Home » कल्चर » Changing name of delhi's mohalla and colonies
 

नाम में इतिहास रखा है: दिन-दिन बदलते दिल्ली के गली-मोहल्ले

नलिन चौहान | Updated on: 17 April 2016, 9:18 IST

लोग कहते हैं नाम में क्या रखा है. दिल्ली के बारे में अगर आप यह राय रखते हैं तो बदल लीजिए. इसके गली-मुहल्लोंं के नाम में इतिहास भरा है. दुनिया में बहुत कम शहर ऐसे हैं जो दिल्ली की तरह सतत अपने अविच्छिन्न अस्तित्व के साथ मौजूदगी का दावा कर सकें. 

दिल्ली के विकास के इतिहास की तरह ही उसके नामों का विकास भी रोचक है. इसके इतिहास का एक सिरा महाभारत की महागाथा से जुड़ता जब पांडवों ने इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया था. तब से लेकर अब तक समय के लगातार घूमते पहिए ने अनेक राजाओं, सुल्तानों, सल्तनतों और बादशाहों का दौर दिल्ली से गुजरते देखा है.

इस अनवरत यात्रा के साथ ही आज तक इस नगर के बदलते नामों का सफर भी बिना नागा जारी है. पहली दिल्ली का नाम लाल कोट (1000), दूसरी दिल्ली का नाम सिरी (1303), तीसरी दिल्ली का नाम तुगलकाबाद (1321), चौथी दिल्ली का नाम जहांपनाह (1327), पांचवी दिल्ली का नाम फिरोजाबाद (1354), छठीं दिल्ली का नाम पुराना किला (1533), सातवीं दिल्ली का नाम शाहजहांनाबाद (1639) और आठवीं दिल्ली का नाम नई दिल्ली (1911) था जिसे अंग्रेजों ने बसाया.

ये सात नाम आज भले ही खंडहर हो चुके भवनों के साथ मिट गए हैं, पर आज भी लोक-स्मृति में दिल्ली के बसने और उजड़ने की कहानी कहते हैं. तोमर वंश की पहली दिल्ली के समय की एक मशहूर कहावत है, किल्ली तो ढिल्ली भई, तोमर हुए मतिहीन. माना जाता है कि इसी से दिल्ली को उसका नाम मिला.

पढ़ेंः जब शहर-ए-दिल्ली में पहली बार गूंजी रेल इंजन की सीटी

आज शॉपिंग मॉलों और गगनचुंबी इमारतों के साथ एक वैश्विक राजधानी के तौर पर उभरने की दौड़ में पुराने नाम मिट रहे हैं.

आज अंग्रेजी स्लैंग नामों (अंग्रेजी में अर्थहीन तुकबंदी) के फेर में जैसे एमजी रोड महात्मा गांधी मार्ग का संक्षिप्त नाम है या महरौली-गुड़गांव का यहीं साफ नहीं होता. ब्रिटिश गुलामी से एक स्वतंत्र राष्ट्र की राजधानी बनी नयी दिल्ली के आज तक के सफर में अनेक ऐतिहासिक नाम, स्थान और भवन इतिहास बन चुके हैं.

katra Neel

कटरा नील

दिल्ली में ऐसे अनेक स्थान हैं जिनके नाम खत्म हो गए अब सिर्फ स्मृतियां ही शेष है. एक पहाड़ी की चोटी पर प्राचीन कालका देवी का मंदिर और मलय मंदिर था. गौर करने वाली बात यह है कि मलय मंदिर आने वाली सार्वजनिक परिवहन की बसों पर मलाई मंदिर लिखा रहता है. मलय जिसका संस्कृत में अर्थ पहाड़ होता है.

चौदहवीं सदी की दिल्ली में रिज एक घना जंगल होती थी, जिसे अंग्रेजों के जमाने में साफ करके बगीचों में बदला गया. मुगलकालीन दिल्ली में जंगली शिकार के लिए इसका इस्तेमाल होता था जिसे जहांनुमा कहते थे. आज़ादी के बाद इसका नाम जवाहरलाल नेहरू की पत्नी के नाम पर कमला नेहरू रिज रखा गया. 

