Home » कल्चर » 'I could be Hindu too, but I choose Islam instead'
 

‘मैं हिंदू भी हो सकती थी, लेकिन मैंने इस्लाम चुना’

वरीशा सलीम | Updated on: 7 April 2016, 18:34 IST
QUICK PILL
  • इस्लाम की अनुयायी वरीशा सलीम पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं. घर में तीन बिल्लियां सुग्गू, एश्ली और खल्लू पाल रखी हैं. फिटनेस के लिए जिम जाना नहीं भूलतीं और छूटती बस को दौड़कर पकड़ने में उन्हें मज़ा आता है. सोशल मीडिया पर ख़ासी एक्टिव हैं. खुद के वीडियो बनाकर अपने यूट्यूब चैनल एसएचए ट्यूब पर अपलोड करना उन्हें रोमांच से भर देता है. वो चाहती हैं कि इस्लाम से जुड़ी छोटी-मोटी गलतफहमियों को अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से दूर करें.
  • हिजाब या बुर्क़ा इस्लामिक परंपरा के सबसे विवादित मुद्दों में से एक है. दुनिया कभी भी इसपर एकराय नहीं बना सकी. किसी के लिए कैदख़ाना है तो कोई इसे इबादत का आध्यात्मिक तरीक़ा मानता है. वहीं वरीशा सलीम हिजाब पहनने के बाद ख़ुद को आज़ाद महसूस करती हैं. इसके लिए उनके अपने तर्क हैं जो खासे दिलचस्प हैं.

मॉडर्न लोगों की नज़र में मैं एक परंपरावादी लड़की हूं और मज़हबी जमात मुझे मॉडर्न मानती है. सिर्फ पहनावे की वजह से मेरी शख़्सियत फुटबॉल बन गई लेकिन मैं इन दोनों में से कुछ भी नहीं हूं.

मैं कॉन्वेंट स्कूल से पढ़ी एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाली सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूं. मैं बिंदास हूं, प्रियंका चोपड़ा की तरह. मुझे हिजाब में देखकर मुंह ना बनाएं. मैं आपको हाईवोल्टेज का झटका दे दूंगी.

मैं हर दिन दो ग़रीबों को खाना खिलाती हूं, फिर अचानक से सिर्फ एक को खिलाना शुरू कर दूं तो क्या होगा? अच्छी मैं तब भी रहूंगी मगर ज़रा-सी कम. इसी तरह हिजाब पहनना मेरे उन छोटे-छोटे कामों में से एक है जो मुझे मेरे ख़ुदा के क़रीब ले जाता है. ये मेरा फर्ज़ है, साथ ही हक़ भी. इसके अलावा मेरी ज़िंदगी में हिजाब का कोई मतलब नहीं है.

पढ़ेंः जानिए मौत के बाद भी कैसे जिंदा रह सकते हैं आप

मेरी परवरिश ऐसी फैमिली में हुई जहां इस्लाम प्रैक्टिस करने का दबाव नहीं था. घर में मुझे क़ुरआन पढ़ाया गया लेकिन मायने नहीं बताए गए. स्कूल ने मेरी दिलचस्पी ईसाइयत में जगाई और दोस्तों ने कहा कि हिंदू धर्म सबसे उदार है. कुल मिलाकर बचपन में मुझे ढंग से कन्फ्यूज़ किया गया.

पहले मैं हिजाब को लेकर सहज नहीं थी, मज़हबी लोगों को खड़ूस मानती थी और दाढ़ी-टोपी वाले को देखकर दहशत से किसी गली में घुस जाती थी

मैं मुस्लिम हूं या नहीं, स्कूल में मेरे लिए इसकी कोई अहमियत नहीं थी लेकिन कॉलेज पहुंचते-पहुंचते मेरे भीतर कुलबुलाहट होने लगी. मैंने इस्लाम, ईसाइयत और हिंदू मज़हब का मुताअला किया. मेरी ज़िंदगी का यह टर्निंग प्वाइंट था. मैं ईसाई या हिंदू भी हो सकती थी लेकिन आख़िर में मैंने इस्लाम को चुना.

मैंने क़ुरआन और हदीस से जाना कि बेशक़ इंसान कई धर्मों और मान्यताओं में बंटे हुए हैं लेकिन सभी अल्लाह के बंदे हैं. क़ुरआन पढ़ने के बाद मेरी नज़र में दूसरे मज़हबों के लिए इज्ज़त बढ़ गई. मैं हर किसी से टूटकर प्यार करने लगी हूं क्योंकि सभी अल्लाह के बनाए हुए हैं.

