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उपन्यास अंश: गांव-कस्बे-मेट्रो के कॉकटेल से बनी एक कहानी

अनिल यादव | Updated on: 13 December 2015, 13:02 IST
QUICK PILL
दो दशक से ज्यादा वक्त पत्रकारिता में बिता चुके अनिल यादव के सफर में गाहे-बगाहे साहित्य के पड़ाव भी आते रहे हैं. लगभग सभी युवा पुरस्कारों की तयशुदा आयुसीमा पार करने के बाद इनकी दो कृषकाय किताबें आयीं. \'वह भी कोई देस है महराज\' और \'नगरवधुएं अखबार नहीं पढ़तीं\' नाम की उनकी दोनों किताबें हिंदी के ज्ञातकुलशीलों को खूब पसंद आयीं. अब उन्होंने कथित तौर पर एक और उपन्यास पूरा कर लिया है. इसका संभावित नाम \'अनंत और पेंग्विन\' है. इसी उपन्यास का एक अंश पाठकों के लिए प्रस्तुत है:

भारत अलग टाइम जोन में है. अमेरिका अलग टाइम जोन में है. अनंत अमेरिका जाकर इन दोनों से परे तीसरे टाइम जोन में पहुंच गया था. जो आदमी का ही रचा हुआ है, जिसमें अपने होने का पता तो चलता है लेकिन यह समझ नहीं आता कि मैं कहां हूं, उस जगह बने रहने के कारण पैदा होने वाले विचारों को निर्देशित मकसद के लिए लिखने के एवज में मोटी तनख्वाह मिलती है, इस काम को सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग कहते हैं.

अनंत को आश्चर्य होता है कि उन दो सालों में वह तीन बार भारत आया लेकिन कभी किसी ने नहीं पूछा कि वह करता क्या है, पिता ने भी नहीं जो गर्व की नियमित खुराक यह बताकर लिया करते थे कि उनका बेटा न्यूयार्क में रहता है और गूगल में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है.

बच्चे उसके जैसा होना चाहते थे, पड़ोसी अपने बिगड़े कंप्यूटर ठीक कराना चाहते थे, दोस्त छिपे और जाहिर तरीकों से उसके पैकेज और नाइट लाइफ को जानना चाहते थे, पहली बार मिलने वाले अपरिचितों से बातचीत दिलचस्प होती थी. वे पूछते थे वह क्या करता है, वह बताता था सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और बातचीत वहीं सूख कर मुरझा जाती थी, थोड़ी देर बाद वे छींटे मारने लगते थे कि उनका फलां रिश्तेदार भी आईटी इंडस्ट्री में है और आजकल खूब पैसा पीट रहा है.

पहली बार मिलने वाले अपरिचितों से बातचीत दिलचस्प होती थी. वे पूछते थे वह क्या करता है, वह बताता था सॉफ्टवेयर इंजीनियर है और बातचीत वहीं सूख कर मुरझा जाती थी

एक प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी से बीई और कंप्यूटर साइंस में मास्टर डिग्री लेने के बाद उसने बंगलुरू में तीन साल एक कंपनी में क्लाइंटों के कंप्यूटर ठीक करते, कर्मचारियों को नए सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल बताते, आफिस-आफिस खेलते हुए एक नवस्वाधीन बैचलर की जिंदगी के सुखों का गहरा अनुसंधान किया. पहला मौका मिलते ही वह अमेरिका पहुंच गया तब जान पाया कि कंप्यूटर साइंस क्या चीज है.

वह शुरूआती दिनों में अक्सर एक पुरानी इमारत के चौथे फ्लोर पर स्थित गूगल के आफिस से निकल कर मैनहट्टन के कोलंबस एवेन्यू पर ठिठक जाता था, हड्सन स्ट्रीट से आती अटलांटिक महासागर की हवा के साथ यह ख्याल चला ही आता था कि समुद्र की एकरस अनिश्चितता में हफ्तों भटकने के बाद जब कोलंबस को अचानक किसी नए द्वीप का सबसे पहला महीन संकेत देने वाले किसी तारे, किसी पक्षी, किसी गंध, किसी हवा, किसी वनस्पति से सामना हो जाता होगा तो क्या कुछ ऐसा ही आनंद नहीं मिलता होगा जिसे वह अपने सीने में लिए न्यू जर्सी में अपने फ्लैट की ओर चला जा रहा है.

