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ये नसीरुद्दीन शाह का कालजयी होने का अहंकार है

रंगनाथ सिंह | Updated on: 29 July 2016, 14:08 IST

नसीरुद्दीन शाह का राजेश खन्ना पर दिया गया बयान एक अभिनेता का दूसरे अभिनेता पर किया गया कटाक्ष मात्र नहीं है. ये एक ऐसी ग्रंथि है, जिसे कालजयी होने की ग्रंथि कहा जा सकता है और जो तथाकथित 'गंभीर कला कर्म' से जुड़े कई लोगों में पायी जाती है.

अमरता का बोध कला या बौद्धिक दुनिया से जुड़े लोगों में एक स्थायी भाव की तरह मौजूद रहता है. हर कलाकार-लेखक-बुद्धिजीवी में उथले-गहरे ये इच्छा दबी होती है कि इस नश्वर संसार से जाने के बाद भी उसकी कला के जरिए उसे याद किया जाएगा. वह कालजयी होगा. शायद यही वजह है कि लोकप्रिय विमर्शों में किसी कला या कलाकार के मूल्यांकन के लिए 'कालजयिता' एक जरूरी मानक बन जाती है. लेकिन कुछ लोगों में यह एक ग्रंथि बन जाती है.

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कला का कोई भी रूप हो, जिस समय वो घटित हो रहा होता है उसके समानांतर ही आलोचक-समीक्षक-कलाकार ये आंकते रहते हैं कि आजकल जो रचा जा रहा है उसमें से किन चीजों को आने वाले वक्त में याद किया जाएगा? 

सिनेमा भी एक कला है और इसमें भी कालजयिता का वही स्थान है जो किसी दूसरी कला में होता है. सिनेमा या उससे जुड़े अवयवों (निर्देशक, अभिनेता, गायक, संगीतकार इत्यादि) की उत्कृष्टता को स्थापित करने के लिए भी अक्सर कहा जाता है कि फलां फिल्म को आने वाली पीढ़ियां सराहेंगी या भूल जाएंगी.

लेकिन ये याद करना या भूलना रोजमर्रा के याद करने, भूलने जैसा नहीं है. इस कथित भावी कालजयिता का प्रयोग अपनी कला को श्रेष्ठ और दूसरों की कला को हीन दिखाने के लिए किया जाता है. 

लोकप्रिय यानी भुला दिए जाएंगे

'भूला दिए जाने' की धमकी आम तौर पर उन कलाकारों को दी जाती है जो जीते जी लोकप्रिय होते हैं. ये धमकी आम तौर पर भद्र वर्ग के अभिरुचियों को तुष्ट करने वालों कलाकारों की तरफ से उन कलाकारों को दी जाती है जो अवाम की पसंद होते हैं. 

ऐसी धमकी देने वाले कभी ये स्वीकार नहीं कर पाते कि गरीब, मध्यम वर्गीय और अमीर वर्ग के अपने-अपने पापुलर कलाकार होते हैं, जो अपने वर्ग में लोकप्रिय होते हैं.

लेखकीय दुनिया में भद्रलोक और अवाम के बीच लोकप्रिय लेखकों पर विचार करते हुए हिंदी कवि शमशेर बहादुर सिंह ने लेखकों को तीन वर्ग में बांटा था. एक, वो लेखक जो भद्रलोक (क्लास) को पसंद आते हैं, दूसरे वो लेखक जो अवाम (मास) को पसंद होते हैं और तीसरे वो लेखक जो भद्रलोक और अवाम दोनों को पसंद आते हैं, जैसे शेक्सपियर और तुलसीदास. यानी वर्गीय पसंद-नापसंद के दायरों को तोड़ना कुछ ही कलाकारों के लिए संभव हो पाता है. लेखकों की ही तरह फिल्मों को भी बहुत आसानी से इन तीन वर्गों में बांटा जा सकता है. लेकिन तीसरे तरह के लेखक/फिल्में भी आने वाले वक्त में याद किए जाएंगे या नहीं, इसकी गारंटी शायद ही कोई दे सके. 

