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जानिए भारतीय चित्रकार जैमिनी रॉय को जिन्हें गूगल ने भी किया सलाम

कैच ब्यूरो | Updated on: 11 April 2017, 10:45 IST

महान चित्रकार जैमिनी रॉय को गूगल ने उनकी 130वीं जयंती पर डूडल के जरिए श्रद्धांजलि दी है. जैमिनी रॉय भारतीय कला के बंगाल स्कूल के बड़े चित्रकारों में से एक थे. उनका जन्म पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले के बेलियातोर में 11 अप्रैल 1887 को हुआ था.

20वीं शताब्‍दी शुरुआती दौर में ब्रिटिश शैली में प्रशिक्षित जैमिनी राय ने तकरीबन 60 साल तक भारत सहित दुनिया भर में हुए बदलाव को अपनी कला के जरिए दर्शाया. 1955 में उन्हें भारत सरकार ने पद्म भूषण अवॉर्ड से सम्मानित किया था. 

कोलकाता में सीखी कला की बारीकियां

कोलकाता (तब के कलकत्ता) के गवर्नमेंट स्कूल ऑफ आर्ट में उन्होंने कला की बारीकियां सीखीं. कला के बंगाल स्कूल के संस्थापक अवनींद्र नाथ टैगौर उनके गुरु थे. स्कूल के वे वाइस-प्रिंसिपल भी थे.

रॉय को पश्चिमी कला की क्लासिक परंपरा की ट्रेनिंग मिली थी. इसके बावजूद जल्द ही उन्होंने लोक और आदिवासी कला को भी अपनी कूंची के जरिए उकेरा. माना जाता है कि रॉय की कला पर सबसे ज्यादा प्रभाव कालीघाट पाट स्टाइल का पड़ा था. इसमें मोटे ब्रश स्ट्रोक का इस्तेमाल होता है.

रामायण पर बनाए 17 कैनवास 

रॉय ने कैनवास और ऑयल पेंट के बजाए लोक कलाकारों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री को अपनी कला में शामिल किया. जैमिनी रॉय ने रामायण और श्री कृष्ण लीला से जुड़े चित्रों के साथ ही आम जीवन के नर-नारियों तक की पेंटिंग भी बनाई. रॉय ने अपने चित्रों में सात प्राकृतिक रंगों का ज्यादातर इस्तेमाल किया.

1920 के बाद के दौर में रॉय ने ग्रामीण अंचल और लोगों की खुशियों को जाहिर करने वाली पेंटिंग पर जोर दिया. इसमें उनके बचपन के लालन-पालन और स्‍वच्‍छंद जीवन की भी झलक थी. 1926 में जैमिनी रॉय की कालीघाट प्रभावित चित्रों की पहली प्रदर्शनी की सार्वजनिक प्रशंसा हुई. 1935 में उन्हें उनके 'मदर हेल्पिंग द चाइल्ड टु क्रॉस ए पूल' चित्र के लिए वाइसरॉय का गोल्ड मेडल दिया गया.

1940 के दशक में उन्होंने लंदन और न्यूयॉर्क में भी अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगायी. 1946 में रामायण पर बनाए उनके 17 कैनवास उनकी कला का सर्वोच्च शिखर समझे जाते हैं. 

रामायण की उनकी पेंटिंग काफी चर्चित रही. 1940 के दशक में जैमिनी रॉय ने लंदन और न्यूयॉर्क में भी अपने चित्रों की प्रदर्शनी लगाई.

पेंटिंग पर ग्रामीण संस्कृति का असर

वे स्‍वयं ग्रामीण संस्‍कृति से जुड़े थे, जिनमें उनका बचपन बीता था और ग्रामीणों की तरह दुनिया का दृश्‍य उनके लिए जटिल नहीं था तथा परंपराओं में उनका भरोसा था. जैमिनी रॉय की चित्रकारी में आधुनिकतावाद का एक पहलू यह था कि उन्‍होंने अपने चित्रों में चमकदार रंगों का प्रमुखता से प्रयोग किया और स्‍वाभाविक रंगों से परहेज किया.

इस महान चित्रकार का निधन 24 अप्रैल, 1972 को कोलकाता में हुआ. ये दिलचस्‍प बात है कि 1930 के दशक तक अपनी लोक शैली की चित्र कलाकृतियों के साथ-साथ जैमिनी रॉय पोर्ट्रेट भी बनाते रहे थे, जिसमें उनके ब्रश का प्रभावी ढंग से इस्‍तेमाल नजर आता था.

1946 में रामायण पर बनाए उनके 17 कैनवास उनकी कला का सर्वोच्च शिखर समझे जाते हैं.

आश्‍चर्य की बात है कि उन्‍होंने यूरोप के महान कलाकारों के चित्रों की भी बहुत सुन्‍दर अनुकृतियां बनाईं. इससे उनकी दृश्‍य भाषा को संवारने में मदद मिली. रॉय की रचनाएं 'वैन गॉ', 'रेम्ब्रां' और 'सेजां' जैसे महान यूरोपीय चित्रकारों की प्रतिलिपियों से लेकर उनकी स्व-निर्मित शैली तक का कलात्मक विकास है. उनकी अपनी शैली अलंकरण विहीन होते हुए भी अपनी रेखीय लय और ओजस्वी रंगों में चमत्कृत करने वाली तथा गतिशील है.

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First published: 11 April 2017, 10:45 IST
 
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