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नज़ीर अकबराबादीः मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार

नज़ीर अकबराबादी | Updated on: 23 March 2016, 17:24 IST

हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार,

जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार.

एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल,

जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार.

जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब,

मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार.

तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ,

तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार.

और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां,

तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार.

नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम 'नजीर',

फिर बरस दिन के ऊपर है होली की बहार.

(जांफिशानी- जी तोड़ कोशिश, जाफरानी- केसरिया)

First published: 23 March 2016, 17:24 IST
 
नज़ीर अकबराबादी @catchhindi

नज़ीर अकबराबादी(1740-1830) को अवाम का गीतकार कहा जाता है. नज़ीर के जीवन और गीतों पर आधारित हबीब तनवीर का लिखित-निर्देशित नाटक 'आगरा बाज़ार' काफ़ी मशहूर है.

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