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दसवीं में बोर्ड परीक्षा फिर से लागू करना एक गलत कदम क्यों है?

प्रणेता झा | Updated on: 26 December 2016, 8:21 IST

दसवीं की बोर्ड परीक्षाएं 2011 में छात्रों के लिए वैकल्पिक करार दे दी गई थी. यानी छात्र चाहें तो बोर्ड की परीक्षा दें अथवा स्कूल परीक्षाओं में भी बैठ सकते हैं. इससे पहले दसवीं का हर छात्र बोर्ड की परीक्षाओं के नाम से ही डरता था.

चूंकि ये परीक्षाएं सार्वजनिक स्तर पर ली जाती हैं, इसलिए विद्यार्थियों के मन में कहीं न कहीं एक दबाव बना रहता है. परीक्षा  के लिए  पेपर सैट करने और कॉपियां जांचने वाले टीचर देश भर के किसी भी कोने से हो सकते हैं, जिन्होंने आपको कभी पढ़ाया न हो वे भी. इसके अलावा कॉपियों की जांच भी गोपनीय होती है. न तो छात्र अपनी कॉपी देख सकते हैं और न ही किसी फीड बैक या बहस की कोई गुंजाइश रहती है.

अब 2018 से सीबीएसई स्कूलों में फिर से दसवीं की परीक्षा अनिवार्य रूप से बोर्ड परीक्षा हो जाएंगी. सीबीएसई की प्रशासनिक इकाई ने 21 दिसम्बर को ही फैसला दिया था कि 2017-18 से सीबीएसई स्कूलों में दसवीं कक्षा की परीक्षाएं अनिवार्य रूप से बोर्ड द्वारा ही आयोजित की जाएंगी.

अब इस फैसले को बस सरकार से मंजूरी मिलनी बाकी है और उसमें कोई अड़चन नहीं आएगी क्योंकि एचआरडी मंत्री प्रकाश जावडेकर कई मौकों पर दसवीं बोर्ड परीक्षाएं अनिवार्य किए जाने की वकालत कर चुके हैं. 2010 में यूपीए सरकार ने दसवीं की बोर्ड परीक्षाएं वैकल्पिक करने के आदेश दिए थे.

विद्यार्थियों को यह चुनने का अधिकार था कि वे कन्टीन्यूूअस एंड कॉम्प्रीहेन्सिव सिस्टम (सीसीई) के तहत परीक्षाएं दे सकें लेकिन राज्यों के शिक्षा बोर्डों ने बोर्ड परीक्षा प्रणाली को अनिवार्य बनाए रखा था.

शिक्षा के अधिकार अधिनियम-2009 के तहत यह सीसीई लागू किया गया था. इसके अन्तर्गत साल के आखिरी में एक फाइनल परीक्षा आयोजित करने के बजाय साल भर के एकेडेमिक और अन्य सह शैक्षणिक गतिविधियों के आधार पर विद्यार्थियों को ग्रेड्स दिए जाते हैं. विद्यार्थियों के मन से परीक्षा का भय दूर करने और तनाव कम करने के उद्देश्य से सीसीई लागू किया गया था. लेकिन अध्यापकों और अभिभावकों के एक समूह का कहना था कि केवल दबाव में ही छात्र पढ़ाई के प्रति गंभीर हो पाते हैं.

दूसरी ओर शिक्षा विशेषज्ञों को शिकायत रही कि सीसीई का क्रियान्वयन सही ढंग से नहीं किया गया. बोर्ड परीक्षाएं अनिवार्य किए जाने को लेकर कैच ने कुछ शिक्षा विशेषज्ञों से बातचीत की.

अनीता रामपाल

(सीबीएसई संचालन इकाई की पूर्व अध्यक्ष, एनसीईआरटी प्राथमिक स्तर की पाठ्यपुस्तक टीम की पूर्व अध्यक्ष और प्रोफेसर, दिल्ली यूनिवर्सिटी)

यह निर्णय घातक साबित होगा क्योंकि यह बहुत ही कम उम्र में बच्चों पर प्रतिस्पर्द्धी परीक्षाएं थोपने जैसा है. इससे छात्रों की रचनात्मकता बढ़ने के बजाय उनमें चिंता और अवसाद ही घर करेगा. मैं जब सीबीएसई संचालन इकाई की अध्यक्ष थी उस वक्त मैंने महसूस किया कि सीसीई को सही ढंग से लागू नहीं किया गया और मैंने प्रस्ताव रखा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी को बेहतर अध्यापन और बच्चों को सिखाने के लिए अध्यापकों के साथ मिल कर सीसीई का समर्थन करना चाहिए.

