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जश्न-ए-रेख़्ता 2017: दिलवालों के शहर दिल्ली में एक शाम उर्दू के रंगों से हुई गुलज़ार

ऋचा मिश्रा | Updated on: 20 February 2017, 12:52 IST
jashn e rekhta

उर्दू के आशिकों के लिए के लिए 'जश्‍न-ए-रेख्‍़ता' की महफिल एक बार फिर दिल्ली में 17 से 19 फरवरी के दौरान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र में सजी. यह जश्न-ए-रेख्ता का तीसरा आयोजन था, जिसमें दुनियाभर से उर्दू के चाहने वाले जुटे. लोगों ने यहां आए मशहूर शायरों, कवियों और साहित्‍यकारों की सोहबत का भरपूर लुत्‍फ तो उठाया ही और साथ ही अपने साथ हसीन यादें भी लेकर गए. 

Gulzar

ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़साने में, एक पुराना ख़त खोला अनजाने में...

इस महफिल में गुलज़ार साहब ने भी शिरकत की आैर उर्दू से अपने रिश्ते का इजहार करते हुए गुलजार ने कहा, "मैं यहां सिर्फ इसलिए हाजिर हूं कि उर्दू सुनूं और सीखूं, मेरे पास सिखाने के लिए कुछ नहीं है. मैं उर्दू से सिर्फ अपने इश्क़ का इज़हार कर सकता हूं. उर्दू ने आशिक़ बहुत पैदा किए हैं. उन आशिकों में जो सही तौर पर उर्दू जानते हैं वो आज यहां मौजूद हैं."

उर्दू है जिसका नाम हमीं जानते हैं दाग़, सारे जहां में शोर हमारी ज़बां का है

गुलजार ने बताया, "कोई भी ज़ुबां दिन पर दिन बदलती रहती है. उर्दू के साथ भी ऐसा हो रहा है. आज हम 18वीं और 19वीं सदी की उर्दू नहीं बोलते हैं. उर्दू पर दूसरी भाषाओं का असर हो रहा है. पाकिस्तान में भी जो उर्दू परवरिश पा रही है उस पर पंजाबी, पश्तो जैसी भाषाओं का असर है. उर्दू में अगर कोई एक चीज की कमी है, तो वो है इसके रस्मुल खत यानि लिपि की. उर्दू की लिपि को संभालना बहुत जरूरी है."

गुलजार ने यहां चल रहे उर्दू महोत्सव ‘जश्न ए रेख्ता’ में कहा, "गालिब अपनी शायरी को संपादित करते थे और अक्सर उन लेखनी को खारिज कर देते थे जो उन्हें पसंद नहीं आती थी. शायरों और लेखकों के लिए अपनी कमियों को जानना जरूरी है. उन्हें अपनी ही लेखनी संपादित करने के साथ ही उसे खारिज कर देना चाहिए यदि वे कसौटी पर खरी नहीं उतरती हैं."

Sharmila

उर्दू जिसे कहते हैं तहज़ीब का चश्मा है, वो शख़्स है मोहज़्ज़ब है जिस को ये ज़ुबां आई

जश्न-ए-रेख़्ता में अदाकारा शर्मिला टैगोर ने कहा, "उर्दू में ‘ठहराव’ आ गया है और वह मुस्लिम समुदाय तक ही सीमित हो कर रह गई है. ये जुबान संभवत मुसलमानों' द्वारा ही बोली जा रही है. इतिहास को समझने के साथ संतुलित भविष्य को देखने के लिए परंपराएं अहम भूमिका निभाती हैं. लेकिन उर्दू ठहर सी गई है. यह एक अल्पसंख्यक भाषा बन कर रह गई है जो संभवत: सिर्फ मुसलमानों द्वारा ही बोली जा रही है."

इस महफिल में कलाकार अन्नु कपूर ने तंज कसते हुए कहा-

अब तो बदनामी से शोहरत का वो रिश्ता है कि लोग, नंगे हो जाते हैं अख़बार में रहने के लिए

यहां उर्दू के आशिकों के लिए इस महफिल में दास्तान-गोई, नाटक, कव्वाली, ग़ज़ल गायकी, फिल्म स्क्रीनिंग, साहित्यिक चर्चाओं, मुशायरा, बैतबाजी, कैलिग्राफी, वर्कशॉप, वाद-विवाद प्रतियोगिता, प्रदर्शनी, उर्दू बाजार, उर्दू गद्य और काव्य पाठ का शानदार आयोजन किया गया.

First published: 20 February 2017, 12:52 IST
 
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