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धनतेरस पर करें दीपदान, खत्म हो जाएगा अकाल मृत्यु का भय

कैच ब्यूरो | Updated on: 10 November 2020, 19:25 IST

धनतेरस पर यमराज को दीपदान किया जाता है. लेकिन अकसर लोगों के मन में ये सवाल होता है कि आखिर धनतेरस पर यमराज की पूजा क्यों की जाती है. जिसके पीछ दो पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं.
पहली कथा के मुताबिक एक बार यमदूत एक राजा को उठाकर नरक ले जाते हैं. नरक में राजा ने यमदूत से कहा कि मुझे नरक क्यों लाए हो. मैंने तो कोई पाप नहीं किया है. इस पर यमदूत ने कहा कि एक बार एक भूखे विप्र को आपने अपने दरवाजे से भूखा ही लौटा दिया था. इसलिए नरक लाए हैं. राजा ने कहा कि नरक में जाने से पहले मुझे एक साल का समय दो. यमदूत ने यमराज की सलाह पर एक साल का समय दे दिया.

राजा दूबारा जीवित हो गया. इस के बाद वो ऋषि-मुनियों के पास गया और उसने उन्हें अपनी सारी कहानी बता दी. तब ऋषियों के कहने पर राजा ने कार्तिक मास की कृष्ण मास की कृष्ण त्रयोदशी को खुद ने व्रत रखा और ब्राह्मणों को एकत्रित कर उन्हें भोजन कराया. साल भर पूरा होने के बाद यमराज राजा को फिर लेने आए और इस बार वो नरक ले जाने के बजाए, विष्णु लोक ले गए. तभी से इस दिन यमराज की पूजा की जाती है. और उनके नाम का दीपक जलाया जाता है.


दूसरी कथा के मुताबिक हिम नाम के एक राजा का पुत्र हुआ तो ज्योतिषियों ने बताया कि यह अपने विवाह के चौथे दिन मर जाएगा. राजा इस बात से परेशान हो गया. पुत्र बड़ा हुआ तो विवाह तो करना ही था. उसका विवाह करा दिया गया. शादी के चौथे दिन सभी को राजकुमार की मृत्यु का डर सताने लगा. लेकिन उसकी पत्नी ने बिना चिंता के महालक्ष्मी की पूजा करने लगी. क्योंकि उसकी पत्नी महालक्ष्मी की भक्त थी.उसकी पत्नी ने घर के चारों ओर दीपक जलाया और भजन करने लगी.

 

उस दिन सर्प के अवतार में यमराज उसके घर गए जिससे वो राजकुमार को डस लें. लेकिन दीपिक की रौशनी से उनकी आंखे चौंधियां गई और उसे कुछ भी समझ नहीं आया. और वो राजकुमार की पत्नी के पास पहुंच गया जहां पर वो महालक्ष्मी की पूजा कर रहीं थीं. सर्प भी उस पूजा में मगन हो गया. सुबह होने पर सर्प के रूप में आए यमराज को खाली हाथ ही लौटना पड़ा. क्योंकि मृत्यु का समय टल गया था. इससे राजकुमार की पत्नी कारण दीर्घायु हुए और तभी से इस दिन यमराज के लिए दीप जलाने की प्रथा प्रचलन में आ गई.

इसी के चलते मान्यता है कि जिस घर में दीपदान किया जाता है, वहां अकाल मृत्यु नहीं होती है. धनतेरस की शाम को मेन गेट पर 13 और घर के अंदर भी 13 दीप जलाने चाहिए. लेकिन यम के नाम का दीपक परिवार के सभी सदस्यों के घर आने और खाने-पीने के बाद सोते वक्त जलाया जाता है. इस दीप को जलाने के लिए पुराने दीपक का इस्तेमाल किया जाता है. इसमें सरसों का तेल डाला जाता है. ये दीपक घर से बाहर दक्षिण की ओर मुख कर नाली या कूड़े के ढेर के पास रख दिया जाता है. इसके बाद जल चढ़ा कर दीपदान करते वक्त मंत्र बोला जाता है.
मृत्युना पाशहस्तेन कालेन भार्यया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात्सूर्यज: प्रीतयामिति।।

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First published: 10 November 2020, 19:25 IST
 
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