Home » कल्चर » Ghotul: Where pre marital sex is not a taboo
 

जहां बलात्कार अनसुना है, शारीरिक संबंध पवित्र कर्म हैं

दीपक शर्मा | Updated on: 16 November 2015, 18:52 IST
QUICK PILL
  • गोंड आदिवासियों के बीच बलात्‍कार अनसुना शब्द है, व्‍यभिचार दुर्लभ बात है और ऑनर किलिंग के नाम पर होने वाली हत्‍याएं लगभग शून्य हैं.
  • यहां शारीरिक संबंध एक पवित्र कर्म है. दूसरे की देह और आत्‍मा का सम्‍मान करना सभी दायित्वों से ऊपर है.
यौन मामलों में भारत समेत पूरे दक्षिण एशिया को रूढ़िवादी माना जाता है. यहां औरतों की आज़ादी सीमित होती है और पुरुषों के हाथ में सत्ता की चाबी होती है, यहां प्रेम विवाह करना आज भी एक छोटी मोटी बगावत है.

भारत में आज भी ऐसी स्वयंभू संस्थाएं सक्रिय हैं जो पार्कों और रेस्त्रां में जाने वाले नौजवान लड़के-लड़कियों को सुधारने के लिए 'आंदोलन' चलाते हैं.

लेकिन भारत के आदिवासी मुरिया गोंड समाज की घोटुल परंपरा रूढ़िवादी भारत की छवि से बिल्कुल अलग है.

घोटुल को बस्‍तर के मुरिया गोंड आदिवासियों का नाइटक्‍लब कहा जा सकता है, जहां वर्जनाओं के लिए कोई जगह नहीं है.

इसमें पुरुष और स्‍त्री दोनों किशोरावस्‍था से ही हिस्सा लेने लगते हैं. साथ काम करते हैं, खेलते हैं और जीवन के जरूरी सबक सीखते हैं.

घोटुल, गांव के बाहरी इलाके में बनाया गए मिट्टी या लकड़ी के एक झोपड़े को कहते हैं. इसका मक़सद किशोर-किशोरियों को दुनियावी पहलुओं की शिक्षा देना है.

मुरिया आदिवासियों के सामाजिक और धार्मिक जीवन में इसका केंद्रीय स्‍थान है. मुरिया समाज की मान्यता है कि उनके सबसे प्रमुख ईश्‍वर लिंगो ने सबसे पहला घोटुल बनाया था.

मुरिया बच्‍चे जैसे ही 10 साल के होते है घोटुल के सदस्‍य बन जाते हैं. घोटुल में शामिल लड़कियों को मोतियारी और लड़कों को चेलिक कहते हैं. लड़कियों के प्रमुख को बेलोसा और लड़कों के प्रमुख को सरदार कहते हैं.

बड़ों की सीमित भूमिका


घोटुल में व्यस्कों की भूमिका महज सलाहकार की होती है, जो बच्‍चों को सफाई, अनुशासन व सामुदायिक सेवा के महत्व से परिचित करवाते हैं. घोटुल में किशोर-किशोरियां के अलावा केवल उनके शिक्षक ही प्रवेश कर सकते हैं.

हर शाम बजने वाला नगाड़ा इस बात का संकेत होता है कि मोतियारियों और चेलिकों के घोटुल में जाकर मनोरंजन करने का समय हो गया है. वहां देर रात तक नाचने-गाने, मिलने-जुलने, छेड़छाड़-चुहल, अंत्याक्षरी और दूसरे तरह के खेल चलते रहते हैं. तम्‍बाकू और ताड़ी सबके के लिए उपलब्‍ध होता है.

नाचने-गाने और पीने-पिलाने का यह उत्‍सव देर रात तक चलता रहता है. मनोरंजन के बाद शिक्षक बच्‍चों का होमवर्क जांचने आते हैं. यहां बांस की कंघियां बनाने और पत्तों से सामान बनाने जैसे काम सिखाए जाते हैं.