उसने कंप्यूटर के टाइमजोन में रहते हुए, उसकी भाषा में सोचते हुए भौतिकी, गणित, इलेक्ट्रानिक्स के लंबे इतिहास में बने नियमों, रिवाजों, परंपराओं, मिथकों, अंधविश्वासों का इस्तेमाल करते हुए वह कोड बनाना सीख लिया था जिससे मनचाहे सॉफ्टवेयर बनाकर कंप्यूटर से कंप्यूटरी का प्यार कराकर बच्चे पैदा कराने के अलावा लगभग सबकुछ कराया जा सकता है.

मौका मिलते ही टेक्नालॉजी के धुंधले स्पेस में तैरते हुए वह जान गया था कि सॉफ्टवेयर कुछ और नहीं एक आदमी का रिकार्डेड विचार है जिसे पहले सी या जावा भाषा में लिख लिया जाता है फिर प्रोग्रामिंग के बाद कंप्यूटर पर चलाया जाता है. जल्दी ही वह अपने मैनेजर फ्रैंक मैक्कार्ट से उस कंप्यूटरी भाषा में बात करने लगा जिसे यदि जार्ज वाशिंगटन भी सुनते तो समझ नहीं सकते थे क्योंकि तब कंप्यूटर नहीं था.

इतिहास में बने नियमों, रिवाजों, परंपराओं, मिथकों, अंधविश्वासों का इस्तेमाल करते हुए वह कोड बनाना सीख लिया था जिससे मनचाहे सॉफ्टवेयर बनाकर कंप्यूटर से कंप्यूटरी का प्यार कराकर बच्चे पैदा कराने के अलावा लगभग सबकुछ कराया जा सकता है


पिता के दबाव डालने पर, जमाने की भेड़चाल चलते हुए उसने स्मृति को बैल की तरह किताबों के खेत में जोतकर मोटी तनख्वाह वाली अपमार्केट नौकरी हासिल तो कर ली थी लिकन कंप्यूटर उसे बौद्धिक स्पंदन और विचारों की उड़ान दे सकता है, ऐसा उसने कभी सोचा नहीं था.किस्मत अच्छी थी कि उसे गूगल में कोई भारतीय मैनेजर नहीं मिला था वरना पेपरवर्क और रूटीन के असाइनमेन्ट्स लादकर दफ्तरी गधा बना डालता. अमेरिका में आईटी कंपनियों के इंटरव्यू में भारतीय अफसर अपने देश के लड़के लड़कियों से सबसे टेढ़े सवाल पूछते हैं, दफ्तर में सबसे ज्यादा देर तक रोकते हैं और बाहर सड़क पर मिलने पर हैलो तक नहीं करते.

अंग्रेज बनने का स्वप्न उनके किसी पूर्वज के डीएनए में तब आया होगा जब भारत अंग्रेजों का गुलाम था जिसे आजाद हुए साठ साल से ज्यादा अरसा बीत चुका लेकिन गुलामी के साइडइफेक्ट काफी बचे हुए हैं, चूंकि वह डीएनए कोड आनुवांशिक रास्तों से गुजरते हुए किसी कार्टून फिल्म के सॉफ्टवेयर में बदल चुका है इसलिए वे अब अपनी चमड़ी, चिंतन और चेतना सबको बाईपास करते हुए अंग्रेजों का भी बाप बनने की कोशिश करके यूरोप में हास्य पैदा करते रहते हैं.

उसे अजीब लगता था कि आइरिश मूल के मैनेजर फ्रैंक को कुछ कहना होता था तो वह खुद चलकर उसके क्यूबिकल तक आता था, उसने कहा, आप भी मुझे बंगलुरू आफिस के मैनेजर की तरह अपने केबिन में बुला सकते हैं, फ्रैंक ने समझाया अगर उसे काम है तो उसे ही उठकर कर्मचारी तक जाना चाहिए, जहां व्यक्ति की कद्र नहीं होती वहां काम पीछे चला जाता है चमचागिरी ऊपर आ जाती है.

