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आज का गूगल डूडलः जानें मुंशी प्रेमचंद की जन्मतिथि पर अंजानी बातें

कैच ब्यूरो | Updated on: 31 July 2016, 13:12 IST

रविवार को हिंदी साहित्यजगत के कालजयी उपंयासकार मुंशी प्रेमचंद का 136वां जन्मदिन मनाया गया. दुनिया के दिग्गज सर्च इंजन गूगल ने भी इस मौके पर इस महान साहित्यकार को श्रद्धांजलि देते हुए इनका डूडल बनाया. 

अपनी असाधारण लेखनी से पाठकों के दिलों में पहचान वाले बेहद साधारण व्यक्तित्व के स्वामी प्रेमचंद को बच्चे हो या बूढ़े हर कोई पहचानता है. लेकिन गूगल ने इस महान लेखक का डूडल बनाकर दुनिया को उनकी सादगी और सशक्त लेखन का संदेश दिया है.

जानिए मुंशी प्रेमचंद से जुड़ी जरूरी जानकारी

हिंदी भाषा जो हमारी राष्ट्रीय भाषा है जो हर किसी को अपना लेती है. यह सरल के बहुत सरल और कठिन के लिए बहुत कठिन बन जाती है. हिंदी को हर दिन एक नया रूप एक नई पहचान मिलती है. और ये पहचान देने वाले होते हैं उसके साहित्यकार उसके लेखक. 

उन्हीं में से एक महान छवि थी मुंशी प्रेमचंद की. वे एक ऐसे प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के धनी थे जिसने हिंदी विषय की काया पलट कर दी. मुंशी प्रेमचंद एक ऐसे लेखक थे जो समय के साथ बदलते गये. हिंदी साहित्य को आधुनिक रूप प्रदान किया. इन्होंने सरल सहज हिंदी को ऐसा साहित्य प्रदान किया जिसे लोग कभी नहीं भूल सकते. 

बड़ी कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए हिंदी जैसे विषय में अपनी अमिट छाप छोड़ी. मुंशी प्रेमचंद्र हिंदी के लेखक ही नहीं बल्कि एक महान साहित्यकार, नाटककार, उपन्यासकार जैसी बहुमुखी प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे. 

इनका जन्म 31 जुलाई 1880 में वाराणसी के नजदीक लमही गांव में हुआ था. इनके पिता का नाम अजायब राय था. वह डाकखाने में मामूली नौकर के तौर पर काम करते थे. प्रेमचंद्र का पूरा नाम धनपत राय था. आठ साल की आयु में ही इनकी माता का स्वर्गवास हो गया. उसके बाद इन्हें जीवन के अंत तक लगातार विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. पिताजी ने दूसरी शादी कर ली जिसके कारण यह मां के प्यार और स्नेह से दूर हो गये. इनका जीवन गरीबी में पला.

मुंशी प्रेमचंद के पिता ने मात्र 15 वर्ष की आयु में इनका विवाह करा दिया. पत्नी की सूरत और उसके जुबान ने प्रेमचंद्र के जले पर नमक का काम किया. सन 1905 के अंतिम दिनों में शीवरानी देवी से शादी कर ली. शीवरानी देवी एक विधवा थी और विधवा के प्रति ये सदा स्नेह के पात्र रहे थे. दूसरी शादी के बाद इनकी परिस्थितियां कुछ बदलीं और आर्थिक तंगी कम हुई. इनकी पदोन्नति हुई और स्कूलों के डिप्टी इंस्पेक्टर बना दिये गए. 

इसी समय इनकी पांच कहानियों का संग्रह ‘सोजे वतन’ प्रकाश में आया. यह संग्रह काफी मशहूर हुआ. विवाह के एक साल बाद ही पिताजी का देहांत हो गया. अचानक इनके सिर पर पूरे घर का बोझ आ गया. एक साथ पाँच लोगों का खर्चा सहन करना पड़ा. पांच लोगों में विमाता, उसके दो बच्चे पत्नी और स्वयं. प्रेमचंद की आर्थिक विपत्तियों का अनुमान इस घटना से लगाया जा सकता है कि पैसे के अभाव में उन्हें अपना कोट बेचना पड़ा और पुस्तकें बेचनी पड़ी. 

एक दिन ऐसी हालत हो गई कि वे अपनी सारी पुस्तकों को लेकर एक बुकसेलर के पास पहुंच गए. वहाँ एक हेडमास्टर मिले जिन्होंने इनको अपने स्कूल में अध्यापक पद पर नियुक्त किया. 

कठिन परिस्थितियों में भी नहीं छोड़ी पढ़ाई

जीवन के आरंभ में प्रेमचंद्र अपने गांव से दूर बनारस पढ़ने के लिए नंगे पांव जाया करते थे. इसी बीच पिता का देहांत हो गया. इन्हें पढ़ने का बहुत शौक था, आगे चलकर वकील बनना चाहते थे. मगर गरीबी ने तोड़ दिया. स्कूल आने-जाने के झंझट से बचने के लिए एक वकील साहब के यहां ट्यूशन पकड़ लिया और उसी के घर एक कमरा लेकर रहने लगे. 

ट्यूशन का पाँच रुपया मिलता था. पांच रुपये में से तीन रुपये घर वालों को और दो रुपये से अपनी जिंदगी की गाड़ी को आगे बढ़ाते रहे. इस दो रुपये से क्या होता महीना भर तंगी और अभाव का जीवन बिताते थे. इन्हीं जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियों में मैट्रिक पास किया.