एक शहरी स्‍कूल की तरह अच्‍छा प्रदर्शन करने वाले बच्‍चों की तारीफ की जाती है और सही होमवर्क न करने वालों को डांट पिलायी जाती है.

मनोरंजन और कामकाज की शिक्षा के अलावा घोटुल का उद्देश्य नौजवानों को व्‍यापक गोंड समुदाय का हिस्‍सा बनाना भी होता है, जिससे उन्हें अपनी परंपराओं और जिम्‍मेदारियों का समय रहते अहसास हो सके. अंतिम संस्कार समेत आदिवासी समाज के सभी संस्कारों में घोटुल के सदस्य जरूर शामिल होते हैं.

शारीरिक निकटता घोटुल का अभिन्न हिस्सा है. इसमें विपरीत लिंग के साथी के प्रति सहज रहना सिखाया जाता है.

यहां यौन-इच्‍छाओं को सहज तरीके से बरतने की सीख भी दी जाती है. किशोर और किशोरियां का बगैर कपड़ों के साथ-साथ नदी में तैरना यहां आम बात है.

घोटुल में एक दूसरे के साथ फ्लर्ट करना सामान्‍य बात मानी जाती है. अक्सर इसकी शुरुआत लड़कियां करती हैं. किसी मोतियारी को अगर कोई लड़का पसंद आ जाता है तो वो अपने मन की बात का संकेत देने के लिए उस लड़के की कंघी चुरा लेती है.

'जहां दिल मिलते हैं'

'बस्‍तर भूषण' कहे जाने वाले पंडित केदार नाथ भूषण लिखते हैं, ''घोटुल वह जगह है जहां दिल मिलते हैं. नीरस लोग यहां अकेले पड़ जाते हैं.''

किसी पर मालिकाना हक जताने की घोटुल में पूरी तरह मनाही है. अगर कोई सदस्‍य किसी एक लड़के या लड़की पर ज्यादा ध्‍यान देता है तो उसकी हरकत को पसंद नहीं किया जाता. कई बार इसके लिए सजा भी दी जाती है.

मुरिया समाज में अविवाहितों के लिए यौन स्‍वच्‍छंदता एक आम बात है. वहीं विवाहितों से अपने साथी से वफादार रहने की उम्मीद की जाती है.

अगर कोई विवाहित स्त्री या पुरुष अपने जीवनसाथी को धोखा देता है तो इसके लिए कठोर दंड का प्रावधान है. कभी-कभी तो इसके लिए मौत की सजा भी दी जा सकती है. हालांकि गोंड समाज में यह परंपरा अब लगभग खत्म हो चुकी है.

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घोटुल परंपरा को दुनिया के सामने ईसाई मिशनरी और एंथ्रोपॉलॉजिस्ट वेरियर एल्विन लाए. वो ईसाई मिशनरी के रूप में 1927 में भारत आए लेकिन जल्‍द ही उन्‍होंने धर्म प्रचार का काम छोड़कर अपना जीवन आदिवासियों के अध्ययन और समाज सुधार के लिए समर्पित कर दिया. 

एल्विन के अनुसार, ''घोटुल नौजवानों की जगह है, बच्‍चों का एक स्‍वतंत्र और स्‍वायत्त गणराज्‍य.''

एल्विन ने लिखा है, ''घोटुल का संदेश खांटी भारतीय है, युवाओं की सेवा की जानी चाहिए, आजादी और खुशी से बड़ा कोई भी खजाना नहीं है, मेहमाननवाजी और भाईचारा सबसे अहम चीजें हैं. इंसानी प्रेम और उसकी शारीरिक अभिव्‍यक्ति से सुंदर, पवित्र और कीमती दूसरी कोई चीज नहीं हो सकती.''

