Home » कल्चर » Bekal Utsahi the famous urdu poet some famous poetry and stage performance
 

कहेंगे लोग कि 'बेकल' कबीर जैसा था !

सुधाकर सिंह | Updated on: 10 February 2017, 1:38 IST
(फाइल फोटो)

मशहूर शायर और अदबी जमात के बड़े नाम बेकल उत्साही का शनिवार को इंतकाल हो गया. अवध की मिट्टी से ताल्लुक रखने वाले बेकल उत्साही की शायरी गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल है, उसमें मिट्टी की भीनी ख़ुशबू है और गांव-कस्बे की ज़िंदगी की जद्दोजहद भी.

बेकल उत्साही के नाम से चर्चित अवध के इस शायर की जिंदगी से जुड़ा एक क़िस्सा कम लोग जानते हैं. दरअसल उनके बचपन का नाम मोहम्मद शफ़ी ख़ान था. मोहम्मद शफ़ी ख़ान के बेकल उत्साही बनने के इस दिलचस्प क़िस्से के बारे में आपको बताते हैं:

नेहरू ने दिया उत्साही उपनाम

बात 1950 के दशक की है, जब युवा मोहम्मद शफ़ी ख़ान अपने परिवार वालों के साथ बाराबंकी जिले में मशहूर हाजी वारिस अली शाह की देवाशरीफ़ दरगाह में हाज़िरी लगाने गए थे.

इस दौरान शाह हाफिज प्यारी मियां ने कहा, "बेदम गया बेकल आया." इस वाकये के बाद मोहम्मद शफ़ी खान ने अपना नाम बदलकर बेकल वारसी रख लिया.

देश 1947 में आजाद हुआ और पहले प्रधानमंत्री बने पंडित जवाहरलाल नेहरू. 1952 में गोंडा जिले में एक चुनावी सभा में नेहरू को पहुंचना था.

बेकल उत्साही पर किताब लिखने वाले उन्हीं के शहर के इकराम वारिस इस घटना के बारे में कहते हैं कि जब नेहरू मंच पर पहुंचे तो बेकल वारसी ने उनका स्वागत 'किसान भारत का' ओजपूर्ण कविता से किया.

पंडित नेहरू बेकल वारसी के अंदाज़-ए-बयां से काफ़ी प्रभावित हुए और कहा, "ये हमारा उत्साही शायर है." इसी के बाद मोहम्मद शफ़ी ख़ान, बेकल वारसी से बदलकर बेकल उत्साही हो गए. साहित्य की दुनिया में वो आगे इसी नाम से मशहूर हुए.

छिड़ेगी बहस मेरे बाद...

बेकल सूफी परंपरा के शायर हैं. उनकी शायरी में गंगा-जमुनी तहजीब का रंग साफ नज़र आता है. उनकी एक शायरी तो ख़ासी चर्चित है, जिसमें वे उम्मीद करते हैं कि उनके न रहने के बाद उन्हें कबीर के सिलसिले में गिना जाए. मसलन उनका यह शेर:

सुना है मोमिन व ग़ालिब न मीर जैसा था, हमारे गांव का शायर नज़ीर जैसा था...

छिड़ेगी दैरो-हरम में ये बहस मेरे बाद, कहेंगे लोग कि बेकल कबीर जैसा था..

कुछ मशहूर नज़्म

1. सोज़ है हिन्दी का तो उर्दू का इसमें साज़ है, मेरे साथी गीत का मेरे यही अंदाज़ है...

2. वह कौशल्या पुत्र है या दशरथ का ताप, मैं हूं उसकी खोज में जिसका शिवजी करते हैं जाप...

3. मैं तुलसी का वंशधर अवधपुरी है धाम, सांस-सांस में सीता बसी, रोम-रोम में राम...

4. ऐ नए मौसम के पंछी अब सिमटना छोड़ दे, हौसले बाज़ू में रख और रुख़ हवा का मोड़ दे...

5. वजू करूं अजमेर में काशी में स्नान, धर्म मेरा इस्लाम है, भारत जन्मस्थान...

फिर मुझको रसखान बना दे...

मां मेरे गूंगे शब्दों को

गीतों का अरमान बना दे .

गीत मेरा बन जाये कन्हाई,

फिर मुझको रसखान बना दे .

देख सकें दुख-दर्द की टोली,

सुन भी सकें फरियाद की बोली,

मां सारे नकली चेहरों पर

आंख बना दे,कान बना दे.

मेरी धरती के खुदगर्जों ने

टुकड़े-टुकड़े बांट लिये हैं,

इन टुकड़ों को जोड़ के मैया

सुथरा हिन्दुस्तान बना दे .

गीत मेरा बन जाये कन्हाई,

फिर मुझको रसखान बना दे .

इक दिन ऐसा भी आएगा...

इक दिन ऐसा भी आएगा होंठ-होंठ पैमाने होंगे

मंदिर-मस्जिद कुछ नहीं होंगे घर-घर में मयख़ाने होंगे

जीवन के इतिहास में ऐसी एक किताब लिखी जाएगी

जिसमें हक़ीक़त औरत होगी मर्द सभी अफ़्साने होंगे

राजनीति व्यवसाय बनेगी संविधान एक नाविल होगा

चोर उचक्के सब कुर्सी पर बैठ के मूँछें ताने होंगे

एक ही मुंसिफ़ इंटरनैट पर दुनिया भर का न्याय करेगा

बहस मोबाइल ख़ुद कर लेगा अधिवक्ता बेग़ाने होंगे

उसका ग़म भी संवारता है मुझे...

वो तो मुद्दत से जानता है मुझे

फिर भी हर इक से पूछता है मुझे

रात तनहाइयों के आंगन में

चांद तारों से झांकता है मुझे

सुब्‌ह अख़बार की हथेली पर

सुर्ख़ियों मे बिखेरता है मुझे

होने देता नही उदास कभी

क्या कहूँ कितना चाहता है मुझे

मैं हूं बेकल मगर सुकून से हूं

उसका ग़म भी संवारता है मुझे...

गांव में बसना छोड़ दिया...

जब दिल ने तड़पना छोड़ दिया

जलवों ने मचलना छोड़ दिया

पोशाक बहारों ने बदली

फूलों ने महकना छोड़ दिया

पिंजरे की सम्त चले पंछी

शाख़ों ने लचकना छोड़ दिया

कुछ अबके हुई बरसात ऐसी

खेतों ने लहकना छोड़ दिया

जब से वो समन्दर पार गया

गोरी ने संवरना छोड़ दिया

बाहर की कमाई ने बेकल

अब गांव में बसना छोड़ दिया

साभार- कविता कोश और यू ट्यूब

First published: 3 December 2016, 3:17 IST
 
सुधाकर सिंह @sudhakarsingh10

कैच हिंदी, अवध के बलरामपुर से ज़िंदगी के सफ़र की शुरुआत. पत्रकारिता की यात्रा दिल्ली में जारी.

पिछली कहानी
अगली कहानी