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हिंदी दिवस पर हिंदी अकादमी का सम्मान कार्यक्रम बना अपयश और अपमान का कार्यक्रम

अतुल चौरसिया | Updated on: 14 September 2016, 7:38 IST

दिल्‍ली के किशनगंज स्थित हिंदी अकादमी के प्रांगण में हिंदी दिवस की पूर्व संध्‍या पर बदनामी के काले बादल मंडरा रहे हैं. दरअसल हिंदी दिवस से ठीक एक दिन पहले कुछ लेखकों और पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर यह ख़बर सार्वजनिक की कि दिल्ली सरकार के अधीन आने वाली हिंदी अकादमी ने 'भाषादूत सम्‍मान' देने के नाम पर उनका अपमान किया है.

गौरतलब है कि पांच दिन पहले दिल्‍ली के संस्‍कृति मंत्री कपिल मिश्रा ने बयान दिया था कि इस साल हिंदी दिवस पर उन लोगों को 'भाषादूत सम्‍मान' से नवाज़ा जाएगा जिन्‍होंने डिजिटल माध्‍यम में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए अच्‍छा काम किया है.

इस बयान के अगले दिन 10 सितंबर को दिल्‍ली के कुछ लेखकों और पत्रकारों के पास अकादमी की तरफ से सम्मान देने संबंधी सूचना फोन से भेजी गई. पुरस्‍कार देने संबंधी एक औपचारिक पत्र भी मेल के जरिए हिंदी अकादमी ने उन लेखकों को भेजा. इस पत्र में अकादमी के सचिव डॉ. जीतराम भट्ट के दस्‍तखत थे. इसके बाद जो हुआ, वह हिंदी सेवा के नाम पर दिए जाने वाले पुरस्‍कारों के इतिहास में एक और बदनुमा दाग ही कहा जाएगा.

भिन्न-भिन्न सूत्रों से मिली सूचना के मुताबिक सम्‍मान देने के लिए अकादमी के सचिव की ओर से कुल पांच व्‍यक्तियों को ईमेल के जरिए पत्र भेजा गया था. इनमें पत्रकार शिवेंद्र सिंह, अभिषेक श्रीवास्‍तव, अरुण देव, अशोक कुमार पांडे और संतोष चतुर्वेदी के नाम शामिल हैं. हालांकि इस सूची में कुछ और नाम शामिल हो सकते हैं.

इस संबंध में अभिषेक श्रीवास्तव ने बताया कि उन्होंने पहले ही पुरस्कार लेने से इनकार करते हुए अकादमी को लिखे अपने जवाब में कह दिया था कि, उनकी जगह यह पुरस्‍कार 'किसी उपयुक्‍त और ज़रूरतमंद व्‍यक्ति को दे दिया जाए' क्‍योंकि वे पुरस्‍कृत होने में असहज महसूस करते हैं. हालांकि बाकी लोगों ने पुरस्कार लेने की हामी भर दी थी.

इस जवाब के जवाब में अकादमी के कार्यालय अध्‍यक्ष की ओर से 12 सितंबर को एक पत्र उन्‍हें प्राप्‍त हुआ जिसमें लिखा था:

'महोदय, कृपया दिनांक 10.09.2016 को प्रेषित पत्रांक रहित पत्र को देखने का कष्ट करें. निवेदन है कि त्रुटिवश आपको पत्र प्रेषित किया गया है. इस संबंध में अभी तक कोई विभागीय निर्णय नहीं हो पाया है. अतः इस पत्र को निरस्त किया जा रहा है. इस संबंध में मानवीय भूल को मानते हुए आपसे क्षमा-प्रार्थी हैं. कष्ट के लिए खेद है.'

दिलचस्‍प है कि इस पत्रांकयुक्‍त पत्र के माध्‍यम से एक पत्रांकरहित पत्र को न केवल मान्‍यता दी गई, बल्कि उसे ऑन दि रिकॉर्ड ला दिया गया जो अकादमी की कार्यशैली पर प्रश्‍नचिह्न खड़ा करता है.