लुप्‍त होती परंपरा

दूसरी कई आदिवासी परंपराओं की तरह घोटुल भी लुप्‍तप्राय होता जा रहा है. इसकी एक बड़ी वजह आदिवासी इलाकों में माओवादियों का प्रभाव और आदिवासी समाज पर कथित सभ्य समाज की ''नैतिकताओं'' का भी असर है.

1970 के दशक में बीबीसी की एक डॉक्युमेंट्री में इस परंपरा को आदिम और कबीलाई बताया गया. 1980 के दशक में छपे कई लेखों में भी इसे सामाजिक पिछड़ेपन का प्रतीक और 'पाशविक' कहा गया.

घोटुल को लेकर विद्वानों और स्‍थानीय नेताओं में गलतफहमी इस हद तक बढ़ गयी कि 1984 से 1996 तक बस्‍तर के सांसद रहे मनकू राम सोढ़ी को घोटुल के बारे में फैली भ्रांतियों को संसद में दूर करना पड़ा.

विरोध के चलते सरकार ने अबूझमाड़ को प्रतिबंधित क्षेत्र घोषित कर दिया. यह प्रतिबंध साल 2009 में हटाया गया. इससे पहले तक बाहरी लोगों को यहां जाने के लिए लिखित अनुमति लेनी होती थी.

सभ्य समाज की नैतिकता और माओवाद

अपनी उदात्त परंपरा के लिए आदिवासियों को कथित सभ्य समाज के नैतिकतावादियों के अलावा इस इलाकों में प्रभावी माओवादियों की कटु आलोचना का भी सामना करना पड़ता है. माओवादी चाहते हैं कि आदिवासी युवा घोटुल के बजाय उनकी पार्टी में शामिल होकर शिक्षा पाएं.

घोटुल का नष्ट होना महज एक परंपरा या सांस्‍कृतिक विरासत का खत्म होना नहीं है. एंथ्रोपॉलॉजिस्टों का मानना है कि आदिवासी समाजों में मौजूद जेंडर समानता का मुख्य कारण ऐसी परंपराएं ही हैं.

मसलन, गोंड आदिवासियों के बीच बलात्‍कार की बात कभी नहीं सुनी गई, व्‍यभिचार दुर्लभ बात है और ऑनर किलिंग के नाम पर की जाने वाली हत्‍याएं वहां लगभग नहीं होती हैं.

यहां शारीरिक संबंध एक पवित्र कर्म है. दूसरे की देह और आत्‍मा का सम्‍मान करना सभी दायित्वों से ऊपर आता है.

सभ्य दुनिया में प्रचलित जेंडर इक्वैलिटी (लैंगिक समानता) जैसे शब्द आदिवासियों के लिए अनसुने हैं. आदिवासी जीवन में स्त्री और पुरुष बराबरी के सहचर हैं. उनमें कोई ऊंचा-नीचा नहीं है.

समाज से जुड़े फैसलों में महिला की बराबर भागीदारी होती है. यहां तक कि समाज के कई महत्वपूर्ण पद महिलाओं के लिए ही सुरक्षित हैं.

यह अजीब विडंबना है कि एक ओर जनता को बलात्‍कार के मामलों में इंसाफ पाने के लिए सड़क पर उतरना पड़ता है, वहीं आदिवासी समाज को उनकी ज्यादा खुली, प्रगतिशील, यौन बराबरी वाली परंपराओं से दूर किया जा रहा है.

शायद यह सही वक्‍त है कि हम प्रगतिशील होने की नई परिभाषा गढ़ें और अब तक जिन्हें सभ्य बनाने की कोशिशें की जाती रही हैं उनसे सभ्यता के कुछ सबक सीखें.

First published: 16 November 2015, 18:52 IST
 
दीपक शर्मा @catch_deepak

Is a Delhi-based journalist whose heart still resides in his native mountains of Himachal. After almost a decade-long career in television news, he's made the switch to digital. When not working, he likes to venture into the world of theatre, music and literature. Obscure places are where he meets his element.

पिछली कहानी
अगली कहानी