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नसीर ने जिस तरह राजेश खन्ना को सर्टिफिकेट देते हुए 'पुअर एक्टर' (खराब अभिनेता) कहा और उन्हें 'बौद्धिकता' को कठघरे में खड़ा किया उसके पीछे नसीर के मन में दबा हुआ 'कालजयी' होने का अंहकार ही है. सिर्फ राजेश ही नहीं, नसीर के 'कालजयी भाव' का शिकार अमिताभ बच्चन भी हो चुके हैं. 

इतना ही नहीं, नसीर खुद की भी ज्यादातर फिल्मों को खारिज कर चुके हैं. अपने एक इंटरव्यू में वो कहते हैं, "मेरी 250 फिल्मों में से कम से कम 50 मैंने मुफ्त में की होंगी. और मुझे उम्मीद है कि उन्हीं 50 फिल्मों में से कम से कम 5 याद की जाएंगी."

हिन्दी सिनेमा में कौन सी फिल्में या अभिनेता सौ-दौ सौ साल बाद याद किए जाएंगे ये किसी को नहीं पता. लेकिन नसीर जैसे अभिनेताओं को लगता है कि जिन्हें 'याद किया जाएगा' वो ख़ुशनसीब वही होंगे.

मांग और आपूर्ति

राजेश खन्ना या अमिताभ बच्चन पर विषवमन करते समय नसीर भूल जाते हैं कि लोकप्रियता का किसी की प्रतिभा से समानुपाती या व्युतक्रमानुपाती संबंध नहीं होता. राजेश या अमिताभ इसलिए सुपरस्टार नहीं बने कि उन्हें अभिनय नहीं आता था, बल्कि वो इसलिए सुपरस्टार बने क्योंकि वो एक बड़े वर्ग की रुचियों को तुष्ट करते थे.

ये महज संयोग है कि सत्तर के दशक में ही हिन्दी सिनेमा में नसीर-ओमपुरी, राजेश खन्ना-अमिताभ बच्चन और मिथुन चक्रवर्ती उदित हुए. जो आगे चलकर कमोबेश उच्च वर्ग, मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग के प्रिय बने. 

नसीर को शायद नहीं पता कि कला भी कहीं न कहीं मांग और आपूर्ति के सिद्धांत से ही चलती है. जिसमें कालजयी होने का बोध बहुधा ओढ़ लिया जाता है. उसके पीछे कोई ठोस तार्किक आधार नहीं होता.

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भ्रामक उच्च वर्गीय कलाबोध के चलते ही नसीर जैसे लोगों को लगता है कि हिन्दी सिनेमा किसी एक या दो हीरो की वजह से गर्त में चला गया या हिन्दी सिनेमा राजेश खन्ना की पसंद में ढलने के कारण मीडियॉकर होकर रह गया.

ऐसे लोग ये नहीं समझ पाते कि राजेश खन्ना या अमिताभ बच्चन अपने सामाजिक परिवेश की मांग और आपूर्ति की चक्की के उत्पाद भर होते हैं. उनकी स्वीकार्यता से उनकी अभिनय क्षमता का कोई सीधा संबंध नहीं होता. सरल शब्दों में कहा जाए तो किसी भी दौर की किसी भी तरह की लोकप्रिय कला अपने समाज की मांग से उपजती है, न कि किसी एक या दो व्यक्तियों की निजी क्षमता या पसंद-नापसंद से. 

स्टार कौन बनाता है?

