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लता पर लिखी गई कोई किताब सिर्फ सुरों की गाथा ही हो सकती थी

हिमांशु वाजपेयी | Updated on: 18 December 2016, 8:05 IST
(आर्या शर्मा/कैच न्यूज़)

कई बरस पहले बशीर बद्र ने अपना एक शेर लता मंगेशकर को समर्पित किया था. 

गले में उस के ख़ुदा की अजीब बरकत है, वो बोलता है तो इक रौशनी सी होती है !

लता के तरन्नुम की रौशनी को बहुत से लोगों ने रौशनाई का मौज़ू बनाया है. अलग अलग भाषाओं में उन पर ढेर सारी किताबें आई हैं. कुछ उम्दा, कुछ आम. हालांकि लता मंगेशकर ख़ुद बेहद ख़ास हैं. इतनी कि उनसे जुड़ी कोई चीज़ आम नहीं रह जाती. उनकी शख़्सियत इस कदर मोतबर है कि उन पर लिखा गया हर लफ़्ज़ बावक़ार हो जाता है. बहुत से लोग मानते हैं कि लता की गायिकी का जादू उन्हे सुनकर ही समझा जा सकता है. इसे लिखकर बयान करना मुमकिन ही नहीं. 

मगर लिखने वालों के लिए लता मंगेशकर पर लिखना हमेशा एक कसौटी रहा है. हर लेखक चाहता है कि लता का हुस्न-ए-तरन्नुम उसके लफ़्ज़ों में दिखे. यही कोशिश बल्कि कहना चाहिए कामयाब कोशिश यतीन्द्र मिश्र ने भी अपनी नई किताब लता सुर-गाथा में की है. इसमें वे अल्फ़ाज़ की नाव पर लता के सुर-सागर की यात्रा करते दिखाई देते हैं. एक ऐसा सफ़र जो मंज़िल से बेनियाज़ है. जिसमें सफ़र ही सफ़र का हासिल है. 

इसके साथ ही यतीन्द्र ने लता मंगेशकर के व्यक्तित्व और संगीत-यात्रा को भी अपनी विशिष्ट शैली में व्याख्यायित किया है. मगर इस किताब में यतीन्द्र के लेखन से ज़्यादा काम की चीज़ उनके द्वारा लता मंगेशकर से की गयी लंबी बातचीत है. दर-हक़ीक़त यही इस किताब का हासिल है. ये अहमतरीन चीज़ है, जिसकी अहमियत वक़्त के साथ-साथ बढ़ेगी.  

640 पेज की इस किताब के पहले हिस्से में लता की शख़्सियत और सफ़र और दूसरे हिस्से में 370 पन्नों का इंटरव्यू है

640 पेज की इस भारी-भरकम किताब के दो हिस्से हैं. पहले हिस्से में लता मंगेशकर के फन, शख़्सियत और सफ़र पर लिखी गयी सौ निबंधनुमा टिप्पणियां हैं. और दूसरे हिस्से में लता मंगेशकर का एक लंबा इंटरव्यू है जो 370 पन्नों में फैला है. ये इंटरव्यू लेखक ने किया है. साथ ही किताब के अंत में एक उपयोगी परिशिष्ट भी है. यूं तो दोनों हिस्से अपने आपमें पूरी तरह मुकम्मल और आज़ाद हैं और अलग अलग किताब के तौर पर भी शाया हो सकते थे. मगर एक किताब में साथ-साथ आने पर दोनों का हुस्न निखर गया है. 

जब आप पहले हिस्से में डूबकर दूसरे हिस्से की शुरूआत पर पहुंचते हैं तो आपको इस बात का पूरा भरोसा हो चुका होता है कि लता मंगेशकर से यतीन्द्र जैसी गुफ्तगू दूसरा कोई नहीं कर सकता. ये जानने की बेताबी भी उस वक़्त चरम पर होती है कि आख़िर लता मंगेशकर में इस कदर डूबा हुआ जब उनसे बातचीत करेगा तो कैसे कैसे नगीने निकल के आएंगे. 

इसी तरह अगर पहला हिस्सा छोड़ दें और सिर्फ दूसरा हिस्सा पढ़ें, तब भी आप बीच में ही कहीं समझ जाते हैं कि ये जो आदमी लता जी के साथ बात कर रहा है, इसने उनके बारे में जो भी लिखा होगा वो पढ़ने लायक होगा...और सच भी यही है.

गद्य भी कविता जैसा

यतीन्द्र हिन्दुस्तानी संगीत के गहरे अध्येता है. संगीत पर केन्द्रित उनकी कई किताबें पहले भी सराही गयी हैं. लता-संगीत के तो वो दीवाने ही हैं. उनकी इस दीवानगी को ख़ुद लता ने भी तस्लीम किया है. ये दीवानगी इस किताब में भी नज़र आती है. चूंकि वे मूलत: एक कवि हैं इसलिए उनका गद्य भी कविता जैसा सरस है. संगीत उनकी आत्मा में किस गहराई तक बसा होगा इसका अंदाज़ा हमें उनकी भाषा से हो जाता है. 

भाषा की अपनी एक संगीतात्मकता, एक मूसीक़ीयत होती है, पहले हिस्से को पढ़ते हुए हम इस मूसीक़ीयत को बराबर महसूस करते हैं. इस हिस्से में यतीन्द्र ने लता-संसार यानी उनके गायन, उनके समय, उनके समाज, उनके व्यक्तित्व, उनके व्यक्तिगत जीवन, उनके व्यावसायिक जीवन, उनके अन्तर्मन, उनके महत्त्व आदि पर दुर्लभ ज्ञान और संवेदना से भरी खूबसूरत टिप्पणियां लिखी हैं. जिनको पढ़ते हुए आप उनके करीब से करीबतर होते जाते हैं. ये टिप्पणियां कितनी मुस्तनद हैं, इंटरव्यू पढ़ते वक़्त हमें बार बार इसका सबूत मिलता है.

