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साहित्यिक मेले में संघ को निमंत्रण साहित्य की धार कुंद करने के लिए

राजेश जोशी | Updated on: 6 January 2017, 7:44 IST
(कैच न्यूज़)

जयपुर के लिटरेरी फ़ेस्ट के बाद से इस तरह के अंग्रेजी नाम के साहित्य उत्सवों की एक बाढ़ सी आती दिख रही है. अचानक साहित्य के प्रति आया यह परिवर्तन चौंकाता भी है और अनेक सवालों को जन्म देता है.

साहित्य के लिये तो यह माना जाता था कि वह समाज के हाशिये पर चला गया है. साहित्य के कार्यक्रमों के लिये सबसे कम बजट सरकारों के पास था. धनी घराने हों या अन्य संस्थाएं हों, उनके पास भी साहित्य के लिये न तो कोई आर्थिक मदद थी न किसी अन्य तरह का उत्साह था.

अचानक इतने बड़े बड़े साहित्य उत्सवों के लिये ये धन कहां से आ रहा है? क्यों कई राज्य सरकारें भी अचानक इस तरह के उत्सवों में मदद करने को आतुर दिख रही हैं. अचानक भारत के कारपोरेट घराने साहित्य के प्रति इतने अनुरागी क्यों हो गये है? क्या कारपोरेट घरानों को और नये बाज़ार को साहित्य भी अब फायदे की एक बिकाऊ जिन्स लगने लगा है?

साहित्यिक मेलों में इस तरह की बढ़ती प्रवृत्ति एक गंभीर चुनौती है. इस चिंता पर हमेशा नज़र बनाए रखना ज़रूरी है लेकिन इस बार जयपुर लिट फेस्ट में एक अलग कारनामा देखने को मिल रहा है. 

संघ को निमंत्रण

इस साल जयपुर लिटरेरी फ़ेस्टिवल में दक्षिणपंथी लेखकों को बड़ी संख्या में बुलाया गया है. बात यहीं तक होती कि दक्षिणपंथी सरकार है तो वह अपनी विचारधारा के रचनाकारों को ज्यादा तरजीह देगी, लेकिन इस बार तो उसने साहित्य से बाहर सीधे सीधे संघ से जुड़े राजनीतिक व्यक्तियों को भी इस फ़ेस्टिवल में प्रवेश करवा लिया है. दत्तात्रेय होशबाले और मनमोहन वैद्य जैसे शुद्ध राजनीतिक चेहरे भी इसमें शामिल नज़र आयेंगे.

वस्तुतः ये सारे साहित्य उत्सव साहित्य में प्रतिरोध की धार का भोथरा करने का एक घिनौना षडयन्त्र हैं. प्रतिरोध के साहित्य के विरूद्ध ये उत्सव साहित्य से उसके सारे गंभीर सवालों और उन पर होने वाली बहसों को समाप्त करके उसे सिर्फ एक घटिया मनोरंजन की चीज़ बना देना चाहते हैं.

दक्षिणपंथी राजनीतिक शक्तियों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि उसके पास गंभीर साहित्य और साहित्यकार लगभग नहीं हैं. सच तो यह है कि इस देश की बौद्धिक सत्ता हमेशा से ही वाम और लोकतान्त्रिक रचनाकारों और बुद्धिजीवियों के पास रही है और आज भी है.

अंग्रेज़ी साहित्य उत्सव

जयपुर का लिट फ़ेस्ट वस्तुतः अंग्रेजी साहित्य का उत्सव था और उसका चरित्र वस्तुतः उसी तरह का चौंकाऊ था. वह हर बार कोई न कोई विवाद खड़ा करके उसकी मार्केटिंग करता रहा है. फिर चाहे सलमान रश्दी का मसला हो या कोई और मसला.

इस फ़ेस्टिवल में भारतीय भाषाओं के लिए भी एक हाशिया मौजूद रहा है. हिन्दी के भी कुछ लेखक वहां आते-जाते रहे हैं.

इस तरह के लिटरेरी फ़ेस्ट में एक साथ पापुलिस्ट पल्प राइटर, पापुलर राइटर, महत्वपूर्ण साहित्यकार और सेलीब्रिटी माने जाने वाले फिल्मी लेखक सब एक जगह रख दिये गये हैं.

किसी भी बड़े साहित्यिकार से ज्यादा यहां एक पाठक के लिए एक फिल्मी गीतकार महत्वपूर्ण हो गया है

ऐसी स्थिाति ने सामान्य पाठक की साहित्य की समझ को पूरी तरह गड़बड़ा दिया है. वह एक गंभीर लेखक और पल्प राइटर में फ़र्क नहीं कर पा रहा है. उसके लिये विक्रम सेठ से ज्यादा आकर्षण चेतन भगत में है.

किसी भी बड़े साहित्यिकार से ज्यादा उसके लिये एक फिल्मी गीतकार महत्वपूर्ण है. जावेद अख्त़र या गुलज़ार उसके लिये किसी भी बड़े शायर से ज्यादा आकर्षण का केन्द्र होंगे. गुलज़ार भी उसके लिये फिल्म वाले गुलज़ार ही होंगे उससे अलग गुलज़ार नहीं.

कुछ अन्य प्रदेशों में आयोजित किये जाने वाले साहित्योत्सवों में तो वहां की सरकारें सीधे सहयोग और हस्तक्षेप करने लगी हैं. भोपाल में एक मित्र ने बताया कि उन्होंने भोपाल लिटरेरी फ़ेस्टिवल करने के लिये सरकार से अनुदान मांगा था. सरकार के प्रतिनिधि ने पहले उनसे उन लेखकों की सूचि मांगी जिन्हें वे बुलाना चाहते थे. फिर उनसे कहा कि इस सूचि में जो वामपंथी लेखक हैं उनके नाम निकाल दें.

दरअसल, दक्षिणपंथी राजनीतिक शक्तियों और इस देश के बड़े कारपोरेट घरानों की सबसे बड़ी समस्या यही है कि इस बौद्धिक सत्ता को कैसे नष्ट कर दिया जाये और वाम और लोकतान्त्रिक बुद्धिजीवियों को कैसे गैर महत्वपूर्ण बना दिया जाये.

वस्तुतः जयपुर समेत सारे लिटरेरी फ़ेस्टिवल्स कारपोरेट घरानों और नये बाज़ार के साहित्य को बाज़ारू बना दिये जाने का एक षडयन्त्र है. दबे पांव अब इसमें संघ भी प्रवेश कर रहा है.

First published: 6 January 2017, 7:44 IST
 
राजेश जोशी @catchhindi

लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं

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