लेकिन इस सम्मान के निमंत्रण और निरस्तीकरण के पीछे कुछ और भी खेल हो रहा था, इसका उद्घाटन मंगलवार को हुआ. जेएनयू में शिक्षक और 'समालोचन' नाम से ब्‍लॉग चलाने वाले अरुण देव ने अपनी फेसबुक दीवार पर दिनांक 10 और 12 सितंबर को मिले दोनों पत्र सार्वजनिक कर दिए.

दोनों पत्र हूबहू वैसे ही थे जैसे अभिषेक श्रीवास्‍तव को प्राप्‍त हुए थे. उसके बाद अशोक पांडे का पत्र सार्वजनिक हुआ, शिवेंद्र सिंह की ओर से भी यही सूचना आई और बाद में संतोष चतुर्वेदी के साथ भी इस हादसे की खबर आई.

इन सभी लोगों को पहले पुरस्कार देने का पत्र भेजा गया और बाद में उसे निरस्त करने की सूचना भेजी गई. जाहिर है यह लेखकों का अपमान था जिसकी प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर त्वरित हुई.

इस सिलसिलेवार उद्घाटन के बाद कैच ने अकादमी से जुड़े लोगों और पुरस्कार देने वाली समिति के लोगों से बातचीत की. इस जानकारी का सामने आना इसलिए भी जरूरी है क्योंकि हिंदी अकादमी का सम्मान अभी भी दिया जाएगा, लेकिन अब यह पुरस्कार पुराने पांच नामों की बजाय नौ नए लोगों को दिए जा रहे हैं.

यहां कुछ वाजिब सवाल खड़े होते हैं. किन परिस्थितियों में पहले कुछ लोगों को पुरस्कार के लिए चुना गया, उन्हें पत्र भेजा गया? किन परिस्थितियों में चुने गए लोगों का पुरस्कार निरस्त किया गया? नए लोगों का नाम किसने तय किया?

इन सवालों के साथ हमने अकादमी की उपाध्यक्ष मैत्रेयी पुष्पा से बातचीत की. उनसे बातचीत में जो बात सामने आई उससे एक नई ही कहानी सामने आई. मैत्रेयी के मुताबिक, 'कुछ नाम मैंने भेजा था. कुछ नाम मंत्रीजी को भेजना था. लेकिन अंतिम लिस्ट में मेरे द्वारा भेजा गया एक भी नाम शामिल नहीं किया गया है.' ये वही नाम हैं जिनको पहले पत्र भेजा गया बाद में उन्हें निरस्त करने की सूचना दी गई.

यह गड़बड़ी कैसे हुई. इस पर मैत्रेयी कहती हैं, 'मैंने जो नाम भेजे थे शायद उसे ही फाइनल मानकर सचिव ने पत्र निर्गत कर दिया होगा.' इस पर कुछ और सवाल पैदा हो गए. मसलन क्या अकादमी की उपाध्यक्ष की जानकारी के बिना ही मंत्रीजी ने पुरस्कार पाने वालों के नाम तय कर लिए?

इस पर पुष्पा कहती हैं, 'इस आयोजन में मेरी कोई भूमिका नहीं है. मंत्रीजी ही जाने किसे पुरस्कार देंगे, किसे नहीं.'

मैत्रेयी कहती हैं, कुछ नाम मैंने भेजा था, लेकिन अंतिम लिस्ट में मेरे द्वारा भेजा गया एक भी नाम शामिल नहीं हुआ

कैच ने जब उनसे यह सवाल भी पूछा कि क्या इस हालत में आप पुरस्कार वितरण कार्यक्रम में अधयक्ष होने के नाते हिस्सा लेंगी, क्योंकि निमंत्रण पत्र पर आपका नाम छपा है, तो उनका जवाब था, 'मैंने अभी इस बारे में कोई फैसला नहीं किया है. मैं कल इस पर निर्णय करूंगी.' सूत्र बताते हैं कि शायद विरोधस्वरूप मैत्रेयी कार्यक्रम में हिस्सा न लें.