पढ़ेंः बीते समय का संग-ए-मील हैं ये कोस मीनारें

रिज के जंगल का क्षेत्र पालम से मालचा तक दो हिस्सों में बंटा हुआ था. सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के कुशक (शिकारगाह-आरामगाह) से प्रेरणा लेकर अंग्रेज़ वास्तुकार लुटियन ने नयी दिल्ली में कुशक रोड बनाई थी जो आज भी इसी नाम से मौजूद है.

1883 के अंत तक दिल्ली में असमान, भूमि, जलधाराओं और यमुना नदी में गिरने वाले नालों का वर्णन है. दिल्ली के भूदृश्य में गड्डे और निचली जमीन थी जहां पानी झील के रूप में जमा रहता था, जहां पशु-पक्षी एकत्र होते थे, महिलाएं घड़ों में तो भिश्ती अपनी मश्क़ों में पानी भरते थे. ऐसी ही एक झील, नजफगढ़ की झील थी जबकि पानी का एक बड़ा स्रोत ताल कटोरा यानी कटोरे के आकार का तालाब था.

जहां कुएं थे उनके नाम उसी पर पड़ गए. लालकुंआ और धौला कुंआ ऐसे ही नाम हैं

फ़रीदाबाद के पास एक सूरजकुंड (सूर्य कुंड) भी था. बाद के दौर में दिल्ली की पानी की बढ़ती जरूरत के लिए बड़े तालाब खोदे गए और पानी को सहेजने के लिए हौद-हौज शम्सी, हौज खास और हौज रानी बनवाए गए. हौज काजी के शाहजहांनाबाद से भी पुराना होने की बात कही जाती है.

आधुनिक दौर में, पानी के इन पुराने स्रोतों को जमीन की गरज से समतल करने के लिए मनमाने ढंग से भरा गया है. इसी का नतीजा है कि इनमें से दो हौज सूख गए हैं.

पढ़ेंः सिर्फ संविधान लागू होने की तारीख नहीं है 26 जनवरी

कुदरती पानी को सहेजने और आबादी की प्यास बुझाने के लिए दिल्ली में बावलियां बनाई गईं. दिल्ली में लोग सूखी, गंधक और उग्रसेन की बावली जैसे पानी के ठंडे ठिकानों पर जुटते थे. खारी बावली का नाम खारे पानी की बावली से जन्मा था.

जहां कुएं थे उनके नाम उसी पर पड़ गए. लालकुंआ और धौला कुंआ ऐसे ही नाम हैं. विकासपुरी के नजदीक धौली प्याऊ नाम की जगह है. राजस्थानी में धौला का मतलब सफ़ेद होता है. यानि साफ पानी वाला कुंआ, धौला कुंआ तो साफ पानी की प्याऊ, धौली प्याऊ.

Satpul bridge

सतपुल ब्रिज

आज के कनाट प्लेस के नजदीक पचकुइयां (पांच कुइयां, कुएं से छोटी कुई होती है) रोड में पानी के प्रवाह को नियंत्रित करने वाला एक तंत्र था. तेरहवीं सदी के अंत में राजधानी में नहरों का जाल बिछाया गया. इसी योजना से दो नहरें, नजफगढ़ नहर और बारापूला नहर बनीं.

सत्रहवीं सदी में मुगल शहर शाहजहांनाबाद में अली मर्दन नहर, सदात खान नहर और महल यानी लाल किला में नहर-ए-बहिश्त जोड़ी गई. इतना ही नहीं, पुलों के नाम पर स्थानों के नाम रखे गए. तुगलक कालीन सतपुला, मुगल कालीन अठपुला और बारापुला का नामकरण उनके मेहराबों की गिनती के आदार पर किया गया था.

पढ़ेंः मस्तानी के बिना भी था एक बाजीराव

जब अंग्रेजों ने 1857 की पहली आजादी की लड़ाई के बाद दिल्ली पर दोबारा कब्जा जमाया तो उन्होनें शाहजहांनाबाद के चारों ओर दीवार का निर्माण करवाया तब बद्रू गेट का नाम मोरी गेट (जहां पानी की निकासी के लिए मोरी होती थी, यानी छेद था) हो गया क्योंकि शहर में नहर यही से घुसती थी.