एनसीईआरटी ने सीसीई के लिए जो मॉडल उपलब्ध करवाए थे वे सीबीएसई के मॉडल से कहीं बेहतर थे. बोर्ड परीक्षाएं फिर से लागू करना अफसोसजनक है और इससे शिक्षा तंत्र में सुधार होने के बजाय यह कई दशक पीछे चला जाएगा.

अनुसंधानों से पता चलता है कि बच्चों में उच्च स्तर की प्रतिस्पर्द्धा के चलते ही उनका प्रदर्शन खराब होने लगता है. बोर्ड परीक्षाओं की पैरवी करने का मतलब है हम अपने बच्चों पर अनावश्यक बोझ लाद रहे हैं और उन्हें बेहतर प्रदर्शन करने का अवसर नहीं दे रहे.

कृष्ण कुमार

(प्रोफेसर, दिल्ली यूनिवर्सिटी, एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक)

यह उल्टी दिशा में उठाया गया कदम साबित होगा. पांच साल पहले काफी विचार-विमर्श के बाद दसवीं बोर्ड परीक्षाओं को वैकल्पिक करने का निर्णय किया गया था. बोर्ड की अनिवार्यता समाप्त कर लागू की गई सीसीई प्रणाली के बहुत से फायदे हैं. इसमें बच्चों पर तनाव कम करना भी शामिल है लेकिन इसे उचित तरीके से लागू नहीं किया गया. इसमें रही खामियों से निपटने के बजाय सीबीएसई दसवीं बोर्ड परीक्षा की अनिवार्यता लागू करके एक कदम पीछे ही जा रही है. इससे बस छात्रों पर पढ़ाई का दबाव ही बढ़ेगा.

नित्या राम

(इंडिया टुडे समूह के शिक्षा संभाग यूनिवर्सल लर्न टुडे में अकादमिक गतिविधि प्रमुख, दिल्ली के वसंत वैली स्कूल में पूर्व अध्यापक, शिक्षण प्रारूप और टीचर्स ट्रेनिंग के लिए कार्यरत)

सीसीई इसलिए कारगर नहीं रहा, क्योंकि इसके लिए शिक्षकों को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया गया. लेकिन इसमें सुधार करने की बजाय सीबीएसई ने बोर्ड परीक्षा फिर से लागू करने का रास्ता चुना. यह तो ठीक वैसा ही हुआ कि अगर कार ढंग से नहीं चल रही हो तो फिर से बैलगाड़ी की सवारी का रुख कर लिया जाए. बोर्ड परीक्षा अनिवार्य करने का मतलब ही एक कदम पीछे जाना है.

दुनिया भर के स्कूलों में छात्रों के प्रदर्शन का आकलन वही अध्यापक करते हैं जो उन्हें स्कूल में पढ़ाते हैं. बोर्ड के परीक्षक को इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि परीक्षा से पहले छात्र स्वस्थ था कि नहीं या उसकी कोई अन्य पारिवारिक समस्या तो नहीं है या कोई और चिंता की बात तो नहीं.

जो अभिभावक सीसीई प्रणाली और शिक्षा व्यवस्था को नहीं समझते और शिक्षक जो सीसीई के लिए जरूरी अतिरिक्त काम नहीं करना चाहते उनके कारण राजनीतिक दबाव तो है ही. मेरा मानना है कि सारे नहीं तो कम से कम कुछ अच्छे चुनिंदा स्कूलों को सीबीएसई से संबद्धता समाप्त कर देनी चाहिए और आईसीएसई या अंतरराष्ट्रीय बोर्ड जैसे आईबी या आईजीसीएसई से नाता जोड़ लेना चाहिए जो कि छात्रों के हित में है और बहुत ज्यादा दखल नहीं देते.

First published: 26 December 2016, 8:21 IST
 
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