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'पहनने की आजादी नहीं, थोपी हुई सच्चाई है बुर्का'

अर्शिया मलिक | Updated on: 29 April 2016, 12:53 IST
QUICK PILL

  • कश्मीर में विद्रोह के उभार के साथ ही इस्लामी चरमपंथी तंजीमें भी अस्तित्व में आईं. इन तंजीमों ने यह फरमान सुना डाला कि जो महिलाएं जींस पहने पाई गईं या जिनका सिर ढंका नहीं पाया गया, उनके चेहरे पर या तो तेजाब फेंक दिया जाएगा या फिर उन्हें गोली मार दी जाएगी.
  • हिजाब का विरोध करने वाले मुसलमानों को अक्सर यह जवाब सुनने को मिलता है कि हिजाब महिलाओं की निजी पसंद और पहनने की आजादी का मामला है. लेकिन सच्चाई यह है कि इसमें निजी पसंद जैसा कुछ भी नहीं है.

इस्लाम में बुर्के के विचार को लेकर काफी बहस हो रही है. भारत के मुस्लिम बहुल सूबे कश्मीर स्थित मेरे शहर श्रीनगर में महिलाओं के पर्दे को लेकर हमेशा से ही संकीर्ण नजरिया अपनाया जाता रहा है, लेकिन 1990 में कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित इस्लामी चरमपंथ के उभार के बाद यहां स्थिति और अधिक भयानक हो गईं.

1990 के पहले महिलाओं के तन ढंकने को लेकर लोगों का रुख कमोबेश वैसा ही था जैसा कि हिंदू समाज के भीतर है. मसलन जवान होने के बाद लड़कियों के पहनावे पर कुछ किस्म की पाबंदी. 

मुझे याद है जब मुझे जींस और स्कर्ट पहनने से मना करते हुए सलवार कमीज के साथ दुपट्टा ओढ़ने की सलाह दी गई थी जो दक्षिण एशियाई महिलाओं का पारंपरिक पहनावा है. दुपट्टा या चुन्नी की मदद से न केवल शरीर के ऊपरी हिस्से को छिपाने में मदद मिलती है बल्कि बड़ों से मिलने या धार्मिक स्थल पर जाने के दौरान सिर ढंकने में भी सहूलियत होती है.

तंजीमों के हमले के फरमान के बाद डरकर मुस्लिम महिलाओं ने हिजाब पहनना शुरू कर दिया

धार्मिक स्थलों पर जाने और कुरान पढ़ने को छोड़कर महिलाओं के लिए किसी निश्चित ड्रेस कोड के बारे में कोई सख्त दिशानिर्देश नहीं थे. कहा जाता है कि यौन आकर्षण से बचने के लिए इस तरह के कपड़ों की जरूरत होती है क्योंकि जब इन्हें पहनने के लिए कहा जाता है तो उसका मतलब साफ तौर जवान हो रही लड़कियां होती हैं.

हालांकि इस तर्क को देते समय लोग इस तरफ ध्यान नहीं देते कि कश्मीर में इस्लामी चरमपंथ की वजह से क्या-क्या बदलाव हुए.

कश्मीर में इस्लामी चरमपंथ के साथ ही आतंकी गुरिल्ला संगठन यानी तंजीमें अस्तित्व में आईं. इन तंजीमों ने यह फरमान सुना डाला कि जो महिलाएं जींस पहनी पाई गईं या जिनका सिर ढंका नहीं पाया गया, उनके चेहरे पर या तो तेजाब फेंक दिया जाएगा या फिर उन्हें गोली मार दी जाएगी.

हिंदू लड़कियों और महिलाओं को कहा गया कि वह बिंदी लगाएं ताकि वह मुस्लिम महिलाओं और लड़कियों से अलग दिख सकें.

मुझे याद है कि पहले इन फरमानों का मजाक उड़ाया गया लेकिन बाद में जींस पहनी महिलाओं के पैरों और घुटनों में गोली मारे जाने की घटनाएं सामने आने लगीं. हर तरफ भय की स्थिति बन गई. मां, चाची और दादियां काले कपड़ों की खरीदारी के लिए निकल पड़ी और टेलरों के पास अचानक बुर्के सिलाने के अंधाधुंध ऑर्डर आने लगे. ताकि इस्लाम के पहरेदारों की तरफ से जारी फरमान को तामील किया जा सके.

घर में पड़े पुराने बुर्के अचानक से बाहर निकल आए. हम पहले हंसा करते थे कि कैसे हमारी दादियां बुर्के में लगी एक छोटी जाली की मदद से बाहर का काम करती और कैसे वह इसके भीतर सांस भी ले पातीं. लेकिन जैसी ही हमारी दादी कहतीं कि यह एक अभिशाप है, सारा माहौल गंभीर हो जाता था.

Women in Burqa EMBED 6

उनका कहना था कि उन्होंने बुर्के को पहनना इसलिए छोड़ा क्योंकि इसे पिछड़ेपन की निशानी समझा जाने लगा था और यह ख्याल भी पुराना पड़ने लगा था कि अपना चेहरा किसी और को नहीं दिखाना. मेरी दादी बताया करती थीं कि वह केवल मस्जिद जाते वक्त ही बुरका पहना करती थी क्योंकि यह परंपरा का हिस्सा है. दादी शुक्रवार को खुतबा सुनने के लिए मस्जिद जाया करतीं.