यमुना के किनारे बनाए गए घाटों में निगम बोध घाट प्रमुख था. दरियागंज, दरिया का अर्थ नदी और गंज का मतलब बाजार, यानी नदी के किनारे का बाजार. यहां के तुगलक बाजार में एक स्थान पर नावें अपना सामान उतारा करती थी. आज नहरें सूख कर नाला बन चुकी है और रख-रखाव के अभाव में उनका उपयोग कचरे और प्लास्टिक को ठिकाने लगाने के लिए होता है.

दिल्ली के इतिहास में अरबी शब्द किला का पहला संदर्भ हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के किले, किला राय पिथौरा के रूप में मिलता है

अगर शहर से हटकर दिल्ली देहात को देंखे तो वहां के अनेक गांवों के नाम जैसे महरौली, होलंबी, कोंडली, मुंडेला, ओखला, जसोला, झड़ौदा, मालचा, मुनिरका, करकरी, कड़कड़डूमा, कराड़ी, धूलसिरस, पालम और हस्ताल का स्थानीय बोली में अपना विशेष अर्थ है.

दिल्ली में अधिकतर मामलों में आबादी की बसावटों को नाम और पहचान, किसी राजा या सुल्तान के जमीन के टुकड़े को दान या खैरात में देने के बाद मिली. इनमें से अधिकतर पंद्रहवीं सदी के बाद के हैं जब लोदी वंश के सुल्तानों ने दिल्ली में खालसा (शाही जमीन) की जमीनों को अपने सरदारों का सर्मथन हासिल करने के लिए बांटा. ये इनामी जमीनें सुल्तान के लिए अलग से मालगुजारी का साधन थीं.

पढ़ेंः लाल किला, कुतुब मीनार और ताज का दीदार हुआ महंगा

इनकी ज़मीनों की पहचान संस्कृत भाषा के शब्द ’पुर‘ के प्रत्यय से की जा सकती थीं. ’पुर‘ का शाब्दिक अर्थ बसावट होता है. इस तरह, आबादी वाली इन बसावटों के नाम किसी एक व्यक्ति विशेष के नाम पर रखे गए थे जैसे बदर, मोहम्मद, महिपाल, मसूद, बाबर, हुमायूं, अली, बेगम, जयसिंह.

hauz khas

हौज खास

यहां तक की नई दिल्ली का जंगपुरा भी बीसवीं सदी का एक ‘पुर’ है. यह एक अंग्रेज उपायुक्त यंग के नाम पर पड़ा है. उनके कार्यकाल में रायसीना गांव में राष्ट्रपति भवन के बनने की वजह से गांव के विस्थापित लोगों को जहां पुर्नवासित किया गया, उस जगह का नाम गांववालों ने यंग के नाम पर रख दिया. यंगपुर अपभ्रंस होते-होते जंगपुरा हो गया.

समाज में जातियों के अस्तित्व का भी गांव के नाम से पता चलता था जैसे सादतपुर मुसलमान और सादतपुर गुर्जरान

इसी तरह दिल्ली देहात के कुछ गांवों का नाम भी अधिकारियों के नामों पर हैं जैसे शाहपुर या वजीरपुर. राजपूत वीर रायसीना के नाम पर बसा गांव, बाहरवीं सदी के राय पिथौरा की याद दिलाता है. दिल्ली के मशहूर सूफी संत निजामुद्दीन औलिया की खानकाह गियासपुर गांव में थी, जिसका नाम सुल्तान गयासुद्दीन तुगलक के नाम पर पड़ा था. गयासुद्दीन तुगलक का औलिया से छत्तीस का आंकड़ा था.

आधुनिक दिल्ली में कम से कम एक सौ गांव ऐसे होंगे जिनके नाम के पीछे ‘पुर’ शब्द लगा है. ऐसे गांवों की संख्या इससे अधिक भी हो सकती थीं पर शहरीकृत गांव बनने के बाद दिल्ली विकास प्राधिकरण और दिल्ली नगर निगम के कारण अब ऐसे गांवों के नाम बदल गए हैं. इसी तरह, देहात में मुख्य गांव को कलां (मतलब बड़ा) और नए बसे हुए गांव को खुर्द (मतलब छोटा) कहा जाता था, जैसे दरीबाकलां और दरीबाखुर्द.

