Home » कल्चर » chhath puja 2017 Know Method Of Worship worship of sun
 

भक्तों की अटल आस्था का अनूठा पर्व है छठ, जानें कैसे होता है पूजन

कैच ब्यूरो | Updated on: 24 October 2017, 10:44 IST

बिहार में भगवान भास्कर की उपासना और लोकआस्था के पर्व छठ की शुरुआत हो चुकी है. भक्तों की अटल आस्था का अनूठा पर्व छठ की चर्चा ऋग्वेद में भी की गई है. 

इस पर्व में कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी आौर सप्तमी को अस्ताचलगामी और उदीयमान सूर्यदेव की उपासना की जाती है और भगवान भास्कर को अर्घ्य देकर नमन किया जाता है. सूर्योपासना का यह पर्व कार्तिक महीने के शुक्ल पक्ष के चतुर्थी से सप्तमी तिथि तक मनाया जाता है. सूर्यषष्ठी व्रत होने के कारण इसे 'छठ' कहा जाता है.

सुख-समृद्धि और मनोवांछित फल देने वाले इस पर्व को पुरुष और महिला सामान रूप से मनाते हैं, लेकिन आमतौर पर व्रत करने वालों में महिलाओं की संख्या अधिक होती है. कुछ वर्ष पूर्व तक मुख्य रूप से यह पर्व बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में मनाया जाता था, लेकिन अब यह पर्व पूरे देश में मनाया जाता है.

ऋग्वेद में देवता के रूप में सूर्यवंदना का उल्लेख मिलता है. ऋग्वेद में 'सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च' अर्थात सूर्य को जगत की आत्मा, शक्ति व चेतना होना उजागर करता है."

उन्होंने बताया कि पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार संतान प्राप्ति के लिए राजा प्रियवद द्वारा सर्वप्रथम इस व्रत को किए जाने का उल्लेख है. वहीं महाभारत में सबसे पहले सूर्यपुत्र कर्ण द्वारा सूर्यदेव की पूजा का उल्लेख मिलता है. द्रौपदी भी अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य की कामना और लंबी उम्र के लिए नियमित सूर्य उपासना करती थीं, जिसका प्रमाण धार्मिक ग्रंथों में मिलता है.

मान्यता है कि छठ देवी सूर्यदेव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए भगवान सूर्य की अराधना की जाती है. व्रत करने वाले गंगा, यमुना या किसी नदी और जलाशयों के किनारे अाराधना करते हैं.

छठ पर्व कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि से शुरू होता है तथा सप्तमी तिथि को इस पर्व का समापन होता है. पर्व का प्रारंभ 'नहाय-खाय' से होता है, जिस दिन व्रती स्नान कर अरवा चावल, चना दाल और कद्दू की सब्जी का भोजन करती हैं. इस दिन खाने में सेंधा नमक का प्रयोग किया जाता है. नहाय-खाय के दूसरे दिन यानि कार्तिक शुक्ल पक्ष पंचमी के दिनभर व्रती उपवास कर शाम में स्नानकर विधि-विधान से रोटी और गुड़ से बनी खीर का प्रसाद तैयार कर भगवान भास्कर की अाराधना कर प्रसाद ग्रहण करती हैं. इस पूजा को 'खरना' कहा जाता है.

इसके अगले दिन कार्तिक शुक्ल पक्ष षष्ठी तिथि को उपवास रखकर षाम को व्रतियां टोकरी (बांस से बना दउरा) में ठेकुआ, फल, ईख समेत अन्य प्रसाद लेकर नदी, तालाब, या अन्य जलाशयों में जाकर अस्ताचलगामी सूर्य का अघ्र्य अर्पित करती हैं और इसके अगले दिन यानि सप्तमी तिथि को सुबह उदीयमान सूर्य को अघ्र्य अर्पित कर घर लौटकर अन्न-जल ग्रहण कर 'पारण' करती हैं, यानी व्रत तोड़ती हैं.

इस वर्ष 26 अक्टूबर को षष्ठी है. इस पर्व में स्वच्छता और शुद्धता का विशेष ख्याल रखा जाता है. इस पर्व में गीतों का खास महत्व होता है. छठ पर्व के दौरान घरों से लेकर घाटों तक पारंपरिक कर्णप्रिय छठ गीत गूंजते रहते हैं. व्रतियां जब जलाशयों की ओर जाती हैं, तब वे छठ महिमा की गीत गाती हैं. इस दिन गांव से लेकर शहरों तक के लोग छठव्रतियों को किसी प्रकार का कष्ट न हो इसका पूरा ख्याल रखते हैं.

First published: 24 October 2017, 10:44 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी