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अनोखा गांव: दूल्हा ढूंढ़ने आख़िर क्यों यहां से बाहर नहीं निकलते लोग?

शिरीष खरे | Updated on: 20 May 2017, 11:22 IST
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले का औरदा गांव (शिरीष खरे, कैच न्यूज़)

आम तौर पर लड़के और लड़कियों के परिवारों को शादी के जरिए नए रिश्ते बनाने से पहले उन्हें परखने को लेकर खासी मशक्कत करनी पड़ती है. फिर भी रिश्ता बहुत दूर का हो तो एक-दूसरे के बारे में जानने और समझने को लेकर दोनों पक्षों में कई बार शादी होने से पहले तक संशय बना रहता है. लेकिन, छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले में औरदा के रहवासियों की सुनें तो वे इस परेशानी से कोसों दूर हैं.

भला ऐसे कैसे! यह जानना है तो आप प्रदेश की राजधानी रायपुर से करीब 300 किलोमीटर दूर इस गांव में चले आइए. कहने को कोई तीन हजार की आबादी वाला यह गांव बहुत छोटा और साधारण दिखता है, किंतु जब आप यहां के लोगों से गांव की खासियत के बारे में चर्चा करेंगे तो खुद-ब-खुद यह गांव आपको स्पेशल नजर आने लगेगा. इसके पीछे वजह है यहां कई पीढ़ियों से चली आ रही एक खास किस्म की परंपरा.

यहां ज्यादातर बेटियों के परिवारों से बात करने पर पता चलता है कि वे अपनी बेटियों का रिश्ता खोजने के लिए दूसरे गांव जाना पसंद नहीं करते. इनका यकीन गांव के युवकों से ही विवाह कराके उनके परिवारों से रिश्ता जोड़ने पर है. यही वजह है कि औरदा गांव के घर-घर में आपको ऐसी बेटियां मिलेंगी जिनका मायका भी यही गांव है और ससुराल भी यही गांव.

देखने में आया है कि पिछड़ा वर्ग से ताल्लुक रखने वाले साव समुदाय के लोग अपनी रिश्तेदारियां अपने ही जाति के परिवारों से करते हैं. हालांकि, इस परंपरा के भीतर अभी तक अंतर-जातीय विवाह के उदाहरण देखने को नहीं मिले हैं.

 

तिहारू साव और उनकी पत्नी महिला उप-सरपंच कौशल्या साव (शिरीष खरे, कैच न्यूज़)

महिला उप-सरंपच बेटी भी, बहू भी

आखिर यहां ऐसी कितनी बेटियां हैं जिनकी शादियां यहीं हो गईं? औरदा ग्राम पंचायत की महिला उप-सरंपच कौशल्या साव से हमने यह सवाल पूछा. उन्होंने बताया कि पचास से ज्यादा बेटियों के विवाह इसी गांव में हो चुके हैं. मतलब इस छोटे-से गांव में पचास से ज्यादा जोड़े हैं, जहां उन्होंने जन्म लिया, जिसकी गलियों में वे जिनके साथ खेल-कूद कर बड़े हुए, बाद में उन्हीं में से कोई एक जिंदगी भर के लिए उनका हमसफर बना.

दिलचस्प बात यह है कि महिला उप-सरपंच कौशल्या साव खुद भी इस गांव की बेटी और बहू दोनों हैं. वे बताती हैं कि उनकी शादी हुए करीब तीन दशक गुजर गए हैं. उनका मानना है कि अब तक उनके दांपत्य जीवन में कोई परेशानी नहीं आई. ऐसा इसलिए कि जिस व्यक्ति को उनके लिए चुना गया था वे उन्हें बचपन से ही जानती थीं और पसंद भी करती थीं. ठीक यही राय कौशल्या साव के पति तिहारू साव की भी है. तिहारू साव बताते हैं, "मेरी मां और बड़ी भाभी का विवाह भी इसी तर्ज पर इसी गांव में सम्पन्न हुआ है, जो मेरी पत्नी (महिला उप-सरपंच कौशल्या साव) की सास और जेठानी हैं."