पढ़ेंः जब आखिरी बादशाह ने खायी रोटी-चटनी

इसी तरह समाज में जातियों के अस्तित्व का भी गांव के नाम से पता चलता था जैसे सादतपुर मुसलमान और सादतपुर गुर्जरान. इसी तरह, ‘आबाद’ फारसी प्रत्यय है, जिसका मतलब होता है जो जगह लोगों से आबाद हो. जैसे, गाजियाबाद, फरीदाबाद, मुरादाबाद और शाहजहांनाबाद. इनके उपसर्ग व्यक्तियों के नामों पर थे.

‘कोट’ संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ होता है किला और उसमें ‘ला’ शब्द का प्रत्यय लगने से उसका मतलब हो जाता है शहर या किलेबंदी वाला शहर. सभी राजपूत किलों की तरह, तोमरों का लालकोट दिल्ली की दक्षिण रिज की ऊंचाई पर बना था. 

सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के विशाल शहर के उत्तरी सिरे पर किलेबंदी वाला शहर कोटला फिरोजशाह बना हुआ था. यह शहर यमुना नदी से महरौली तक फैला हुआ था. तुगलक वंश के बाद दिल्ली पर काबिज हुए सैयद वंश के शासकों ने उनके किले को मध्य में कोटला मुबारकपुर के रूप में स्थापित किया.

दिल्ली के इतिहास में अरबी शब्द किला का पहला संदर्भ हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के किले, किला राय पिथौरा के रूप में मिलता है. हुमायूं का दीनपनाह (दीन के लोगों की पनाहगाह) उन्नीसवीं सदी में पुराना किला हो गया वहीं शाहजहां का किला मुबारक, लालकिला बन गया. गढ़ या गढ़ी, किले के लिए संस्कृत शब्द, का प्रत्यय है. किशनगढ़, वल्लभगढ़, नजफगढ़, हिम्मतगढ़ और मैदानगढ़ी में इसकी झलक दिखाई देती है.

पढ़ेंः 'उपवास रखने से बढ़ती है शरीर की प्रतिरोधक क्षमता'

इसी तरह, दिल्ली के किलों के दरवाजे बाहर की ओर अभिमुख वाले थे और इनमें से अधिकतर के नाम, दिशासूचक थे. जैसे बदायूं, अजमेर, लाहौर, कश्मीर, दिल्ली. शाहजहांनाबाद की दक्षिण की ओर की दीवार का दरवाजा दिल्ली दरवाजा इसलिए कहलाता था क्योंकि शाहजहांनाबाद के निवासी महरौली को देहली या दिल्ली पुकारते थे.

शहर की दीवार से बाहर बने थोक की वस्तुओं के बाजार बेशक मुहल्ले बन गए पर उनके नाम बदस्तूर जारी रहें जैसे रकाबगंज, मलका गंज, पहाड़ गंज और सब्जी मंडी.

जब अंग्रेजों ने सन 1911 में कलकत्ता से दिल्ली अपनी राजधानी को स्थानांतरित किया तो उसे उन्होंने साम्राज्य की नई राजधानी के रूप में प्रचारित किया था

पुराने जमाने में दिल्ली में यात्रियों और व्यापारियों की सुविधा के लिए अनेक सराय बनी थीं, जहां वे अपने जानवरों को बांधकर रात में आराम कर सकते थे. शाहजहांनाबाद में इस तरह की सरायों के नाम थे जो आज भी हैं, जैसे युसूफ, शेख, बेर, काले खान, बदरपुर, जुलैना (औरंगजेब के बेटों की यूरोपीय शिक्षिका का नाम) जो जामिया नगर के पास स्थित है.

