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एक बाबू के हाथ नेहरू मेमोरियल लाइब्रेरी की कमान देने पर क्या कहते हैं इतिहासकार

प्रणेता झा | Updated on: 18 August 2016, 8:44 IST

कई प्रख्यात इतिहासकारों ने पूर्व प्रशासनिक अधिकारी शक्ति सिन्हा को दिल्ली स्थित नेहरू मेमोरियल म्यूजियम एंड लाइब्रेरी (एनएमएमएल) के निदेशक पद पर नियुक्ति किए जाने की निंदा की है. सिन्हा का शैक्षणिक रिकाॅर्ड कुछ खास नहीं है और एनएमएमएल आधुनिक एवं समसामयिक इतिहास विषय पर शैक्षणिक अनुसंधान के लिए भारत का एक प्रमुख संस्थान है.

सिन्हा के चयन के विरोध में 11 अगस्त को वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक प्रताप भानु मेहता ने स्वायत्त संस्था एनएमएमएल की कार्यकारी परिषद से इस्तीफा दे दिया. 16 अगस्त को इकाॅनाॅमिक टाइम्स में छपी एक खबर के अनुसार  अर्थशास्त्री और निर्वाचन आयोग के सदस्य नितिन देसाई ने भी इस पद पर सिन्हा की उम्मीदवारी पर आपत्ति जताई है. देसाई संयुक्त राष्ट्र में अधिकारी रह चुके हैं.

जिन इतिहासकारों से कैच ने बात की, उनमें से अधिकतर एनएमएमएल में किसी न किसी पद पर रह चुके हैं. सभी की इस बारे में एक ही राय थी कि विशुद्ध रूप से एक प्रशासनिक अधिकारी को ऐसे संस्थान का प्रमुख बनाना उचित नहीं है जो कि मेहता के शब्दों में ‘दुनिया में ऐतिहासिक तौर पर बुद्धिजीवियों का केंद्र हो.’ मेहता ने अपने इस्तीफे में इन्हीं शब्दों का इस्तेमाल किया है.

इसके पहले भी एनएमएमएल के प्रमुख एक पूर्व प्रशासनिक अधिकारी, डाॅ. ओपी केजरीवाल रह चुके हैं जो जून 1999 से फरवरी 2004 के बीच इस पद पर रहे. परन्तु उनकी शैक्षणिक योग्यता और प्रकाशन कार्य इस पद के अनुरूप थे. इसमें 1988 का शानदार ऐतिहासिक कार्य भी शामिल है, जिसका शीर्षक है, ‘द एशियाटिक सोसायटी आॅफ बंगाल एंड डिस्कवरी आॅफ इंडियाज पास्ट,1784-1838.’

विशुद्ध रूप से एक प्रशासनिक अधिकारी को एनएमएमएल जैसे प्रतिष्टित संस्थान का प्रमुख बनाना उचित नहीं है

परन्तु विदेश राज्य मंत्री और निर्वाचन आयोग के उपाध्यक्ष एमजे अकबर की अध्यक्षता में एक छह सदस्यीय समिति द्वारा उक्त पद के लिए चुने गए सिन्हा की शैक्षणिक योग्यता इस पद से कतई मेल नहीं खाती.

सिन्हा 1979 बैच के एजीएमयूटी कैडर के आईएएस अधिकारी हैं और 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी के निजी सचिव रहे हैं, जब केंद्र में एनडीए की सरकार थी. सिन्हा दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास विषय में स्नातक हैं और जाॅर्ज मेडिसन यूनिवर्सिटी से लोक नीति में.

श्रम इतिहासकार एव बुद्धिजीवी डाॅ. दिलीप सिमाॅन का कहना है, ‘संबंधित नौकरशाह के शिक्षाविद होने में कुछ नुकसान नहीं है लेकिन यहां मुद्दा यह नहीं है.’ उन्होंने कहा, ‘एनएमएमएल में इससे पहले विशेष ड्यूटी पर कई आईएएस अधिकारी रह चुके हैं और उन्होंने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई है लेकिन वे केवल अंशकालिक प्रमुख थे. एनएमएमएल के हाल ही में सेवानिवृत्त हुए उपनिदेशक की सेवाओं से ही यह संभव हो सका है कि संस्था ने अच्छा कार्य किया.’

सिमाॅन ने कहा, ‘संस्था के पूर्व निदेशक जाने-माने इतिहासकार महेश रंगराजन अपनी जिम्मेदारी भलि-भांति निभा रहे थे लेकिन नई सरकार ने उन्हें हटा दिया, जबकि एनएमएमएल उनके कार्यकाल में अच्छा काम कर रहा था. एनएमएमएल दुनिया भर में एक प्रतिष्ठित संस्थान का दर्जा रखता है. इसलिए इसे राजनीति से परे होना चाहिए.’

1964 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के प्रधानमंत्री आवास तीन मूर्ति भवन में स्थापित एनएमएमएल आधुनिक भारतीय इतिहास, विशेषकर भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से संबंधित ऐतिहासिक सामग्री और शोध का उत्तम संग्रहालय है. यह संस्था संस्कृति मंत्रालय के अधीन आती है.

निदेशक जाना-माना शिक्षाविद होना चाहिए, जिसकी भारत के आजादी के आंदोलन के बारे में समझ स्पष्ट हो

विख्यात इतिहासकार डाॅ. तनिका सरकार कहती हैं, ‘किसी गैर विशेषज्ञ को इस तरह के विशिष्ट संस्थान का प्रमुख बनाना खतरे से खाली नहीं है, जिसे हर समय किसी न किसी बाहरी मदद की जरूरत होती है. क्या आप किसी इतिहासकार को प्राकृतिक विज्ञान संस्थान का प्रमुख बनाना पसंद करेंगे?’