फ्रैंक उसके लॉजिक के बहाव के बीच में अचानक व्यावहारिकता को छू लेने वाली देसी कल्पनाशीलता की सार्वजनिक तौर पर तारीफ करता था लेकिन उसने उसके नाम का तियां पांचा कर दिया था. वह कहता था, एनॉट एक सॉफ्टवेयर डेवलपर को थोड़ा सा कवि, थोड़ा सा सेल्समैन, थोड़ा सा वक्ता, थोड़ा डिजाइनर और इतनी ही मात्रा में तार्किक और संवेदनशील होना पड़ता है. तुम अगर प्रेम जैसी फालतू चीज के चक्कर में न पड़ो तो बहुत अच्छे कोड राइटर बन सकते हो.वह भारतीयों से बात करते हुए हमेशा भाषा का खेल कर देता था यानि सेक्स को प्रेम कहता था.

ए नॉट यानि एक आदमी जो नहीं है या एक गांठ जो सही जगह पर लग चुकी है. कंप्यूटर को पालतू बनाने का चस्का लग चुका था इसलिए अनंत को यह नाम ठीक ही लगा, आखिर कंप्यूटर के लिए उसके गणितीय व आध्यात्मिक स्पर्श वाले नाम, गेहुंआ रंगत वाले उत्तर भारतीय चेहरे, गांव-कस्बे-मेट्रो के कॉकटेल से बने व्यक्तित्व का क्या मतलब है.

रेस्टोरेंट, डिस्को, लाइब्रेरी या सड़कों के जरिए अमेरिकी समाज में घुसते हुए उसके एक कोड का पता चला जिससे बच्चे वह सब कर गुजरते हैं जिसकी दुनियादार लोग कल्पना भी नहीं कर सकते

वह हर आदमी को चिन्हों, संख्याओं, अक्षरों के एक खास सिलसिले से पहचानता है जिसे पासवर्ड कहते हैं.शुरूआती दिनों में जब वह नए वर्क कल्चर, नए सहयोगियों से परिचित हो रहा था रेस्टोरेंट, डिस्को, लाइब्रेरी या सड़कों के जरिए अमेरिकी समाज में घुसते हुए उसके एक कोड का पता चला जिससे बच्चे वह सब कर गुजरते हैं जिसकी दुनियादार लोग कल्पना भी नहीं कर सकते.

बच्चे नहीं जानते कि उनके पास जो चल रहा है उसका वास्तविक अर्थ क्या है, उनकी चेतना आसपास के अधिकांश परिवेश को दर्ज ही नहीं करती इसलिए वे बिना झिझके अधिक फोकस के साथ अपनी प्रेरणाओं का पीछा करते हुए बिल्कुल नई हरकतें करते हैं. अमेरिका के बारे में कुछ न जानना बहुत बड़ी नेमत थी.

छत में लगी लाइटों से क्यूबिकल्स में बैठे सहकर्मियों के ऊपर झरता नीला प्रकाश जितना जीवंत था आफिस का माहौल उतना ही ठंडा और तटस्थ था, प्रोफेशनल ढंग से व्यक्तित्व को काटकर सिर्फ परफार्मर हिस्से से संवाद करने का फैशन था इसलिए अनंत ने कुछ ज्यादा ही तीव्रता से नोटिस किया कि एक गंजा भारतीय सुपरवाइजर ज्यादा ही गर्मजोशी से हाथ मिलाता है, कैंटीन में मिलता है तो बातचीत में उसकी अपनी बोली भोजपुरी का कोई एक शब्द हमेशा मिला देता है, कॉमन रूम में सामने पड़ जाने पर बैट थमाते हुए टेबल टेनिस का एक गेम खेलने के लिए कहता है.

गुलामी के साइडइफेक्ट काफी बचे हुए हैं, चूंकि वह डीएनए कोड आनुवांशिक रास्तों से गुजरते हुए किसी कार्टून फिल्म के सॉफ्टवेयर में बदल चुका है इसलिए वे अब अपनी चमड़ी, चिंतन और चेतना सबको बाईपास करते हुए अंग्रेजों का भी बाप बनने की कोशिश करके यूरोप में हास्य पैदा करते रहते हैं.


