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रहस्यमयी कवियत्री: क्या सच में जिंदा है दोपदी सिंघार?

राजकुमार सोनी | Updated on: 5 September 2016, 8:08 IST

किसी ने उन्हें क्रांतिकारी कहा तो किसी ने माओवादी. मगर बेहद थोड़े समय में 'पेटीकोट' 'कार्ल मार्क्स', 'फाड़ पोलका तुम हमारा' 'संविधान' और 'आग' जैसी कविताओं के जरिए हलचल मचा देने वाली कवियित्री दोपदी सिंघार अब गायब है. दोपदी सिंघार के नाम से जो फेसबुक पेज खोला गया था वह बंद हो चुका है. 

उसकी कुछ कविताएं सोशल मीडिया में इधर-उधर बिखरी पड़ी है. अब से कुछ समय पहले तक मध्यप्रदेश के अलीराजपुर में रहने और माओवाद प्रभावित बस्तर विश्वविद्यालय में पढ़ने का दावा करने वाली इस कवियित्री की तलाश हर किसी को है.

वे लोग जो साहित्य को 'ठहराव' और 'मान्यता' से अधिक जीवन का मसला मानते हैं, दोपदी से मिलने को बेताब है, मगर कवियित्री कहां है और किस हालात है, उसका कोई स्थायी पता ठिकाना है भी या नहीं, इसकी जानकारी किसी को नहीं मिल पा रही है.

सवालों का पहाड़

हिंदी जगत में इस कवियित्री के एकाएक अवतरित होने और फिर परिदृश्य से गायब हो जाने के बाद सवालों का पहाड़ खड़ा हो गया है. साहित्यकारों के एक वर्ग का कहना है कि आखिर दोपदी ने ऐसा क्या कर दिया था जिसकी वजह से उसे अपना फेसबुक एकाउंट बंद करना पड़ा?

यह सही हैं कि उनकी कविताएं सड़ी-गली व्यवस्था के विरोध में है मगर उनसे पहले धूमिल, कुमार विकल, आलोक धन्वा जैसे और भी कई कवि मुखर होकर तेजधार कविताएं लिखते रहे हैं. देश के लब्ध प्रतिष्ठित युवा आलोचक सियाराम शर्मा कहते हैं, 'सुप्रीम कोर्ट द्वारा 66-ए को निरस्त किए जाने के बाद भी जिस देश की निचली अदालतों ने इस धारा के तहत दर्ज किए गए प्रकरणों का खात्मा न किया हो, वहां यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या कभी देश के लेखकों और कविओं की अभिव्यक्ति को वाजिब सम्मान हासिल हो पाएगा?'

वे आगे कहते हैं, 'जब अर्धनारीश्वर लिखने वाले तमिल लेखक मुरुगन को कोर्ट में कहना पड़ता हो कि उनके भीतर के लेखक की मौत हो गई है तब एक कवियित्री दोपदी खुद को क्यों छिपा लेती है यह बताने की जरूरत नहीं है. अलबत्ता यह चिंता का विषय अवश्य होना चाहिए कि कविताओं में यथार्थ की ताकत से जगह बना लेने वाली कवियित्री ने व्यवस्था के असहयोग से परेशान होकर खुद को किसी गुफा में कैद कर लिया है.

युवा कवियित्री प्रियंका शुक्ला भी आलोचक शर्मा की बातों से सहमत है. वे कहती हैं, 'दोपदी ने अपनी कुछ कविताओं को सोशल मीडिया में साझा कर यह जानने का प्रयास किया था कि लोगों की प्रतिक्रियाएं कैसी होगी? एक हजरत ने दोपदी की कविता 'पेटीकोट' के खिलाफ 'कफन' नाम से कविता लिखी और बगैर प्रमाण के खुले तौर पर यह ऐलान कर दिया कि दोपदी एक माओवादी कवियित्री हैं और वह इस माओवादी कवियित्री की वजह से कवि बन गया है.

प्रियंका कहती है, 'देश में जब लोग सच सुनने को तैयार नहीं है तो फिर हमें थोड़ा ठहरकर यह तो सोचना ही चाहिए एक सच बोलने वाली कवियित्री के सामने आने पर हम उसका कितना साथ दे पाएंगे?'

कथाकार कैलाश बनवासी किसी भी लेखक या कवि के मैदान छोड़कर जाने के खिलाफ है. वे कहते हैं, 'देश की राजसत्ता ने जो परिस्थितियां बनाई है वह बेहद खराब है. हर कोई डरा और सहमा हुआ है, लेकिन यहीं वह समय है जब लेखक, कवि, पत्रकार और संस्कृतिकर्मियों को क्रूर और आततायी व्यवस्था से लड़ते-भिड़ते रहना हैं. अगर कोई कवि मैदान छोड़कर भाग जाता है तो फिर अंधेरे को पुरस्कृत होने से कोई नहीं रोक पाएगा.'

बनवासी युवा कवियित्री दोपदी को एक चमकती उम्मीद के तौर पर देखते हैं. वे कहते हैं, 'दोपदी को अपनी कुछ और जोरदार कविताएं सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों में सांझा करनी चाहिए और एक दिन पूरी दुनिया के सामने यह कहते हुए प्रकट हो जाना चाहिए कि अभी दोपदी और विचारधारा दोनों जिंदा है. दोनों को अभी फांसी पर लटकाया नहीं जा सका है.'

स्नोवा ने भी मचाई थीं धूम

दोपदी सिंघार से पहले स्नोवा बार्नो नाम की एक लेखिका ने इसी तरह से धूम मचाई थीं. इस लेखिका की खोजबीन भी खूब की गई. देश की कुछ लब्ध प्रतिष्ठ साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में छपने के बाद एक रोज लेखिका गायब हो गई तब साहित्य में उधेड़बुन करने वाले कुछ लोगों ने यह ढूंढ निकाला कि हिमाचल प्रदेश का एक नामचीन लेखक स्नोवा बार्नो बनकर कहानियां लिख रहा था.

हालांकि उधेड़बुन करने वाले आज तक इस बात की मुकम्मल जानकारी हासिल नहीं कर पाए कि लेखक को लेखिका बनकर लिखने की जरूरत क्यों पड़ी? देश के प्रसिद्ध उपन्यासकार मनोज रुपड़ा कहते हैं, 'छदम नाम से लिखना कोई नई बात नहीं है. पुर्तगाल में एक कवि फरनादो पेसेवा हर बार अपनी नई रचना का सृजन नए नाम से करते थे. 

कुछ दिनों बाद लेखक के मौत की घोषणा भी हो जाती थीं. लेखक की मौत पर पाठक दुखी होते थे तो पेसेवा खुश होते थे. इस बहाने वे अपने पाठकों के धैर्य और भरोसे को तौलते थे. बहुत बाद में लोगों को यह पता चला कि अलग-अलग नामों से लिखने वाला कोई और नहीं ब्लकि लेखक पेसेवा ही है.'

हिंदी के युवा कवि बंसत त्रिपाठी दोपदी की कविताओं में प्रतिरोध की बड़ी ताकत देखते हैं. वे कहते हैं, 'जब किसी रचना में फोर्स होता है तो रचनाकार मुखर होकर लिखता है, लेकिन दोपदी एक फोर्स को हमारे सामने रखकर चली गई है. अब दोपदी सामने नहीं है तो हमें उसकी रचनाओं पर बातचीत जारी रखनी चाहिए.'

आदिवासी और उनका दर्द

दोपदी की कविताओं में आदिवासियों की तकलीफ साफ तौर पर दिखाई देती है. आदिवासी जन-जीवन की पड़ताल की वजह से लोगों ने यह माना कि उनकी कविताओं में बस्तर मौजूद है. बस्तर में जो कुछ घट रहा है उसे पेटीकोट कविता के जरिए समझा जा सकता है-

पेटीकोट

नहीं उतारा मैंने अपना पेटीकोट,

दरोगा ने बिठाए रखा चार दिन, चार रात

मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट,

नक्सल कहकर बिठाए रखा चार दिन, चार रात

बोला, 'बीड़ी लेकर आ'

बीड़ी का पूड़ा लेके आ गई,

'चिकन लेके आ रंडी'

चिकन लेके आ गई

'दारू ला'

दारू लेके आई,

माफ करना मेरे क्रांतिकारी दोस्तों,

मैं सब लाई जो-जो दरोगा ने मंगाया,

मेरी बिटिया भूखी थीं घर पर,

दरोगा ने मांगा फिर मेरा पेटीकोट,

मैं उसके मुंह पर थूक आई,

भागी, पीछे से मारी उसने गोली मेरी पिंडली पर,

मगर मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट.

आग

जिसने सोलह साल में देख ली नौ मौत, छह डिलेवरियां,

उसके लिए अंधेरा कविता है. मार कविता है. झगड़ा कविता है.

घाव कविता है. घर कविता है.

तुम लोगों को बहुत परनाम कविता बनाना बतलाया

इस कविता से मजिस्ट्रेट के दफ्तर में आग लगाऊंगी मैं.

'संविधान'

औरत के पास बहुत अधिकार है,

ऐसा अम्बेडकर जी संविधान नाम की पोथी में लिख गए हैं,

औरत के बहुत अधिकार है-

औरत उसी टेम नंगी हो जाए जब उसका आदमी कहे

औरत जेठ के आगे, देवर के आगे, नंदोई के आगे

डाक्टर के आगे, वकील के आगे, पंसारी के आगे

पुलिस के आगे, जज के आगे, पंच के आगे,

पटवारी के आगे नंगी हो जाए.

औरत का अधिकार है कि अगर नंगी न होना चाहे तो मर जाए

औरत हमेशा शरीर ढंककर रखे या बलात्कार करवाए

औरत का अधिकार है वह बलात्कार का मजा लें और पुलिस में न जाए.

औरत को बलात्कार करवाने पर सरकार 25 हजार का ईनाम देगी

औरत गाली खाए

औरत बंदरिया जैसी जब चाहे नाच दिखाए और भाड़ में जाए.

(दोपदी का कोई काव्य संग्रह अब तक सामने नहीं आया है, लेकिन उनकी कुछ कविताएं सोशल मीडिया में इधर-उधर बिखरी पड़ी है. पाठक इस कवियित्री को खोजकर पढ़ सकते हैं)

First published: 5 September 2016, 8:08 IST
 
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