हमारी मां, चाची और दादियां तंजीमों और उनके फरमान को लेकर बेहद चिंतित रहती. उनका कहना था कि भटके हुए युवा न जाने किस तरह का इस्लाम ला रहे हैं.

मेरी मां की पीढ़ी की महिलाओं के सामने दूसरी तरह की समस्याएं भी थीं. उनकी विद्रोही बेटियां जिन्होंने बुर्का पहनने से मना कर दिया था. मेरी मां को भी अक्सर यह चिंता रहती थी कि इस्लामी फरमान को नहीं मानने पर पता नहीं क्या हो जाए.

जल्द ही आतंकियों ने भारतीय सेना के जवानों से संघर्ष शुरू कर दिया और फिर शहर की गलियां पूरी तरह से असुरक्षित हो गईं. कर्फ्यू नियमित दिनचर्या का हिस्सा हो गया. पूरी आबादी एक तरह से घरों में रहने को मजबूर हो गई. आतंकियों और ईर्ष्यालु लंपटों की वजह से बाहर निकलने के दौरान बुर्का पहनना अनिवार्य हो गया.

देखते देखते शहर का पहनावा बदल गया. हालांकि संघर्ष के बावजूद रचनात्मकता पर विराम नहीं लगा और महिलाओं ने डिजाइनिंग को लेकर अपने प्रयोग जारी रखे. बड़े घरों की महिलाएं खाड़ी मुल्कों में जाती रहीं और फिर केबल टीवी के आगमन ने फैशन और मनोरंजन से बदलाव को हवा दी. संभ्रांत घरों की महिलाओं ने बुटीक और ब्यूटी पार्लर बनाया लेकिन वह ऐसी जगह पर था जहां लोगों की कम ही नजर पड़ती.

हिजाब को पहनने की आजादी का प्रतीक बताना सीधे-सीधे कठमुल्लापन को बढ़ावा देना है

पैरों में गोली मारे जाने के डर से महिलाओं ने शहर के पहनावे को बदल दिया. महिलाओं ने डिजाइन की हुई हिजाब और बुर्कों को पहनना शुरू कर दिया. हमने कई तरीकों से हिजाब को पहनना शुरू किया जिसमें रंग बिरंगे पिन लगाए जाते. हम लड़कियां अक्सर बातचीत में गलत जगहों पर पिन के चुभने को लेकर हंसी-मजाक किया करते थे.

लेकिन इसके बाद बुर्के के साथ छुद्रता भी जुड़ गई. बुर्का नहीं पहनने वाली महिलाओं के लिए स्थितियां बिगड़ने लगीं. ऐसी महिलाओं को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने की शुरुआत हो गई.

मैं हर दिन नौकरी पर जाने के लिए पैदल बस स्टॉप जाया करती. एक दिन हमारे पड़ोस के एक आदमी ने चिल्लाते हुए धमकी भरे अंदाज में कहा कि मैंने पूश (कश्मीरी में बुर्का) क्यों नहीं पहन रखा है.

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एक ही झटके में मेरे अंदर सालों से दबा गुस्सा, खेलने नहीं जाने की विवशता, नैतिकता के ठेकेदारों से उपजी परेशानी बाहर आ गई और मैंने पूरी ताकत से हाथ घुमाकर उस आदमी को थप्पड़ दे मारा. पूरी गली, दुकान पर खड़ा मिस्री और आने जाने वाले लोग सन्न रह गए. अचानक से सब कुछ शांत हो गया. फिर मैंने उस आदमी को भागते हुए देखा. दशकों बाद भी जब वह आदमी मुझे देखता है, वैसे ही भाग खड़ा होता है.

इसी वक्त मैंने स्टॉकहोम सिंड्रोम, व्हाइट गिल्ट आदि के बारे में पढ़ना शुरू किया. मुझे इस बात का एहसास हुआ कि जो महिलाएं बुर्के की ज्यादा वकालत करती हैं, दरअसल वह ऐसी महिलाएं हैं जिन्हें कट्टर इस्लामी पुरुषों से किसी न किसी तरह का फायदा मिल रहा होता है. 

मसला हिजाब पहनने की आजादी का नहीं बल्कि मुस्लिम समाज में महिलाओं की स्थिति का है

हिजाब का विरोध करने वाले मुसलमानों को अक्सर यह जवाब सुनने को मिलता है कि हिजाब महिलाओं की निजी पसंद और पहनने की आजादी का मामला है. लेकिन सच्चाई यह है कि इसमें निजी पसंद जैसा कुछ भी नहीं है. बल्कि यह इस्लामी समाज में हिजाब पहनने वाली महिलाओं द्वारा अपनी भूमिका, जिम्मेदारी, ताकत और सीमाओं को बचाए रखने का मामला है.

