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Happy Independence Day 2018 : आजादी के दिवानों के इन गीतों ने हिला दी थी ब्रिटिश सरकार की नींव

सुहेल खान | Updated on: 15 August 2018, 5:43 IST
(File Photo)

आज यानी बुधवार 15 अगस्त 2018 को हम देश का 72वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं. आज हम भले ही ये कहते हों कि हम आजाद भारत में पैदा हुए हैं इसलिए हमारे विचार भी आजादों वाले हैं, लेकिन एक समय था जब हिंदुस्तानियों को हिंदुस्तान में भी बोलने तक का हक नहीं था.

अपने विचारों को दूसरों तक पहुंचा मानों किसी कत्ल करने के बराबर था, ऐसे में आजादी के कई दिवानों ने अपनी बातें, अपने विचार गानों के माध्यम से देशवासियों तक पहुंचाने की कोशिश की, लेकिन अंग्रेज सरकार को ये भी नागवार गुजरी और उन गानों को जब्त कर लिया गया.

 

आजादी के मौके पर आज हम आपको ऐसे ही कुछ गानों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिन्हें आजादी के दिवानों ने लिखा था. इन गानों में वो आग थी जिससे अंग्रेज सरकार की नींव जलने लगी और इन गानों को ब्रिटिश हुकूमत ने जब्त कर लिया. यानी इनके गाने, सुनने और पढ़ने पर रोक लगा दी. ऐसे थे हमारे आजादी के दिवाने जो अपने गानों से ही अंग्रेजों की नार में दम कर दिया करते थे.

वो दिन भी आएगा- गनी

वो दिन भी आएगा जब फिर बहार देखेंगे,
गरीब हिंद को हम ताजदार देखेंगे.

घड़ी वो दूर नहीं, ऐ वतन के शैदाओं !
कि मुल्के हिंद को फिर पुरबहार देखेंगे.

अदू की सख्तियां उल्टा असर दिखाएंगी,
वो गाफिलों को फिर अब होशियार देखेंगे.

बढ़े चलो ऐ जवानों फतह हमारी है,
वतन को जल्द ही बाइख्तियार देखेंगे.

हरीफ सख्तियां कर-करके हार जाएगा,
गली में गांधी के नुसरत का हार देखेंगे.

मिलेगा हिंद को सौराज एक दिन खुर्शीद,
खिजां को देखने वाले बहार देखेंगे.

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देशभगत का प्रलाप- कमल

हमारा हक है हमारी दौलत़ किसी के बाबा का जर नहीं है,
है मुल्क भारत वतन हमारा, किसी की खाला का घर नहीं है.

ये आत्मा तो अजर-अमर है निसार तन-मन स्वदेश पर है
है चीज क्या जेल, गन, मशीनें, कजा का भी हमको डर नहीं है.

न देश का जिनमें प्रेम होवे, दु:खी के दु:ख से जो दिल न रोए,
खुशामदी बन के शान खोए वो खर है हरगिज बशर नहीं है.

हुकूक अपने ही चाहते हैं न कुछ किसी का बिगाड़ते हैं,
तुझे तो ऐ खुदगरज ! किसी की भलाई मद्देनजर नहीं है.

हमारी नस-नस का खून तूने बड़ी सफाई के साथ चूसा,
है कौन-सी तेरी पालिसी वो कि जिसमें घोला जहर नहीं है.

बहाया तूने हैं ख़ूँ उसी का, है तेरी रग-रग में अन्न जिसका,
बता दे बेदर्द तू ही हक से, सितम यह है या कहर नहीं है.

जो बेगुनाहों को सताता, कभी न वो सुख से बैठ पाता,
बड़े-बड़े मिट गए सितमगर, तुझे क्या इसकी खबर नहीं है.
                                     वंदे मातरम्

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 जलियांवाला बाग- सरजू

बेगुनाह पर बमों की बेखतर बौछार की,
दे रहे हैं धमकियां बंदूक और तलवार की.

बागे-जलियां में निहत्थों पर चलाईं गोलियां,
पेट के बल भी रेंगाया, जुल्म की हद पार की.

हम गरीबों पर किए जिसने सितम बेइंतहा,
याद भूलेगी नहीं उस डायरे-बद्कार की.

या तो हम मर ही मिटेंगे या तो ले लेंगे स्वराज,
होती है इस बार हुज्जत खत्म अब हर बार की.

शोर आलम में मचा है लाजपत के नाम का,
ख्वार करना इनको चाहा अपनी मिट्टी ख्वार की.

जिस जगह पर बंद होगा शेरे-नर पंजाब का,
आबरू बढ़ जाएगी उस जेल की दीवार की.

जेल में भेजा हमारे लीडरों को बेकसूर,
लॉर्ड रीडिंग तुमने अच्छी न्याय की भरमार की.

खूने मजलूमों की सूरत अब तो गहरी धार है,
कुछ दिनों में डूबती आबरू अगियार की.

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First published: 15 August 2018, 5:42 IST
 
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