अकादमी के एक कर्मचारी ने भी नाम न छापने की शर्त पर कैच को बताया, 'यहां बहुत पॉलिटिक्‍स है. सब कुछ मंत्री (कपिल मिश्रा) के यहां से तय हो रहा है. मैत्रेयीजी ने कई नाम दिए थे, पता नहीं इन लोगों ने क्‍या घपला किया है.'

एक और हैरतनाक बात यह है कि कार्ड 12 सितंबर को ही छपकर आ गया था, उसी दिन जिस दिन 'त्रुटि' वाला पत्र पांचों लेखकों को भेजा गया. यानी कि मैत्रेयी पुष्पा द्वारा भेजे गए नामों को पहले ही दरकिनार कर मंत्रीजी के द्वारा चुने नामों पर सहमति बन गई थी.

अकादमी के इस घालमेल से कई और विवाद शुरू हो गए हैं. अकादमी द्वारा 'सम्‍मान' के नाम पर लेखकों के 'अपमान' के खिलाफ़ फेसबुक पर असंतोष भरे स्‍वर मुखर हो गए हैं.

असंतोष का एक स्वर सम्मानित होने वाले नए नामों को लेकर भी है, जिनका वैचारिक जुड़ाव और साहित्यिक हैसियत को लेकर लोगों में संशय है.

अकादमी की संचालन समिति में वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी, कवि और पत्रकार प्रियदर्शन और पत्रकार भाषा सिंह शामिल हैं. इनका वैचारिक झुकाव दक्षिणपंथ के खिलाफ माना जाता है, जबकि सम्मानित होने वाली सूची में तमाम नाम दक्षिणपंथी झुकाव वाले हैं.

इसे लेकर संचालन समिति से भी लोग सवाल करने लगे हैं. खबर है कि संचालन समिति के सदस्य प्रोफेसर हरीश नवल ने फेसबुक पर संचालन समिति से अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी है. एक अन्य सदस्य पत्रकार भाषा सिंह ने कैच को बताया कि उन्हें तो यह पता भी नहीं है कि वे अकादमी की संचालन समिति में हैं. हालांकि पुरस्कार सूची में शामिल नामों के बारे में कोई जानकारी होने से भाषा इनकार करती हैं.

कवि और वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन जो वायरल बुखार की चपेट में बिस्तर पर हैं, इस पूरे प्रकरण को लेकर ज्यादा मुखर हैं. वो कहते हैं, 'मुझे इस पूरे विवाद के बारे में जानकारी नहीं है. लेकिन जिस तरह से खबर आ रही है कि लेखकों को अपमानित होना पड़ा है वह बेहद शर्मनाक है. मैं जल्द ही इस विषय में उपाध्यक्ष (मैत्रेयी पुष्पा) से बात करूंगा.' ओम थानवी इस संबंघ में बातचीत के लिए उपलब्ध नहीं हो सके.

खबर है कि सम्‍मानित किए जाने वाले नौ व्‍यक्तियों में से एक युवा लेखक राहुल देव (जनसत्‍ता के पूर्व संपादक राहुल देव नहीं) ने सम्‍मान न लेने की सार्वजनिक घोषणा भी अपनी फेसबुक दीवार पर कर दी है.

हिंदी समाज, पुरस्कार और विवाद सनातन सच हैं लेकिन जिस तरह से इस मामले में विवाद उत्पन्न किया गया है वह एक नई गिरावट का संकेत है. राजनीति हमेशा चारण संस्कृति की ही पोषक रही है, लिहाजा इस विवाद में भी मंत्रीजी की बात अकादमी की उपाध्यक्ष पर भारी पड़ी है. अब सबकी निगाहें मैत्रेयी पुष्पा के अगले कदम पर है.

First published: 14 September 2016, 7:38 IST
 
अतुल चौरसिया @beechbazar

एडिटर, कैच हिंदी, इससे पूर्व प्रतिष्ठित पत्रिका तहलका हिंदी के संपादक के तौर पर काम किया

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