सरकार बताती हैं, ‘एनएमएमएल ने पूर्व में शानदार काम किया है. इसके तहत बहुत सा संग्रह कार्य, किताबों की खरीद, निजी पत्रों की मांग, सेमिनार और सम्मेलनों का आयोजन, प्रकाशनों की सार-संभाल, फेलोशिप निर्धारण आदि कार्य सम्मिलित है. इस संस्था का कार्य विशेष और विशुद्ध रूप से अकादमिक है. सवाल राजनीतिक विचारधारा का न हो कर अध्ययन का है. सवाल वाम या दक्षिण का भी नहीं है. आरसी मजूमदार जैसे विख्यात इतिहासकार भी हुए हैं, जो दक्षिणपंथी हैं. सवाल है उत्कृष्ट इतिहासकार होने का. देश में इतिहासकारों और समाज विज्ञानियों की कोई कमी नहीं है, फिर इस पद के लिए प्रशासनिक अधिकारी की जरूरत क्यों पड़ी?

भाजपा द्वारा रंगराजन की नियुक्ति अवैध और सिद्धान्त विरोधी बताए जाने के बाद 16 सितम्बर 2015 को रंगराजन ने  इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद से ही एनएमएमल किसी मुखिया की तलाश में था.

रंगराजन की नियुक्ति 2011 में यूपीए सरकार द्वारा की गई थी और 2014 के आम चुनाव से ठीक पहले उनका कार्यकाल बढ़ा दिया गया था.

देश में इतिहासकारों और समाज विज्ञानियों की कमी नहीं है, फिर इस पद के लिए प्रशासनिक अधिकारी की जरूरत क्यों पड़ी

माना जा रहा है कि सिन्हा इस पद के लिए संघ की पसंद हैं. वे संघ से जुड़े थिंक टैंक इंडिया फाउन्डेशन के निदेशक रह चुके हैं. ऐसी भी खबरें मिली हैं कि चयन समिति ने पहले केवल सिन्हा का ही नाम चयन समिति को भेजने का विचार किया था लेकिन बाद में इग्नू के प्रोफेसर कपिल कुमार का नाम भी भेजा गया.

चयन समिति के सदस्य रहे मेहता ने अपने इस्तीफे में इस बात का भी जिक्र किया है कि इस पद के लिए विज्ञापन में बिना चयन समिति की स्वीकृति के कई संशोधन किया गया और इसमें ‘प्रशासक’ आवेदन के लिए योग्य हैं, यह भी जोड़ा गया.

दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पोलिसी रिसर्च के अध्यक्ष मेहता ने लिखा कि ऐसे प्रशासनिक अधिकारी को संस्थान का अध्यक्ष नियुक्त करना जिसका अकादमिक जगत में कोई खास रिकाॅर्ड नहीं रहा हो, एनएमएमएल जैसे संस्थान के बारे में गलत संदेश देता है.

इतिहास के सेवानिवृत्त प्रोफेसर और एनएमएएल के अध्येता रह चुके डाॅ. राणा बहल बताते हैं, सारी सरकारें ऐसे पदों पर उन लोगों की नियुक्तियां करती हैं, जो सरकार की आलोचना नहीं करते परन्तु यह एक ऐसे राष्ट्रीय संस्थान की पूर्णतः तौहीन है जिसमें दुनिया भर से शोधार्थी अध्ययन के लिए आते हैं. उन्होंने कहा, ‘एक निदेशक से कम से कम यह अपेक्षा की जाती है कि वह अकादमिक कार्य और अनुसंधान के मानकों से पूरी तरह वाकिफ हो, जो एनएमएमएल को आवश्यक दिशा निर्देश दे सके. परन्तु लगता है संघ परिवार राष्ट्रीय महत्व के सारे संस्थानों को नियंत्रित करना चाहता है.’

राजनीतिक विश्लेषक अचिन विनायक कहते हैं, ‘एनएमएमएल में काफी अलग तरह के निदेशकों का इतिहास रहा है. जैसे जब मैं वहां फेलो था तब इसके निदेशक रवीन्द्र कुमार थे और महेश रंगराजन तो अपने आप में महान अध्येता हैं. लगता है सरकार को ऐसा बुद्धिजीवी नहीं मिल रहा जो उसके सिद्धांतों का अनुसरण करे, इसलिए वह ऐसे साधारण लोगों से काम चला रही है.'

वकील एवं इतिहासकार अनिल नौरिया कहते हैं, ‘निदेशक जाना-माना शिक्षाविद होना चाहिए. आदर्श रूप से भारत के आजादी के आंदोलन के बारे में उसकी समझ स्पष्ट हो, जो कि एनएमएमएल का मुख्य फोकस है. केवल वही व्यक्ति एनएमएमएल का निदेशक नियुक्त किया जाना चाहिए जो आधुनिक धर्मनिरपेक्ष भारत के बारे में व्यापक दृष्टिकोण रखता हो और इतिहास संबंधी छात्रवृत्ति के क्षेत्र में जिसकी अच्छी साख हो.'

एनएमएमएल ने देश के कई बड़े इतिहासकारों को फेलोशिप प्रदान की है. हालांकि पिछले कुछ सालों से नई फेलोशिप नहीं दी गई हैं.

First published: 18 August 2016, 8:44 IST
 
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