पहले मैं हिजाब को लेकर सहज नहीं थी, मज़हबी लोगों को खड़ूस मानती थी और दाढ़ी-टोपी वाले को देखकर दहशत से किसी गली में घुस जाती थी. मगर 2009 में मैं इस जकड़न से बाहर आ गई. मुल्क की आज़ादी के दिन 15 अगस्त 2009 को मैंने हिजाब पहना. मैं हर कन्फ्यूज़न को पीछे छोड़ चुकी थी. पहली बार मैंने ख़ुद को आज़ाद महसूस किया.

पढ़ेंः अकाल मौतों से भरी पड़ी है फिल्मों की चमकीली दुनिया

पैगंबर मुहम्मद स्पिरिचुअल जीनियस थे. उन्होंने हमेशा भीतरी सुंदरता की वक़ालत की. मैं हिजाब इसीलिए पहनती हूं ताकि शरीर की बजाय आध्यात्मिक सुंदरता पर ढंग से ध्यान लगा पाऊं. आप इसे क्या कहेंगे? पिछड़ापन या प्रगतिशील विचार? मैं क्या हूं? ये मेरी सोच और बातचीत से तय होगा या फिर सिर्फ पहनावे की वजह से आप मुझे दकियानूसी मान लेंगे?

घर से लेकर नौकरी तक कई बार मेरे हिजाब को हिकारत की नज़र से देखा गया है. किसी को लगता है कि मैं अपने धर्म के प्रति एक कट्टर लड़की हूं. मुझसे बात करते वक्त बेहद सतर्क रहना चाहिए. मज़े की बात ये है कि ऐसा करने में लड़कियों की तादाद ज़्यादा है. वो हल्के से कॉमेंट पास करती हैं कि मज़हबी लड़की है, इससे दूर रहो.

बाद में लोगों को एहसास हुआ हिजाब पहनी लड़की भी मस्तमौला होती है. रोमांच का कोई मौक़ा छोड़ने के मूड में नहीं रहती. ज़िंदगी के सारे मज़े भी कर रही है, बस तरीक़ा थोड़ा-सा अलग है

नौकरी से जुड़ने पर भी ऐसा ही हुआ. बाद में लोगों को एहसास हुआ हिजाब पहनी लड़की भी मस्तमौला होती है. रोमांच का कोई मौक़ा छोड़ने के मूड में नहीं रहती. ज़िंदगी के सारे मज़े भी कर रही है, बस तरीक़ा थोड़ा-सा अलग है. क्या आप इतना भी अडजस्ट नहीं करना चाहते?

जब कभी मेरे हिजाब पर तंज़ हुआ तो लगा है कि जैसे मेरे मुल्क के आईन पर कंकड़ मारा गया है. मैं एक सेक्यूलर मुल्क़ हिन्दुस्तान की शहरी हूं जो मुझे मेरा मज़हब प्रैक्टिस करने की गारंटी देता है. हिजाब पहनने की आज़ादी मेरा मानवाधिकार है.

पढ़ेंः जानिए क्या हैं दुनिया के 5 सबसे खतरनाक नशे

इस्लाम में पर्दा या शालीन पहनावा फर्ज़ नहीं है. शालीनता की परिभाषा सभी की अलग है. जैसे मेरी कई सहेलियों का ईमान मुझसे मज़बूत है लेकिन हिजाब नहीं लगातीं. क्या कोई दावा कर सकता है कि मेरी सहेलियां मुझसे कम मुसलमान हैं? यक़ीनन कोई मज़हबी ठेकेदार झंडा उठाकर इसका सर्टिफिकेट दे सकते हैं लेकिन सच्चाई सिर्फ मेरी सहेली जानती है या फिर उसका ख़ुदा.

कई लड़कियों ने अपनी आपबीती में ये भी लिखा है कि हिजाब पहनने से उन्हें घुटन हुई. मैं मानती हूं कि बिल्कुल हुई होगी. किसी अच्छी आदत के लिए भी ज़बरदस्ती, बुराई का सबब बन सकती है. रिवायत के नाम पर बचपन से हिजाब थोपने का हश्र यही होता है कि एक वक्त के बाद उससे नफ़रत होने लगती है.

अगर सिर्फ घुटन भरी कहानियां पढ़कर आपने भी हिजाब को क़ैदख़ाना मान लिया है तो एख बार फिर से सोचिए.

कभी मिलिए मुझसे.

(यह लेखक के निजी विचार हैं. बुर्का पहनना या न पहनना निजी मामला है.)

First published: 7 April 2016, 18:34 IST
 
पिछली कहानी
अगली कहानी