशन से होता था, जो ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी मे सैन्य अधिकारी थे. 

इसके साथ ही ग़ालिब की पृष्ठभूमि एक तुर्क परिवार से थी और इनके दादा मध्य एशिया के समरक़न्द से सन् 1750 के आस-पास भारत आए थे. उनके दादा मिर्ज़ा क़ोबान बेग ख़ान अहमद शाह के शासन काल में समरकंद से भारत आए. पुरानी दिल्ली के बल्लीमारन इलाके में उनके जीवन का काफी हिस्सा बीता.

ग़ालिब के लिखे ख़त, जो उस वक्त प्रकाशित नहीं हो सके, उन्हें उर्दू लेखन का अहम दस्तावेज़ माना जाता है. मिर्ज़ा ग़ालिब चाहने वालों की भारत के साथ ही पाकिस्तान में भी बड़ी जमात है. उन्हें दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का ख़िताब भी मिला. उनकी रचनाओं का संग्रह दीवान-ए-ग़ालिब काफी मशहूर है. 

ग़ालिब (और असद) नाम से लिखने वाले मिर्ज़ा मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे थे. आगरा, दिल्ली और कलकत्ता (अब कोलकाता) में अपनी जिंदगी गुज़ारने वाले ग़ालिब को उनकी उर्दू ग़ज़लों के लिए याद किया जाता है. मिर्जा गालिब के आख़िरी दिन काफ़ी मुफ़लिसी में गुजरे थे, जिसका असर उनकी शायरी पर भी दिखता है. एक नज़र उनकी दस मशहूर नज़्मों पर: 

मिर्ज़ा ग़ालिब की 10 मशहूर नज़्म

1. तेरे वादे पर जिये हम, तो यह जान, झूठ जाना,

कि ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता... 

2. दिल-ए-नादां तुझे हुआ क्या है आख़िर इस दर्द की दवा क्या है... 

मैं भी मुंह में ज़बान रखता हूं काश पूछो कि मुद्दआ क्या है... 

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद, जो नहीं जानते वफ़ा क्या है... 

3. इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा, लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं... 

4. ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे...

5. इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना... 

6. उनके देखे से जो आ जाती है मुंह पे रौनक वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है...

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है... 

7. हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी के हर ख़्वाहिश पे दम निकले बहुत निकले मेरे अरमां लेकिन फिर भी कम निकले...  

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन बहुत बेआबरू होकर तेरे कूचे से हम निकले...  

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का उसी को देख के जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले...  

8. इश्क़ ने 'ग़ालिब' निकम्मा कर दिया वर्ना हम भी आदमी थे काम के...

9. आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक कौन जीता है यहां तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक...

आशिक़ी सब्र-तलब और तमन्ना बेताब दिल का क्या रंग करूं ख़ून-ए-जिगर होने तक...

हम ने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन ख़ाक हो जाएंगे हम तुमको ख़बर होने तक...

10. खेल समझा है कहीं छोड़ न दे भूल न जाए 

काश! यूं भी हो कि बिन मेरे सताए न बने...

इस नज़ाकत का बुरा हो वो भले हैं तो क्या? 

हाथ आएं तो उन्हें हाथ लगाए न बने...

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'

कि लगाए न लगे और बुझाए न बने...

रेख़्ता
First published: 27 December 2016, 10:57 IST
 
अगली कहानी