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हुई मुद्दत के ग़ालिब मर गया पर याद आता है

राणा सफ़ी | Updated on: 31 December 2015, 13:35 IST
QUICK PILL
उर्दू के मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की 218वीं वर्षगांठ पर उन्हें याद कर रही हैं इतिहासकार और लेखक राना सफ़वी.

उर्दू ज़बान में एक से बढ़ कर एक दानिशवर हुए हैं, फिर भी ग़ालिब के जोड़ का शायद ही कोई दूसरा मिले.

हालांकि कुछ लोगों को ये कहना अतिश्योक्ति लग सकता है क्योंकि ख़ुद ग़ालिब, मीर तक़ी मीर को ख़ुद से बड़ा शायर मानते थे.

हर साल 27 दिसबंर को ग़ालिब की वर्षगांठ पर दुनिया भर के लेखक, कलाकार और आम पाठक उन्हें बहुत शिद्दत से याद करते हैं.

हुई मुद्दत के ग़ालिब मर गया पर याद आता है, वो हर इक बात पे कहना के यूं होता तो क्या होता

शायरी के किसी नए शौक़ीन के लिए ग़ालिब सबसे मुफीद शायर हैं. अपने चाहने वालों की भावनाओं को ख़ुद उन्होंने ही बहुत ख़ूबसूरती से बयां किया है-

हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाजे बयां और

आखिर ग़ालिब में ऐसा क्या है जिसे उनके मरने के 218 साल बाद भी आज की पीढ़ी इतना पंसद करती है. वो भी तब जब ग़ालिब खालिस उर्दू में लिखते थे जो आज उतनी प्रचलित नहीं है.

असदुल्लाह बेग ख़ान ने पहले असद (शेर) नाम से शायरी शुरू की. बाद में उन्होंने ग़ालिब तखल्लुस चुना, जिसका अर्थ है विजेता.

ग़ालिब मूलतः अपने अंदर झांकने वाले कवि हैं. वो बहुत बड़े विचारक भी थे. उनके शेरों में गहरी अंतरदृष्टि और मानवीय सरोकार दिखते हैं. उनकी शायरी हर किसी का दिल छूती है.

शायरी को पसंद करने वाला शायद ही कोई ऐसा आदमी मिले जिसे ग़ालिब ने निराश किया हो. हर उम्र और हर वक़्त के काव्य प्रेमियों को ग़ालिब के पास अपनी ज़रूरत का सामान मिल जाता है. उनकी शायरी सही मायनों में कालजयी है.
 
उनसे पहले क्या किसी ने इश्क़़ को इस तरह बयां किया था,

इश्क़ से तबीयत ने ज़ीस्त का मज़ा पाया, दर्द की दवा पायी, दर्द-ए-बे-दवा पाया

परस्पर विरोधाभासी लगने वाली बातों को ग़ालिब ने प्यार की हक़ीक़त बयानी के लिए बहुत ख़ूबसूरती से इस्तेमाल किया है.

आगे मैं ग़ालिब के जिस शेर का जिक्र करने जा रही हूं वो तो आज की पीढ़ी की भावनाओं का थीम सॉन्ग जैसा हो चुका है. चाहे  वो घर हो या दफ़्तर लोग बारहा उसे पढ़ते हुए नज़र आते हैं, शेर कुछ यूं है-

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले, बहुत निकले मेरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

मजहब और जाति के नाम लड़ने वाले भूल जाते हैं कि इंसानियत न रही तो कोई धर्म नहीं बचेगा. ऐसे में ग़ालिब याद आते हैं,

बस के दुश्वार है, हर काम का आसां होना, आदमी को भी मयस्सर नहीं, इंसान होना

ग़ालिब ने जीवन में बहुत उतार-चढ़ाव देखे थे. आशा-निराशा और सुख-दुख के बीच झूल रही ज़िंदगियों को ग़ालिब से ज़्यादा करीबी शायर दूसरा कोई नहीं लगता.

कोई उम्मीद बर नहीं आती
कोई सूरत नज़र नहीं आती
हम वहां हैं जहां से हमको भी
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती
आगे आती थी हाल-ए-दिल पे हंसी
अब किसी बात पर नहीं आती

ग़ालिब रोजमर्रा के जीवन की बेबसी, लाचारी और हताशा को जिस फलसफ़े के साथ देखते हैं वो आज भी अप्रतिम है.

साथ ही, वो धार्मिक और सांस्कृतिक रूढ़ियों पर भी तीखा तंज करते हैं जो आज भी मौजूं है.

कहां मयखाने का दरवाज़ा ग़ालिब और कहां वाइज़, पर इतना जानते हैं कि कल वो जाता था कि हम निकले

एक और शेर में ग़ालिब कहते हैं, वाइज़ ना ख़ुद पियो, ना किसी को पिला सको, क्या बात है तुम्हारी शराब-ए-ताहूर की

दूसरों पर सवाल खड़ा करने वाले ग़ालिब ख़ुद को भी नहीं छोड़ते हैं.

काबे किस मुंह से जाओगे ग़ालिब, शर्म तुमको मगर नहीं आती

ग़ालिब की शायरी अभिव्यक्ति की आज़ादी, प्रेम और मानवीय जिजीविषा की शायराना नुमाइंदगी है. इसीलिए अल्लामा इक़बार ने ग़ालिब की तुलना विलियम शेक्सपियर से की थी. दो अजीम शख्सियतों को तुलना शायद बेजा है. ये हमारी ख़ुशनसीबी है कि ऐसे लोग इस ज़मीं से होकर गुजरे.

First published: 31 December 2015, 13:35 IST
 
राणा सफ़ी @iamrana

Rana Safvi is an author and historian with a passion for culture and heritage. She is the founder and moderator of the popular #shair platform on Twitter. Her book Where Stones Speak: Historical Trails in Mehrauli, The first city of Delhi has just been published.

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