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अब तुमसे रुख़्सत होता हू, आओ संभालो साजे़-गजल...

कैच ब्यूरो | Updated on: 3 March 2017, 16:30 IST
Firaq Gorakhpuri

फ़िराक़ गोरखपुरी (रघुपति सहाय) उर्दू के मशहूर शायर थे. सन 1970 में उनके उर्दू काव्य 'गुले नग्मा' के लिए उन्हें ज्ञानपीठ से सम्मानित किया गया. साहित्य अकादमी और पद्मभूषण पुरस्कारों से सम्मानित फ़िराक़ का देहांत आज ही के दिन 3 मार्च 1982 में हुआ था.

फि‍राक गोरखपुरी बीसवीं सदी के वह शायर हैं, जो जंगे-आजादी से लेकर प्रगतिशील आंदोलन तक से जुड़े रहे. उनकी ज़ाती जिंदगी बेहद कड़वाहटों से भरी हुई थी, इसके बावजूद उन्होंने अपने कलाम को इश्क के रंगों से सजाया था. आज भी उनके शेर महफिलों में सुनाए जाते हैं...

1. अब तुमसे रुख्सत होता हू, आओ संभालो साजे-गजल
नये तराने छेड़ो, मेरे नगमों को नींद आती है...

2. हो जिन्हे शक,वो करें और खुदाओं की तलाश
हम तो इन्सान को दुनिया का खुदा कहते हैं!

3. तेरे आने की क्या उमीद मगर
कैसे कह दूँ कि इंतिज़ार नहीं

4 ..सितारों से उलझता जा रहा हूँ
शब-ए-फ़ुरक़त बहुत घबरा रहा हूँ

5. तेरे ग़म को भी कुछ बहला रहा हूँ
जहाँ को भी समझा रहा हूँ!

6. कोई समझे तो एक बात कहूँ
इश्क़ तौफ़ीक है गुनाह नहीं

7. मौत का भी इलाज हो शायद
ज़िन्दगी का कोई इलाज नहीं

8. आए थे हंसते खेलते मय-ख़ाने में ‘फ़िराक़’
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए

9. अब तो उन की याद भी आती नहीं
कितनी तन्हा हो गईं तन्हाइयां. 

10. भरी महफ़ि‍ल में हर इक से बचा कर
तेरी आँखों ने मुझसे बात कर ली. 

First published: 3 March 2017, 18:43 IST
 
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