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Mother's Day Special: इस शायर ने गज़ल को कोठे से घसीट कर मां के पैरों में लाकर रख दिया

कैच ब्यूरो | Updated on: 13 May 2018, 12:10 IST

मां एक ऐसा शब्द जिसके मायने लिखने हों तो कितनी ही किताबें काम पड़ जाएं. मां शब्द पर जाने कितनी ही रचनाएं लिखी गयीं, फिर चाहे वो श्रवण कुमार की फरमां-बरदारी हो या मुनव्वर राणा के मां पर लिखे शेर. मुनव्वर राणा के मां पर लिखे शेरों के बारे में कहा जाता है कि राणा ने शायरी कोठे से घसीट कर मां तक ले आए. इस बात को उन्होंने अपने एक शेर में भी बखूबी बयान किया है.

''मामूली एक कलम को कहाँ तक घसीट लाए
हम इस ग़ज़ल को कोठे से माँ तक घसीट लाए''

मदर्स डे के मौज़ू पर मुनव्वर राणा ने एक शेर लिखा था जो क़ी पूरी तरह से इस मौके पर सटीक बैठता है. मुनव्वर राणा का शेर -

''ऐसे तो उससे मोहब्बत में कमी होती है,
माँ का एक दिन नहीं होता है सदी होती है !''

 

पढ़ें मुनव्वर राणा के मां पर लिखे कुछ शेर-

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

                   ***
लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

                   ***

 

जब तक रहा हूँ धूप में चादर बना रहा
मैं अपनी माँ का आखिरी ज़ेवर बना रहा

                   ***

किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
मैं घर में सब से छोटा था मेरे हिस्से में माँ आई

                   ***

ऐ अँधेरे! देख ले मुँह तेरा काला हो गया
माँ ने आँखें खोल दीं घर में उजाला हो गया

                   ***
इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है
माँ बहुत ग़ुस्से में होती है तो रो देती है

                   ***
यहीं रहूँगा कहीं उम्र भर न जाउँगा
ज़मीन माँ है इसे छोड़ कर न जाऊँगा

                   ***

दिया है माँ ने मुझे दूध भी वज़ू करके
महाज़े-जंग से मैं लौट कर न जाऊँगा

                   ***

बरबाद कर दिया हमें परदेस ने मगर
माँ सबसे कह रही है कि बेटा मज़े में है

                   ***

मैंने कल शब चाहतों की सब किताबें फाड़ दीं
सिर्फ़ इक काग़ज़ पे लिक्खा लफ़्ज़-ए-माँ रहने दिया

                 

                   ***

माँ के आगे यूँ कभी खुल कर नहीं रोना
जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती

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First published: 13 May 2018, 10:54 IST
 
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