उसने पहले महीने में तीन बार स्नैक्स-काफी का बिल दिया और पहली अनौपचारिक बातचीत में क्वीन्स, न्यूजर्सी के उन भारतीय रेस्टोरेन्टों का अपनी जीभ पर लिखा इतिहास बताया जहां दाल-भात और ब्लैक फ्राइडे से क्रिसमस के बीच बाटी-चोखा भी मिल सकता था. अनंत सतर्क होने लगा, शायद मुंशी प्रेमचंद के बड़े भाईसाहब हैं जो धीरे धीरे नैतिक पुलिस की वर्दी पहन रहे हैं.गंजे सर के दांत बेहद उजले थे, कोई गंभीर बात कहने से पहले वे दोनों कलाइयों को नाप कर पक्का कर लेते थे कि आसमानी रंग की कमीज के बटन बंद हैं और गरदन को ऊपर झटक कर टाई को महसूस कर लेते थे.

एक दिन टेबल टेनिस के मैच में शायद जानबूझ कर हारने के बाद कैंटीन की ओर चलते हुए उन्होंने अनंत के कंधे पर हाथ रखकर खिंची मुस्कान के साथ पूछा, आर यू अ ब्राह्मिन!नहीं तो लेकिन इससे क्या फर्क पड़ता है सर, कंप्यूटर तो मुझे एक भारतीय के रूप में भी नहीं पहचानता.यहां अमेरिका में हम कुछ नहीं हैं लेकिन वहां तो हर एक की जाति होती है, तुम्हारी भी होगी, तुम एक स्कॉलर की तरह चलते हो इसलिए पूछ लिया.मैं वहां भी जाति के पचड़े से एक तरह से बचा ही रह गया इसलिए उसे ढोकर यहां लाने का कोई मतलब नहीं था.

उन्होंने कैंटीन में उसे अदरक वाली स्पेशल चाय पिलाते हुए दांतों को मुस्कान की तरह संयोजित कर जाति का रहस्य खोला, कुछ महीने में तुम्हें यहां एक साल हो जाएगा, ग्रीन कार्ड के लिए अप्लाई करोगे और अमेरिका के नागरिक हो जाओगे, मेरे एक रिश्तेदार हैं जिनके यहां क्वीन्स में तीन रेस्टोरेन्ट और एक डिपार्टमेंटल स्टोर है, उनकी इकलौती बेटी है, वे अपने घर के आसपास का कोई लड़का खोज रहे हैं, तुम चाहो तो उनसे तुम्हारी मुलाकात करा सकता हूं.सॉरी सर मैं यहां शादी करने नहीं आया हूं.

तुम जिंदगी भर सॉफ्टवेयर डेवलपिंग नहीं कर पाओगे. यहां जीने के लिए बहुत पैसा चाहिए, अगर तुम्हें जुकाम हो जाए, मैनहट्टन में किसी डाक्टर को दिखाने जाओ तो पंद्रह मिनट की कंसलटेन्सी के 200 डालर ले लेगा.

अनंत को अच्छे प्रोजेक्टस मिल रहे थे, वह मंझोले, बड़े साउथ एशियन क्लाइंटस को डील कर रहा था और वीकेंड पर फाइव स्टार लाइफ स्टाइल वाले भारतीय बैचलरों के फ्लैट पर होने वाली पार्टियों के न्यौते मिल रहे थे जिनमें टल्ली होने के बाद दुनिया की सबसे महंगी सिगरेटों के धुंए में कालेज लाइफ के अतिरंजित किस्सों, गर्लफ्रेंडों, मां के हाथ के बने खाने और बेफिक्र दिनों को याद किया जाता था.

यहां अमेरिका में सिर्फ सेक्स मिल सकता था जो इतना औपचारिक, शक्तिशाली, जानवरों की नकली कराहों से कंपकंपाता अजनबी दैहिक मुद्राओं वाला था कि लाज जैसे खामोश उत्प्रेरक की तलाश करती देसी कामुकता खुद को बहुत जल्दी अनाथ महसूस करने लगती थी


भारत के छोटे कस्बों में छूट गईं भावनाओं से सजल लड़कियां सबसे अधिक याद आती थीं क्योंकि अगर अच्छा कैरियर हो तो वहां फ्लर्ट और प्यार बहुत आसान था, यहां अमेरिका में सिर्फ सेक्स मिल सकता था जो इतना औपचारिक, शक्तिशाली, जानवरों की नकली कराहों से कंपकंपाता अजनबी दैहिक मुद्राओं वाला था कि लाज जैसे खामोश उत्प्रेरक की तलाश करती देसी कामुकता खुद को बहुत जल्दी अनाथ महसूस करने लगती थी.