शहर में चांदनी चौक के करीब एक खूबसूरत ढंग की इमारत में बनी सराय मुगल शहजादी रोशनआरां के नाम पर थी. इस सराय का नाम लोकस्मृति से इसलिए मिट गया क्योंकि सन 1857 में आजादी की पहली लड़ाई के बाद अंग्रेजों ने दिल्ली पर दोबारा कब्जे के बाद उस जगह टाउन हॉल बनाया.

पढ़ेंः क्या होगा अगर विमान में मोबाइल को फ्लाइट मोड पर नहीं रखा?

इसी तरह आज शाहजहांनाबाद में चार हजार या उससे अधिक कटरों (सटे हुए बाजार) की कहानी भी मजेदार है क्योंकि इनमें से अधिकांश सरकार के स्वामित्व में हैं. देश विभाजन से पहले इनकी संख्या कम ही थी जैसे कश्मीरी कटरा और नील कटरा दो जाने-पहचाने नाम हैं. तो फिर इनकी संख्या में यकायक इतना इजाफा कैसे हुआ? 

सन 1947 के बाद पाकिस्तान जाने वाले मुसलमान परिवारों की हवेलियों में पाकिस्तान से निकाले गए हिंदू परिवारों ने आकर डेरा जमाया. इन्होंने अपने नए ठिकानों का घर के साथ कामकाजी यानी दोहरा प्रयोग किया. आजादी के तुरंत बाद भारत सेवक समाज की ओर से किए गए एक सर्वेक्षण के अनुसार, इनका कटरों के रूप में वर्गीकरण किया गया और तब से उन्हें इसी नाम से पुकारा जा रहा है.

जब अंग्रेजों ने सन 1911 में कलकत्ता से दिल्ली अपनी राजधानी को स्थानांतरित किया तो उसे उन्होंने साम्राज्य की नई राजधानी के रूप में प्रचारित किया था. अंग्रेजों ने इसे विंडसर प्लेस का नाम दिया. इसी तरह इंगलैंड की तर्ज पर किंग जॉर्ज एवेन्यू और क्वींस एवेन्यू की नकल करते हुए किंग्स-वे और क्वींस-वे का नाम रखा गया. जिन्हें आजादी के बाद राजपथ और जनपथ का नाम दिया गया.

अंग्रेजों ने अपने साम्राज्य की वैधता को साबित करने के लिए नई दिल्ली के सड़क मार्गों के नाम पूर्व भारतीय शासकों जैसे अशोक, पृथ्वीराज, फिरोजशाह, तुगलक, अकबर और औरंगजेब के नाम पर रखे. यहां तक कि अंग्रेजों ने फ्रांसिसी डुप्ले और पुर्तगाली अलबुकर क्यू के नाम भी सड़कों के नाम रखे. 

पढ़ेंः दुनिया की 9 बेमतलब की बेशकीमती चीजें

नई दिल्ली के लिए जयपुर के राजा ने अंग्रेजों को जमीन (जयसिंहपुरा और रायसीना) दी थी इसलिए दो सड़कों के नाम जयपुर के कछवाह वंश के राजा मानसिंह और जयसिंह के नाम पर भी रखे गए.

इसी तरह अंग्रेज वास्तुकार, इंजीनियर और अधिकारियों के नाम पर भी सड़कों के नाम रखें गए, जिनमें हैली रोड, राउज एवेन्यु और कीलिंग सहित लुटियन के नाम शामिल हैं. मजेदार बात है कि जहां हैली, राउज और कीलिंग के नाम चौड़ी सडकें हैं वहीं उनकी तुलना में लुटियन के नाम संकरी सड़क है.

पढ़ेंः जानिए क्या हैं दुनिया के 5 सबसे खतरनाक नशे

First published: 17 April 2016, 9:18 IST
 
नलिन चौहान @catch_hindi

देश की राजधानी में जी टीवी के स्थानीय केबल चैनल सिटी टीवी से पत्रकारिता के जीवन की शुरुआत करने के बाद इंडिया टुडे हिंदी और फिर पीटीआई में नौकरी. संघ लोक सेवा आयोग से चयन के पश्चात दिल्ली सरकार की सूचना सेवा में उपनिदेशक के पद पर कार्यरत.

पिछली कहानी
अगली कहानी