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गांधी नहीं, अंबेडकर हैं राजनीति के सबसे बड़े नायक

पाणिनि आनंद | Updated on: 10 February 2017, 1:50 IST

मोहनदास करमचंद गांधी को भले ही भारत के राष्ट्रपिता के रूप में जाना जाता हो और 20वीं सदी की दुनिया के सबसे बड़े चेहरों में उन्हें गिना जाता हो, लेकिन 21 वीं सदी में भी भारतीय राजनीति के महानायक संविधान निर्माता और दलित नेता बाबासाहेब अंबेडकर ही हैं. राजनीति की धुरी अंबेडकर के इर्द-गिर्द ज़्यादा घूमती है. राजनीतिक दलों में होड़ गांधी के उत्तराधिकार की नहीं दिखती, अंबेडकर को अपनाने की दिखती है.

इसकी स्पष्ट वजह है. गांधी राजनीति में आदर्श की तरह स्थापित हैं. लेकिन इस आदर्श की स्थिति रसायन विज्ञान की पीरियॉडिक टेबल के आठवें कॉलम जैसी है. यह आदर्श गैसों की तालिका है और उनकी भूमिका बफर है. इससे उलट अंबेडकर समाज और राजनीति में एक तरह की उत्तेजना, भाव पैदा करने की क्षमता रखते हैं.

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राजनीति में दो ही समीकरण मोटे तौर पर देखे जाते रहे हैं. पहला है हिंदू और मुस्लिम का. दूसरा है अंबेडकरवाद और उसके विरुद्ध खड़े लोगों का. लेकिन पिछले कुछ दशकों के दौरान अंबेडकर के खिलाफ़ खड़े लोगों को भी अंबेडकर की कीमत का अंदाज़ा हुआ है और उन्होंने अंबेडकर को आंगीकार करने की कोशिशें तेज़ की हैं, भले ही राजनीतिक मजबूरियों के चलते.

गांधी राजनीति में आदर्श की तरह स्थापित हैं. लेकिन इस आदर्श की स्थिति रसायन विज्ञान की पीरियॉडिक टेबल के आठवें कॉलम जैसी हो चली है

दरअसल, इस अंबेडकर प्रेम की जड़ में पिछले 30 वर्षों की राजनीति के समीकरण हैं. अंबेडकर के सिद्धांतों को संवैधानिक रूप से स्वीकार करने वाली राजनीतिक पार्टियों ने भी अंबेडकर के लोगों को न्याय नहीं दिया. इससे देश और राज्यों में दलित राजनीति की ज़मीन तैयार होती गई और पिछले तीन दशकों के दौरान इसकी ताकत भी स्थापित होती गई. कांशीराम के आंदोलन ने जब बसपा को खड़ा किया तो लोगों को अंदाज़ा नहीं था कि बामसेफ से शुरू हुई यात्रा एक दिन मायावती को देश के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री बना देगा.

मायावती एक तरह से दलित राजनीति और भारतीय राजनीति का टर्निंग प्वाइंट प्वाइंट हैं. और यहां से अंबेडकर की ताकत राजनीति में पूरी तरह से स्थापित नज़र आती है. मायावती अंबेडकर के सिद्धांतों पर कितनी खरी उतरीं, यह हमेशा बहस का विषय रहेगा, लेकिन यह तो स्थापित हो गया कि राजनीति में दलित को बाहर रखकर या उनकी उपेक्षा करके बहुत आगे नहीं बढ़ा जा सकता है. इस ताकत में 20वीं सदी के आखिरी दशक में मंडल आयोग को लेकर हुए आंदोलन की भी भूमिका है.

जब हम अंबेडकर को याद करते हैं

अंबेडकर इतने विराट हो चुके हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसा घोर ब्राह्मणवादी संगठन भी उनको अपने नायकों में शामिल कर चुका है. 90 के दशक में सोशल इंजीनियरिंग की रणनीति में दलित और पिछड़े संघ के लिए अहम कड़ी बनकर उभरे. कांग्रेस की तो राजनीति ही दलितों पर आधारित रही है और जहां जहां दलितों ने कांग्रेस का साथ छोड़ा है, कांग्रेस या तो साफ हो गई है या फिर कमज़ोर पड़ गई है. भारत में आज कोई भी क्षेत्रीय या राष्ट्रीय स्तर की ऐसी पार्टी नहीं है जो अंबेडकर के खिलाफ़ खड़े होने का हौसला भी रखती हो.

अंबेडकर इतने अहम हो चुके हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसा ब्राह्मणवादी संगठन भी उनको अपने नायकों में शामिल कर चुका है

ऐसा तब हो रहा है जब गांधी की बातें और व्यक्तित्व समारोहों और मंचों तक सीमित हो गया है. गांधी का कद इतना बड़ा है कि कोई उन्हें नकारना नहीं चाहता. लेकिन राजनीति के अवसरवाद ने राजनीतिक दलों को समझा दिया है कि गांधी के नाम आज वोट नहीं मिल सकता.