क्या ये महज संयोग है कि नसीर, राजेश, अमिताभ, मिथुन सबने अपना करियर गंभीर मानी जाने वाली फिल्मों से किया. नसीर ही की तरह राजेश और अमिताभ रंगमंच से सिनेमा में आए थे. अगर नसीर श्याम बेनेगल की फिल्म 'निशांत' से फिल्मों में आए तो राजेश चेतन आनंद की 'आखिरी खत', अमिताभ ख़्वाजा अहमद अब्बास की  'सात हिंदुस्तानी' और मिथुन मृणाल सेन की 'मृगया' से. इन सभी अभिनेताओं की शुरुआती फिल्मों और निर्देशकों को देखकर शायद ही कोई उस तरह का बयान दे, जैसा नसीर ने दिया है.

मशहूर थिएटर डायरेक्टर सत्यदेव दुबे ने धर्मवीर भारत के काव्य नाटक अंधायुग का मंचन किया तो उसमें अंधे सिपाही की भूमिका युवा कलाकार जतिन खन्ना ने निभायी थी. उस समय किसी को पता नहीं था कि जतिन खन्ना भविष्य में लगातार 15 हिट फिल्में देकर हिन्दी फिल्मों के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना बन जाएंगे. इन्हीं सत्यदेव दुबे के संग नसीर ने भी थिएटर किया और अमरीश पुरी ने भी. लेकिन तीनों का सिनेमाई सफर एक दूसरे से जुदा रहा.

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फिल्मों में आने से पहले राजेश खन्ना ने सागर सरहदी के लिखे नाटकों 'और शाम गुजर गई', 'मेरे देश के गांव' और 'दिये बुझ गये' जैसे नाटकों में भी काम किया था. ये वही सागर सरहदी हैं जिन्होंने कभी-कभी, सिलसिला और चांदनी जैसी लोकप्रिय फिल्में लिखी थीं और जिनकी मशहूर फिल्म 'बाज़ार' में नसीर ने अभिनय किया था.

नसीर अच्छे अभिनेता हैं लेकिन शायद उनमें वो उदात्तता नहीं है जिसकी किसी संवेदनशील कलाकार से उम्मीद की जाती है. शायद इसीलिए वो उस राजेश खन्ना को नहीं देख पाए जिसे जीते जी चेतन आनंद, नासिर हुसैन, असित सेन, हृषिकेष मुखर्जी, बासु भट्टाचार्य जैसे निर्देशक देख पाए या जिस राजेश खन्ना को मरने के बाद मृणाल सेन, बुद्धदेब दासगुप्ता और रितुपर्णो घोष जैसे निर्देशक देख पाए. इन सभी निर्देशकों को राजेश खन्ना के अभिनय क्षमता पर कोई शक़ नहीं था.

किसकी, कितनी और कौन सी फिल्में याद की जाएंगी, या फिल्में याद भी की जाएंगी, पता नहीं लेकिन राजेश खन्ना ने भी अभिनय का ककहरा उसी रंगमंच से सीखा था, जहां से दुनिया के कई महान अभिनेताओं ने सीखा. अपने प्रशंसकों के लिए छोड़े आखिरी ऑडियो संदेश में राजेश खन्ना कहते हैं, "मेरा जन्म थिएटर से हुआ, मैं आज जो कुछ भी हूं ये स्टेज, ये थिएटर की वजह से हूं."

इसमें भी मुझे कोई संदेह नहीं कि राजेश खन्ना सुपरस्टार बनने से पहले एक एक्टर थे. अपने आखिरी संदेश में राजेश कहते हैं, "आपने मुझे एक्टर से स्टार बनाया, स्टार से सुपरस्टार बनाया."

लेकिन थिएटर से निकला राजेश खन्ना सुपरस्टार कैसे बना? अपने आखिरी संदेश में अपने प्रशंसकों से वो कहते हैं, "आपने मुझे एक्टर से स्टार बनाया, स्टार से सुपरस्टार बनाया." काश कि नसीर भी इसे समझ पाते.

First published: 29 July 2016, 14:08 IST
 
रंगनाथ सिंह @singhrangnath

पेशा लिखना, शौक़ पढ़ना, ख़्वाब सिनेमा, सुख-संपत्ति यार-दोस्त.

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