जो बैचलर यहां ग्रीन कार्ड पाने वाले थे उनमें से बहुतों के पास बीएमडब्लू, लेक्सस या मर्सीडीज कारें थीं, चलता है तो चल के न्यौते पर चश्मों के भीतर से हां कहने वाले को आनन फानन में जमा कर केप में, स्काईबीच या अटलांटा सिटी के बार, सभी किस्मों के नाइट क्लबों, कसीनो में जाया जा सकता था.

अटलांटा सिटी के एक नाइट क्लब में अनंत का दिल उतनी ही खामोशी से टूटा जैसे आधा पानी आधा क्रिस्टल बरफ टूटती है, उसने निराश कर देने वाले ऐसे सच का साक्षात्कार किया जिसे स्वीकार कर पाने की हिम्मत उस समय उसमें नहीं थी.वह एक दूसरी मल्टीनेशनल आईटी कंपनी में काम करने वाले, यूनिवर्सिटी के दिनों के दोस्त आयुष के साथ बैठा बीयर पी रहा था.

अनंत ने उसे बताया कि एक गंजे सर ने गूगल में मैरिज व्यूरो खोल रखा है जिसमें वह चाहे तो अपनी जाति बताकर रजिस्ट्रेशन करा सकता है, दहेज में अमेरिका में तीन रेस्टोरेंट और एक किराने की दुकान का ऑफर है. आयुष ने फौरन पहचान लिया, अच्छा बेटा तुम भी ओईबीआर तिवारी के हत्थे चढ़ ही गए.उनका नाम ओमप्रकाश तिवारी है.

ना, . . बी. आर. यानि वन एक्सट्रा बेडरूम तिवारी को ही सब जानते हैं, ओमप्रकाश को कोई नहीं जानता, अपने आफिस में पूछ कर देखना.आयुष का फोन आया, उसने हाथ में थामा कई दिन पुराना एक हिंदी का अखबार अनंत को दिया ताकि वह थोड़ी देर अकेले बैठ सके, क्लब में हो रहे शोर के कारण वह फोन पर बात करने बाहर निकल गया, वह अखबार में अपने शहर की कोई खबर ढूंढ़ रहा था तभी उसकी भटकी नजर गालों पर बिखरे भूरे घुंघराले बालों के बीच झांकती नीली आंखों से मिली जो उससे कुछ पूछना चाह रही थी.

शिट, कितना घटिया क्लब है, यहां वाशरूम में टायलेट पेपर तक नहीं है, वह अब तक तो उससे अपना पेंदा पोंछकर कमोड में बहा चुकी होगी


एक खाली टेबल के बाद वह अकेली लड़की सामने गिलास रखे बैठी थी, अंदर की नीली रोशनी में वह इतनी पवित्र और निश्छल लगी कि उसका मन हुआ जाकर कहे कि तुम अकेली हो, ज्यादा मत पी लेना, घर पहुंचने में दिक्कत होगी.

वह मुस्कराई, अपना छोटा सा हाथ निकाल हिलाकर बिना बोले हाय किया.अनंत अखबार पलटते हुए झिझक पर काबू पाने की कोशिश करता रहा, अंनतः वह उठकर मुस्कराते हुए उसकी टेबल की ओर बढ़ा ताकि उसे कम पीने के लिए कह सके, लड़की ने उसे इशारे से वहीं रोक कर कहा, तुम मेरे पास नहीं मैं तुम्हारे पास आऊंगी, वह वापस आकर बैठ गया.

दो लंबे घूंट लेकर सिगरेट जलाने के बाद वह लड़की आई, उसने बड़े सलीके से अखबार को मेज पर रखकर बीच से एक पेज फाड़ा और थैंक्यू कह कर चली गई. काफी देर बाद आयुष लौटा तो उसने फटे अखबार के बारे में पूछा और झल्ला कर कहा, जो पेज वह ले गई है उसमें मेरे एक पत्रकार दोस्त का जिंदगी का पहला आर्टिकल छपा था. उसने जबलपुर से मुझे भेजा था, उसी का फोन था.

ओह मुझे क्या पता!

शिट, कितना घटिया क्लब है, यहां वाशरूम में टायलेट पेपर तक नहीं है, वह अब तक तो उससे अपना पेंदा पोंछकर कमोड में बहा चुकी होगी.

First published: 13 December 2015, 13:02 IST
 
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