नागपुर विश्वविद्यालय में अंबेडकर चेयर के अध्यक्ष डॉ प्रदीप आगलावे कहते हैं, “गांधी और अंबेडकर में बड़ा कौन है, इस विवाद में पड़ना नहीं चाहिए. लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि राजनीतिक दलों के लिए गांधी एक ऐतिहासिक पुरुष हैं और अंबेडकर एक क्रांतिकारी. उन्हें मालूम है कि सामाजिक बदलाव की धारा अब गांधी नहीं, अंबेडकर से होकर जाती है. अंबेडकर इसीलिए गांधी या किसी भी दूसरे नेता से अधिक प्रासंगिक हैं.”

कांग्रेस पार्टी के एक वरिष्ठ नेता मानते हैं कि दलित राजनीति के उदय से उनकी पार्टी कमज़ोर हुई है. वो कहते हैं, “हम दलितों के हित में काम करते रहे लेकिन हम केवल दलितों की पार्टी नहीं थे. हम किसी एक जाति या संप्रदाय की पार्टी नहीं थे. इसीलिए हम शायद दलितों के बीच उतनी मज़बूती से स्थापित नहीं रह सके और उग्र दलित आंदोलनों, राजनीतिक दलों ने जाति आधारित राजनीति में अधिक सफलता हासिल की.”

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आज स्थिति यह है कि दिल्ली में हाल के वर्षों में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ खड़े हुए आंदोलन ने जब आम आदमी पार्टी की शक्ल ली तो अपनी ताकत दलितों को बनाया. आप की जीत की धुरी दिल्ली के दलित और मुसलमान बने. इसी प्रयोग को वे अन्य राज्यों में आजमाना चाहते हैं. एमआईएम से असदुद्दीन ओवैसी अपनी पार्टी को उत्तर में लाना चाहते हैं और इसके लिए वो जय भीम, जय मीम का नारा दे रहे हैं.

अंबेडकर की 125वीं जन्मतिथि के लिए संसद के पिछले शीतकालीन सत्र में दो दिनों की विशेष बैठक बुलाई गई

भारतीय जनता पार्टी ने हाल के बिहार विधानसभा चुनाव में अपने को दलित चेहरों के साथ खड़ा दिखाया. पिछड़े और दलित भाजपा के लिए अपनी संख्या विस्तार की अगली कड़ी हैं. दलितों के बीच संघ गंभीरता से काम कर रहा है और उन्हें अपनी ओर खींचने के प्रयास तेज़ हो चुके हैं. यही स्थिति कांग्रेस की है. उन्हें अंबेडकर फिर से याद आ रहे हैं. अंबेडकर की 125वीं जन्मतिथि के लिए जब संसद के पिछले शीतकालीन सत्र में दो दिनों की विशेष बैठक बुलाई गई तो सारे राजनीतिक दल अंबेडकर के असल उत्तराधिकार के लिए लड़ते नज़र आए.

हाल के दिनों में रोहित वेमुला की आत्महत्या वाले प्रकरण में भाजपा को खासा नुकसान उठाना पड़ा है और इसीलिए संघ और भाजपा ने अंबेडकर को और मज़बूती से आंगीकार करने का प्रयास शुरू किया है. संघ के एक वरिष्ठ नेता समझाते हैं, “भाजपा और संघ को गांधी से कुछ गुरेज नहीं है. संकट यह है कि संघ को बार-बार गांधी वध के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जाता है जो कि ग़लत है. लेकिन कांग्रेस के प्रचार से यह झूठ भी सत्य माना जाने लगा. यही कारण है कि गांधी एक सीमा से अधिक हमारे नज़र नहीं आते.”

आज गांधी और नेहरू राजनीति में प्रासंगिकता खो रहे हैं. लेकिन अंबेडकर की प्रासंगिकता समय के साथ बढ़ते जाना तय है

पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक भाषण में कहा कि उनके जीवन के दो सबसे बड़े राजनीतिक नायक अंबेडकर और पटेल हैं. डॉ प्रदीप आगवाले कहते हैं, “भाजपा और संघ के ऐसे कथन झूठे हैं. यह अंबेडकर के प्रति झूठा प्रेम है और इसमें केवल वोट पाने का निहित है. दरअसल ये अंबेडकर को नहीं चाहते लेकिन अंबेडकर इनकी मजबूरी हैं.”

और भाजपा या संघ की यह राजनीतिक मजबूरी इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण हैं कि भारतीय राजनीति के आज के सबसे बड़े नायक अंबेडकर ही हैं. बाकी राजनीतिक दल भी इसी नीयत और हित से बंधे इस नायक को अपने सिर पर लिए धूम रहे हैं.

आगवाले कहते हैं कि आज गांधी और नेहरू राजनीति में प्रासंगिकता खो रहे हैं. संभव है अब से कुछ दशकों बाद ये पूरी तरह से अप्रासंगिक होने लगें. लेकिन अंबेडकर की प्रासंगिकता बढ़ती जाएगी. क्योंकि वहां दलितों, पिछड़ों की आवाज़ है. वहां मानवाधिकार की लड़ाई और संघर्ष है. वहां स्त्रियों के हक़ की बात है. जबतक सामाजिक न्याय की लड़ाई शेष है, अंबेडकर राजनीति के नायक बने रहेंगे.

First published: 15 April 2016, 9:48 IST
 
पाणिनि आनंद @paninianand

सीनियर असिस्टेंट एडिटर, कैच न्यूज़. बीबीसी हिन्दी, आउटलुक, राज्य सभा टीवी, सहारा समय इत्यादि संस्थानों में एक दशक से अधिक समय तक काम कर चुके हैं.

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