इसलिए करोड़ों महिलाएं जिन्हें हिजाब पहनने के लिए मजबूर किया जाता है, उसके लिए सिर्फ पुरुष ही जिम्मेदार नहीं हैं बल्कि इसमें उन महिलाओं की भी भूमिका है जो पुरुषों के साथ मिलकर "पहनने की आजादी" के नाम पर हिजाब को बाकी महिलाओं के ऊपर थोपने में सहायता करती हैं.

जहां तक मेरे निजी अनुभव की बात है तो मैं यह कह सकती हूं कि हिजाब मुस्लिम समाज में दमन का तरीका है. कई हिजाब पहनने वाली महिलाएं पश्चिमी दुनिया की नारीवादियों की मदद से "पहनने की आजादी" के नाम पर हिजाब का बचाव करती हैं. 

जहां तक मेरे अनुभव की बात है तो मैं यह कह सकती हूं कि हिजाब मुस्लिम समाज में दमन का तरीका है

सतही तौर पर तो यह देखने में ठीक लग सकता है लेकिन यह तर्क ही उल्टा है. ऐसे लोगों को असल में मुसलिम महिलाओं को उनकी पसंद के मुताबिक कपड़े पहनने की आजादी का समर्थन करना चाहिए. लेकिन वे ऐसा नहीं करेंगे. 

बुर्के का समर्थन करने वाली जो महिलाएं हैं वो दरअसल पुरुषों के समर्थन से ताकतवर स्थिति में पहुंची हैं, वही पुरुष जो हिजाब के नाम पर लगातार महिलाओं का शोषण करते आए हैं.

आज सवाल महिलाओं को हिजाब पहनने की आजादी का है ही नहीं, आज सवाल है एक मुस्लिम महिला की उस मुस्लिम समाज में स्थिति क्या है, जिसके कायदे-कानून इमाम और मुल्लाओं ने बनाए हैं. यह अधिकार हर मुस्लिम महिला को मिलना चाहिए.

लिहाजा यह कहने की कोशिश करना कि हिजाब असल में 'पहनने की आजादी' का प्रतीक है दरअसल कठमुल्लापन को बढ़ावा देना और उन महिलाओं के अधिकारों और आजादी का हनन करना है जो कि बुर्का या हिजाब को खारिज करती है और उसे शोषण का साधन मानती हैं.

पर्दे को लेकर यह तर्क देना कि "मुझे अपनी पसंद का पहनावा धारण करने की आजादी है" असल में महिलाओं के खिलाफ मुस्लिम समाज के अंदरूनी ढांचे में कठमुल्लों द्वारा तय की गई और गहरे तक घुसी हुई पितृसत्ता की निशानी है. और जो महिलाएं इसे खारिज करती हैं उन्हें ये "आदर्श इस्लामी मान्यता" का दुश्मन घोषित कर देते हैं.

मुस्लिम दुनिया में वहाबी-सलाफी विचारधारा के विस्तार के साथ ही हिजाब भी जबर्दस्ती थोपा जाने लगा

हिजाब, नक़ाब या बुर्का के प्रति कोई राय बनाने से पहले लोगों को बेहद खुले मन से और व्यक्तिगत दुराग्रहों से ऊपर उठकर सोचने की दरकार होगी. इसे नहीं पसंद करने वालों के लिए यह शोषण का प्रतीक है. 90 के दशक में जब तालिबान सार्वजनिक सजाओं और बुर्के में लिपटी महिलाओं पर कोड़े बरसाने के कारण हमारे घरों में बहस का हिस्सा बनने लगा था, तब इसको लेकर किसी तरह की कोई शंका शेष नहीं बची थी. मुस्लिम दुनिया में वहाबी-सलाफी विचारधारा के विस्तार के साथ ही हिजाब भी जबर्दस्ती थोपा जाने लगा था, तीन साल की छोटी बच्चियों पर भी. 

लिहाजा मेरे लिए यह स्वीकार कर पाना बहुत मुश्किल है कि आजाद और प्रगतिशील देशों की महिलाएं शोषण के एक प्रतीक (बुर्के) को अपनी एकजुटता प्रदर्शित करने के लिए इस्तेमाल करें. मैं इसे पश्चिमी उदारवादियों का अधकचरापन, दकियानूस वामपंथ द्वारा किया जा रहा तुष्टिकरण और मुस्लिम समाज की स्त्रीविरोधी और पितृसत्तात्मक मानसिकता ही कहूंगी.

मैं अभी भी इस बात को समझ नहीं पा रही हूं कि पश्चिम के लोकतांत्रिक समाज को रूढ़िवादी, कट्टर मुस्लिमों के तुष्टिकरण की क्या जरूरत आन पड़ी है.

  • यह लेख मूलरूप अंग्रेजी में पाकिस्तान के प्रतिष्ठित मीडिया समूह द नेशन में छप चुका है.
  • आर्शिया मलिक श्रीनगर की रहने वाली हैं. मलिक महिलाओं, कश्मीर जैसे विषयों पर लिखती है.

(विचार लेखक के निजी हैं. इनसे संस्थान का सहमत होना आवश्यक नहीं है)

First published: 29 April 2016, 12:53 IST
 
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