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58 साल पहले जान बचाने वाले भारतीय जवान के गले लगकर भावुक हुए दलाई लामा

कैच ब्यूरो | Updated on: 3 April 2017, 10:27 IST
(एएनआई)

मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है. सिद्धार्थ से बुद्ध बनने वाले राजकुमार ने इस धारणा को ज्ञान प्राप्त करने से पहले ही अपना लिया था, जब उनके चचेरे भाई देवदत्त ने एक हंस को तीर से मारकर घायल किया और सिद्धार्थ ने तीर को निकालकर हंस को सहलाया और पानी पिलाया. हंस के हक की लड़ाई जब राजा शुद्धोदन के दरबार में पहुंची तो उन्होंने भी यही कहा कि मारने वाले से बचाने वाला ही बड़ा है. इस घटना का ज़िक्र हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि तिब्बत के धार्मिक गुरु दलाई लामा भी कुछ ऐसे ही एहसास और जज्बात लिए गुवाहाटी पहुंचे थे.

तिब्बत के धार्मिक नेता यहां एक कार्यक्रम के दौरान बेहद भावुक अंदाज़ में नज़र आए. हों भी क्यों ना, दरअसल 58 साल पुरानी यादों ने बौद्ध धर्मगुरु को ऐसा झकझोरा कि वो अपनी जान बचाने वाले भारतीय जवान के गले लगने से ख़ुद को रोक नहीं सके. गुवाहाटी के आईटीए कल्चरल सेंटर में दलाई लामा की जब असम राइफल्स के रिटायर्ड हवलदार नरेन चंद्र दास से नज़रें मिलीं, तो उन्हें 31 मार्च 1959 का मंजर याद आ गया, जब तिब्बत पर चीन के हमले के दौरान नरेन चंद्र दास उन्हें सुरक्षित भारत लाने में कामयाब रहे थे. 

नरेन चंद्र दास को किया सलाम

जब नरेन चंद्र दास से दलाई लामा मिले तो स्तब्ध रह गए, दास को उन्होंने सलाम किया और अपने गले लगाया. इस दौरान उनकी आंखों से आंसू गिरने लगे. दलाई लामा ने कहा, "मार्च 1959 में मुझे बचाने वाले इस बुजुर्ग शख्स से मिलकर मैं बहुत खुश हूं. यह 58 साल पुरानी बात है. अब आप रिटायर हो चुके होंगे. आपके चेहरे को देखकर लगता है कि अब मैं भी काफी बुजुर्ग हो चुका हूं." 

नरेन चंद्र दास उन पांच भारतीय जवानों में शामिल थे, जिन्होंने चीन के आक्रमण के दौरान दलाई लामा को सुरक्षित निकाला था. 79 साल के दास उन पांच में से जीवित बचे इकलौते शख्स हैं. दास ने बताया कि अपने सेक्शन कमांडर की अगुवाई में मार्च 1959 में इंटरनेशल बॉर्डर (मैकमोहन लाइन) के पास एक स्पेशल गेस्ट को लाने पहुंचे थे. उस वक्त दास की उम्र 20 साल थी, जबकि दलाई लामा 23 साल के थे.

फाइल फोटो

कौन हैं दलाई लामा?

चौदहवें दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष और आध्यात्मिक गुरु हैं. उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को उत्तर-पूर्वी तिब्बत के ताकस्तेर क्षेत्र में हुआ था. दो साल की अवस्था में बालक ल्हामो धोण्डुप की पहचान 13वें दलाई लामा थुबटेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में की गई.

दलाई लामा एक मंगोलियाई पदवी है जिसका मतलब होता है ज्ञान का महासागर और दलाई लामा के वंशज करुणा, अवलोकेतेश्वर के बुद्ध के गुणों के साक्षात रूप माने जाते हैं. बोधिसत्व ऐसे ज्ञानी लोग होते हैं जिन्होंने अपने निर्वाण को टाल दिया हो और मानवता की रक्षा के लिए पुनर्जन्म लेने का निर्णय लिया हो.

1949 में तिब्बत पर चीन के हमले के बाद दलाई लामा से कहा गया कि वह पूर्ण राजनीतिक सत्ता अपने हाथ में ले लें. 1954 में वह माओ जेडांग, डेंग जियोपिंग जैसे कई चीनी नेताओं से बातचीत करने के लिए बीजिंग भी गए, लेकिन आखिरकार 1959 में ल्हासा में चीनी सेनाओं द्वारा तिब्बती राष्ट्रीय आंदोलन को बेरहमी से कुचले जाने के बाद वह निर्वासन में जाने को मजबूर हो गए.

इसके बाद से ही वह हिमाचल प्रदेश के शहर धर्मशाला के मैकलोडगंज में रह रहे हैं, जो केंद्रीय तिब्बती प्रशासन का मुख्यालय है. तिब्बत पर चीन के हमले के बाद दलाई लामा ने संयुक्त राष्ट्र से तिब्बत मुद्दे को सुलझाने की अपील की है.

First published: 3 April 2017, 10:27 IST
 
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