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Mother's Day: 'मगर मां सबसे कह रही है बेटा मज़े में है'

अमितेश गौरव | Updated on: 13 May 2017, 20:33 IST

"सख्त राहों में भी आसान सफ़र लगता है, ये सब मेरी मां की दुआओं का असर लगता है..."

मां एक ऐसा शब्द जिसमें सारी दुनिया के शब्दकोश को समेटने की शक्ति है. अपने बच्चे के हाथों से गंदा किया हुआ खाना भी जो अमृत समझ कर खाती है वो मां होती है. मां की ममता के आगे सारा संसार सूना है. मां ने 9 महीने अपनी कोख में जगह देकर हमें इस ख़ूबसूरत दुनिया में आने का मौक़ा दिया है, वो तो अनमोल है. इस ममतामई जननी के सम्मान में कुछ भी किया जाए वो कम है. हर बच्चे की तरफ़ से मां को सम्मान देने के लिए एक बेहद मामूली सी कोशिश की जाती है, जिसे 'मदर्स डे' का नाम दिया जाता है.

वैसे तो हर दिन मां का दिन होता है, क्योंकि उनकी ही देन है कि हम ये दुनिया देख पा रहे हैं. लेकिन आज-कल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में जब हम अपने सपनों को साकार करने की ख़ातिर मां का आंचल छोड़ कर एक अजनबी शहर में चले आते हैं, तो आज के दिन की अहमियत बढ़ जाती है. मां और बच्चे का रिश्ता हर इंसान के लिए दुनिया का सबसे प्यारा और ख़ास रिश्ता होता है. 

ये ऐसा क़र्ज़ है जो मैं अदा कर ही नहीं सकता...
मैं जब तक घर न लौटूं, मेरी मां सज़दे में रहती है...

वैसे तो जब हम साथ रहते थे तो कभी समझ न आई कदर तुम्हारी, मगर जब आज हम दूर हैं तो तुम बहुत याद आती हो मां. जब दफ़्तर से थक-हार कर शाम को रूम पर जाते हैं, तो लगता है शायद आप होती तो हम थके नहीं होते. मैंने यहां रूम इसलिए कहा क्योंकि घर तो वो होता है जहां मां होती है. 

देख ले अंधेरे तेरा मुंह काला हो गया...मां ने आंखें खोल दीं घर में उजाला हो गया...

जब सुबह-सुबह ऑफिस जाने की जल्दी में घर से बिना कुछ खाये निकलते हैं और आपके पूछने पर जब झूठ कहते हैं कि हमने नाश्ता किया है, तो उस समय आंखें भर आती हैं मां और याद आता है कि कैसे हम सोये होते थे और आप कमरे में खाना लेकर आती थीं. जब कभी भी ठेले पर छोले-कुलचे खाते हैं, तो आपका खिलाया हुआ हर एक निवाला याद आता है मां. 

खाने की चीज़ें मां ने जो भेजी हैं गांव से...
बासी भी हो गई हैं तो लज़्ज़त वही रही...

ये दर्द किसी एक का नहीं हर छोटे शहर के लाड़लों का है, जो मां से और घर से दूर हैं. दोस्तों किसी मां की ममता, मोहब्बत और महानता को किसी मदर्स डे का मोहताज मत बनाइए. मां किसी एक दिन की मिसाल नहीं, वो तो हमारी ज़िंदगी की बेमिसाल पहचान है. मां के त्याग-तपस्या और समर्पण के जज्बे की मिसाल हो भी नहीं सकती. वो तो सब कुछ करके भी बदले में कुछ नहीं चाहती. बच्चों का ख़ुश होना ही उसके लिए सबसे बड़ा ख़ज़ाना है. 

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है...
मां दुआ करती हुई ख़्वाब में आ जाती है...

कुछ बरस पहले तक 'मदर्स डे' भारतीयों के लिए ख़ास मायने नहीं रखता था. चूंकि हमारे माता-पिता तो अधिकतर हमारे साथ ही रहते थे. लेकिन आज मेट्रो शहर में रहते हुए लाइफ में सब-कुछ जैसे बदलता जा रहा है. इसी वजह से हमारी सभ्यता, संस्कृति, मर्यादाएं और परम्पराएं भी अछूती न रह सकीं और भारतीय संस्कृति में प्रवेश हुआ 'मदर्स डे' का.

बेहतर करियर और भविष्य की चाहत में सपने संवारने के लिए मां का लाड़ला उसके आंचल को छोड़कर बड़े शहरों में छत तलाशने आ जाता है. मुन्नवर राना की ये नज़्म हम जैसे तमाम युवाओं पर फिट बैठती है. 

"बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर, मां सबसे कह रही है कि बेटा मज़े में है."

(अमितेश गौरव, सीनियर SEO Executive, कैच हिंदी)

First published: 13 May 2017, 13:05 IST
 
अमितेश गौरव @https://twitter.com/amiteshkumargau

मेरी बातों से आप का सहमत होना जरुरी नही.आप ने मेरी बातों को पढ़ा इसके लिए आप को हार्दिक धन्यवाद.

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