किताब का दूसरा हिस्सा

पहले हिस्से की अहमियत अपनी जगह लेकिन किताब की जान इसका दूसरा हिस्सा है. लता मंगेशकर का छह साल तक चला और तीन सौ सत्तर पन्नों पर फैला बेहतरीन इंटरव्यू. लता मंगेशकर का ऐसा इंटरव्यू न पहले कभी लिया गया और न शायद अब लिया जा सकेगा. क्योंकि लता से दोबारा इतने वक़्त तक इतनी गहराई से इतनी बातें कर पाना आसान नहीं होगा. इसी वजह से ये किताब यादगार और ऐतिहासिक बन जाती है. जो लोग लता मंगेशकर के बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानना चाहते हैं, उनके लिए ये सर्वश्रेष्ठ किताब है. 

लता जो कि अब सार्वजनिक तौर पर ज़्यादा बात नहीं करतीं, उनको इतने सारे प्रश्नों पर सीधे अपनी बात रखते सुनना एक रोमांचकारी अनुभव है. इसे पढ़ते वक़्त हमें ये भी पता चलता है कि यतीन्द्र लता मंगेशकर और उनके संगीत दोनों के कितने करीब हैं. इस इंटरव्यू को पढ़ना एक पूरे दौर को रीविज़िट करना है. फिल्मी दुनिया के बेशुमार ऐतिहासिक किरदार एवं घटनाएं जीवंत होकर हमारे सामने से गुज़रने लगते हैं. काफ़ी दिनों बाद लता जी ने ख़ुद से जुड़े अहम पहलुओं पर विस्तार से बात की है.

इस किताब को पढ़ते ही फिल्मी दुनिया के बेशुमार ऐतिहासिक किरदार एवं घटनाएं जीवंत होकर हमारे सामने से गुज़रने लग

बीच-बीच में बेहद दिलचस्प रैपिड फायर राउंड भी आते हैं. ये यतीन्द्र की अपनी सलाहियत है कि उन्होंने लता जी से ऐसे सवाल भी पूछ लिए हैं जो उनसे पहले कभी नहीं पूछे गए. इंटरव्यू के कई सवाल आपको इस तरह चौंकाते हैं कि अरे ! ये तो मैं कब से पूछना चाहता था उनसे... या मौक़ा मिलने पर मैं भी यही पूछता...लता जी ने जवाब भी लजवाब तरीक़े से दिए हैं. 

ख़ासतौर पर जब वो अपने पिता जी के बारे में बात करती हैं या फिल्म संगीत के भूले बिसरे लोगों पर विस्तार में अपना मत रखती हैं या साहित्य एवं साहित्यकारों पर अपना मत रखती हैं या अपनी गायिकी के तकनीकी पक्षों पर विस्तार से बात करती हैं या अपने अन्तर्मन की गांठें खोलती हैं. 

इस इंटरव्यू से गुज़रते वक़्त आपको इंटरव्यू की विधा का महत्त्व भी समझ में आता है. ये ख़याल भी आता है कि काश ! देश-दुनिया के सारे बड़े लोगों का बड़े से बड़ा इंटरव्यू करके उसे हमेशा हमेशा के लिए महफूज़ कर लिया जाए.

ख़ामियां

अच्छी समीक्षा में किताब की ख़ामी पर भी तब्सेरा होना चाहिए. लता सुर-गाथा एक सहेजने लायक किताब है. फिर भी इसमें कुछ बातें खटक सकती हैं. जैसे प्रूफ की बहुत सारी ग़लतियां. ख़ासकर उर्दू के लफ़्जों में. एक सुरीले सफ़र के बीच ये ग़लतियां ज़हन पर हथौड़े की तरह गिरती हैं. जिन लोगों को ज़्यादा मोटी किताब पढ़ने का अभ्यास नहीं है उन्हे इस किताब की मोटाई अखर सकती है. 

जिन लोगों को इसकी मोटाई अखरेगी बहुत मुमकिन है कि उन्हे इसका मूल्य भी अखर जाए. ये भी ग़ौरतलब है कि किताब में यतीन्द्र ने लता मंगेशकर से एक ‘श्रद्धावनत भक्त’ की तरह से बातचीत की है, न कि एक ‘महीन पत्रकार’ की तरह.  सो उस शैली का इंटरव्यू पसंद करने वाले कई जगह निराश हो सकते हैं, विशेषकर वो जिन्हें संवाद से ज़्यादा विवाद में दिलचस्पी है. 

इसके अलावा सामान्यत: भी कुछ जगह लोगों को ऐसा लग सकता है कि ये सवाल ठीक नहीं पूछा गया, ठीक तरीके से नहीं पूछा गया, इस प्रश्न के बाद तो प्रति-प्रश्न बनता था, पिछले सवाल से अगले सवाल के बीच कोई रब्त नहीं है वगैरह वगैरह. मगर छह साल और तीन सौ सत्तर पन्नों पर फैले एक इंटरव्यू के सारे सवाल सारे पढ़ने वालों को ठीक लगेंगे ये उम्मीद बेमानी है. वो भी तब, जब वो आपको ऐसा शाहकार मिल रहा हो.

First published: 18 December 2016, 8:05 IST
 
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