जब हमने कौशल्या और तिहारू से ऐसे दंपतियों की सूची बनवाने में मदद मांगी, तो उन्होंने सचमुच करीब तीस दशक के दौरान पचास से ज्यादा नाम गिना दिए. हमारे लिए जो बात अब कौतूहल का विषय बन चुकी थी, उन्हें वहीं एक अति सामान्य बात लग रही थी.

 

सास, जेठानी और बहू तीनों का मायका-ससुराल एक

जी हां, औरदा गांव में दर्जनों ऐसे घर हैं जहां सास, जेठानी और बहू तीनों का मायका तथा ससुराल एक ही है. अब हमारी अगली जिज्ञासा यह थी कि यहां की साव बस्ती में लोग आखिर अपनी बेटियों का विवाह इसी गांव के लड़कों से क्यों कराते हैं? यह कोई तुगलकी फरमान है या फिर किसी तरह का कोई दबाव इन पर होता है? हमने इस बारे में अब गांव के अन्य लोगों से बातचीत शुरू की. जिन बेटियों के परिजनों से हमारी बात हुई, तो उन्होंने बताया कि वे किसी दबाव में नहीं बल्कि खुद की इच्छा से ऐसा करते हैं.

हमने जब इन लोगों से चर्चा की और इसके पीछे की वजहों को खंगालने की कोशिश की तो कुछ दिलचस्प तर्क भी सामने आए. गणेश भाई बताते हैं, बेटी की शादी से पहले दूल्हे का चाल-चलन, उसकी आमदनी, परिवार की स्थिति, सामाजिक प्रतिष्ठा और अन्य बातों की जानकारी जुटाने में एक बेटी के पिता के पसीने छूट जाते हैं. कई बार ऐसा भी देखा गया है कि शादी को लेकर लड़का पक्ष द्वारा दिखाया कुछ और जाता है तथा अंदर की स्थिति कुछ और होती है. इसकी वजह से कभी-कभी लड़की को काफी परेशानियां भी उठानी पड़ती हैं. इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए स्थानीय ग्रामीण अपनी बेटी की शादी गांव के ही योग्य लड़के से करते हैं.

गामीणों ने यह भी बताया कि इसकी वजह से बेटी का मायका और ससुराल एक बस्ती में ही रहता है. इससे बेटी का विवाह करने के बाद भी अपनों से दूर होने का एहसास नहीं होता है. पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही इस परंपरा के पीछे बेटी को अपनी आंखों के सामने रखने, ससुराल पक्ष और दूल्हे के बारे में पूरी जानकारी होने की बात कही जा रही है. दूसरी तरफ, युवकों के परिजनों को कहना है कि इससे उन्हें भी यह जानने में सहूलियत होती है कि किस लड़की को उनका घर पसंद है और वह गृहस्थी का बोझ उठाने में अच्छी तरह से उनकी मददगार बन सकती है या नहीं.

सामाजिक कार्यकर्ता प्रमोद कुमार साव का कहना है, "औरदा में यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है. विवाह से पहले संबंध को समझने और उसे अंजाम तक पहुंचाने में इससे काफी मदद मिलती है. अब तक इसका सकारात्मक प्रभाव देखा गया है."

औरदा गांव में अपनी ही जाति की किसी लड़की या लड़के से शादी कराने की प्रवृत्ति कितनी सही है या नहीं है, इसको लेकर सबकी अपनी-अपनी राय हो सकती है. लेकिन, इस परंपरा पर अब तक किसी तरह का कोई ऐतराज या इसका विरोध न तो गांव के भीतर देखने को मिला है और न ही इसके बाहर अन्य किसी पक्ष ने ही इस पर अंगुली उठाई है.

First published: 20 May 2017, 11:19 IST
 
शिरीष खरे @catch_hindi

विशेष संवाददाता, राजस्थान पत्रिका

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