13 वर्ष की आयु से शुरू हुआ साहित्यिक सफर

गरीबी, अभाव, शोषण तथा उत्पीड़न जैसी जीवन की प्रतिकूल परिस्थितियां भी प्रेमचंद के साहित्य की ओर उनके झुकाव को रोक न सकी. प्रेमचंद जब मिडिल में थे तभी से उपन्यास पढ़ना आरंभ कर दिया थे. इन्हें बचपन से ही उर्दू आती थी. इन पर नॉवल और उर्दू उपन्यास का ऐसा उन्माद छाया कि वे बुकसेलर की दुकान पर बैठकर ही सब नॉवल पढ़ गए. 

इन्होंने दो-तीन साल के अंदर ही सैकड़ों नॉवेलों को पढ़ डाला. बचपन में ही उर्दू के समकालीन उपन्यासकार सरुर मोलमा शार, रतन नाथ सरशार आदि के दीवाने हो गये कि जहां भी इनकी किताब मिलती उसे पढ़ने का हर संभव प्रयास करते थे. अंग्रेजी के अपने जमाने के मशहूर उपंयासकार रोनाल्ड की किताबों के उर्दू तरजुमों को इन्होंने काफी कम उम्र में ही पढ़ लिया था. 

13 वर्ष की उम्र से ही प्रेमचंद ने लिखना आरंभ कर दिया था. शुरु में कुछ नाटक लिखे फिर बाद में उर्दू में लिखना आरंभ किया. इस तरह इनका साहित्यिक सफर शुरु हुआ जो मरते दम तक साथ-साथ रहा. 

सहानुभूति के अथाह सागर थे प्रेमचंद 

मुंशी प्रेमचंद का स्वभाव बहुत ही सरल था. खुद में मस्त रहने वाले प्रेमचंद जीवन में विषमताओं और कटुताओं से लगातार खेलते रहे. इस खेल को उन्होंने बाजी मान लिया जिसको हमेशा जीतना चाहते थे. जहां उनके हृदय में मित्रों के लिए उदार भाव था वहीं उनके हृदय में गरीबों एवं पीड़ितों के लिए सहानुभूति का अथाह सागर था. 

जैसा कि उनकी पत्नी कहती हैं कि जाड़े के दिनों में चालीस-चालीस रुपये दो बार दिए गए दोनों बार उन्होंने वह रुपये प्रेस के मजदूरों को दे दिये. मेरे नाराज होने पर उन्होंने कहा कि यह कहां का इंसाफ है कि हमारे प्रेस में काम करने वाले मजदूर भूखे हों और हम गरम सूट पहनें.

प्रेमचंद की कृतियां 

प्रेमचंद ने अपने नाते के मामू के एक विशेष प्रसंग को लेकर अपनी सबसे पहली रचना लिखी. 13 साल की आयु में इस रचना के पूरा होते ही प्रेमचंद साहित्यकार की पंक्ति में खड़े हो गए. सं 1894 ई० में ‘होनहार बिरवार के चिकने-चिकने पात’ नामक नाटक की रचना की. सं 1898 में एक उपन्यास लिखा. 

लगभग इसी समय रुठी रानी नामक दूसरा उपन्यास जिसका विषय इतिहास था की रचना की. सन 1902 में प्रेमा और सं 1904-05 में हम खुर्मा व हम सवाब नामक उपन्यास लिखे गए. इन उपन्यासों में विधवा-जीवन और विधवा-समस्या का चित्रण प्रेमचंद ने काफी अच्छे ढंग से किया. 

जब कुछ आर्थिक निश्चिंतता आई तो 1907 में पांच कहानियों का संग्रह सोड़ो वतन (वतन का दुख दर्द) की रचना की. जैसा कि इसके नाम से ही मालूम होता है, इसमें देश प्रेम और देश को जनता के दर्द को प्रस्तुत किया. 

अंग्रेज शासकों को इस संग्रह से बगावत की झलक मालूम हुई. इस समय प्रेमचंद नायाब राय के नाम से लिखा करते थे. लिहाजा नायाब राय की खोज शुरु हुई. नायाबराय पकड़ लिये गए और शासक के सामने बुलाया गया. 

उस दिन इनके सामने ही इनकी इस कृति को अंग्रेजी शासकों ने जला दिया और बिना आज्ञा न लिखने का बंधन लगा दिया गया. इस बंधन से बचने के लिए प्रेमचंद ने दयानारायण निगम को पत्र लिखा और उनको बताया कि वह अब कभी नायाब राय या धनपतराय के नाम से नहीं लिखेंगे तो मुंशी दयानारायण निगम ने पहली बार प्रेमचंद नाम सुझाया. यहीं से धनपतराय हमेशा के लिए प्रेमचंद हो गये. सेवा सदन मिल मजदूर तथा 1935 में गोदान की रचना की. 

गोदान समस्त रचनाओं में सबसे ज्यादा मशहूर हुई. अपनी जिंदगी के आखिरी सफर में मंगलसूत्र नामक अंतिम उपन्यास लिखना आरंभ किया. दुर्भाग्यवश मंगलसूत्र को अधूरा ही छोड़ गये. इससे पहले उन्होंने महाजनी और पूंजीवादी युग प्रवृत्ति की निंदा करते हुए महाजनी सभ्यता नाम से एक लेख भी लिखा था. सं 1936 ई० में प्रेमचंद बीमार रहने लगे. इस दौरान ही उन्होंने प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना में सहयोग दिया. आर्थिक कष्टों तथा इलाज ठीक से न कराये जाने के कारण 8 अक्टूबर 1936 में इनका देहांत हो गया. 

और इस तरह वह दीप सदा के लिए बुझ गया जिसने अपनी जीवन की बत्ती को कण-कण जलाकर भारतीयों का पथ आलोकित किया.

First published: 31 July 2016, 13:12 IST
 
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