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स्वामी विवेकानंद पर आरएसएस का दावा इसलिए ख़ारिज होता है...

राजेश कुमार | Updated on: 12 January 2017, 16:20 IST

हम स्वामी विवेकानंद पर संघी (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) दावे को खारिज करते हैं. स्वामी विवेकानंद ने 'जाति, संस्कृति और समाजवाद' पुस्तक की रचना की. उन्होंने कहा था कि हिन्दुस्तान शूद्रों का होगा. वे संन्यासी थे लेकिन राजनीति की महत्ता जानते थे. स्वामी जी राजनीति और धर्म के फर्क को बखूबी समझते थे.

वे ख़ुद को समाजवादी मानते थे और विवेकानंद समाजवादी इसलिए थे क्योंकि उन्‍होंने राष्‍ट्र के समस्‍त नागरिकों के लिए समान अवसर के सिद्धांत' का समर्थन किया था. फरवरी 1897 में मद्रास के विक्टोरिया हॉल में स्वामीजी ने जो कुछ भी कहा था, वो ये बताने के लिए काफी है कि स्वामी जी से संघ की विचारधारा कितनी दूर है. 

फरवरी 1897 में स्वामी जी ने जो कहा वह ये बताने के लिए काफ़ी है कि स्वामी जी से संघ की विचारधारा कितनी दूर है.

स्‍वामीजी के मन में ग़रीबों और दलितों के लिए असीम संवेदना थी. उन्होंने कहा था, ''राष्‍ट्र का गौरव महलों में सुरक्षित नहीं रह सकता, झोपड़ियों की दशा भी सुधारनी होगी. ग़रीबों यानी दरिद्रनारायण को उनके दीन-हीन स्‍तर से ऊंचा उठाना होगा. अगर ग़रीबों और शूद्रों को दीन हीन रखा गया, तो देश और समाज का कल्‍याण नहीं हो सकता है.''

स्वामी जी ने अपने ऐतिहासिक भाषण में कहा था, ''मैं उस भगवान या धर्म पर विश्‍वास नहीं कर सकता जो न तो विधवाओं के आंसू पोंछ सकता है और न तो अनाथों के मुंह में एक टुकड़ा रोटी ही पहुंचा सकता है.''

स्वामी विवेकानन्द पुरोहितवाद, धार्मिक आडम्बरों, कठमुल्लापन और रूढ़ियों के सख्त खिलाफ थे. उन्होंने धर्म को मनुष्य की सेवा के केन्द्र में रखकर आध्यात्मिक चिंतन किया था. उनका हिन्दू धर्म सीमित दायरे का और अटपटा नहीं था. तभी तो उन्होंने ये विद्रोही बयान दिया था, "इस देश के तैंतीस करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी-देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाये, और मन्दिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को हटा दिया जाए."

देश के 33 करोड़ भूखे, दरिद्र और कुपोषण के शिकार लोगों को देवी-देवताओं की तरह मन्दिरों में स्थापित कर दिया जाए.

स्वामी विवेकानंद के दौर में आप इस तरह के बयान की कल्पना भी नहीं कर सकते थे. इसके साथ ही विवेकानंद मनुष्य के विकास को सर्वोपरि मानते थे. उनका मानना था कि इस तरह की ईमानदार कोशिश केवल भारत में ही हो सकती है. दरअसल आजकल स्वामी विवेकानंद की जो व्याख्या की गई है, वो या तो सीमित दायरे में की गई है या अपनी सुविधा के मुताबिक की गई है. यही वजह है कि स्वामी जी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जिस चश्मे से देखता है, हमें उस पर आपत्ति है.

First published: 12 January 2017, 16:20 IST
 
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