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निर्भया दिवस: महिला शोषण का नया अड्डा बन गया सोशल मीडिया

पूजा सिंह | Updated on: 16 December 2016, 12:43 IST
QUICK PILL
निर्भया कांड के बाद पूरा देश गुस्से से उबल पड़ा था. लगा था कि देश की बर्दाश्त करने की क्षमता समाप्त हो गयी है. एनफ़ इज़ एनफ़! उस घटना के चार साल बाद इंटरनेट और सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ हो रहा व्यवहार क्या कहता है? हम वहीं खड़े हैं जहां से चले थे. चेहरे बस बदल रहे हाड़-मांस-मस्तिष्क वही है.

चार साल पहले देश की राजधानी दिल्ली में घटी एक जघन्य घटना के बाद मेरे मन में एक असंभव सा ख़याल आया. मुझे लगा कि, काश ऐसा हो कि 16 दिसंबर की तारीख को हमेशा-हमेशा के लिए मिटाया जा सके और 15 दिसंबर के बाद सीधे 17 दिसंबर आ जाये. इससे होगा यह कि कम से कम हमें हर वर्ष निर्भया बलात्कार कांड की दर्दनाक याद से नहीं गुजरना होगा. लेकिन ऐसा न होता है, न हुआ. यह तारीख हर वर्ष आती है और हमें (लड़कियों को) झकझोर कर चली जाती है. उस अमानवीय त्रासदी की चौथी सालगिरह पर मैं कह सकती हूं कि उस घटना ने हमें बदला हो या न लेकिन एक सालाना रस्म का रूप जरूर ले लिया है.

निर्भया कांड के बाद सत्तातंत्र ने आनन-फानन में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध से जुड़े कानूनों की समीक्षा की. नये कठोर कानून बनाये. कोशिश की गयी कि निर्भया जैसी घटना की पुनरावृत्ति न हो. उस वक्त भी सोशल मीडिया निर्भया के दुख में लगभग उबल पड़ा था.

ट्विटर पर कोई भी व्यक्ति बहुत आसानी से किसी सेलिब्रिटी या अन्य व्यक्ति को निशाना बना सकता है.

आज चार साल बाद करीब से देखने पर चीजें कमोबेश उतनी ही संतुलित नज़र आती हैं. उल्टा सोशल मीडिया और इंटरनेट वेबसाइट्स पर महिलाओं, औरतों के साथ जो कुछ हो रहा है वह आम चलन बनता जा रहा है. सवाल उठता है कि क्या वाकई 16 दिसंबर की घटना ने हमें कुछ बदला, हमने कुछ सबक सीखा? इस आत्मावलोकन के लिए निर्भया कांड की चौथी बरसी शायद सबसे मुफीद वक्त है.

बरखा दत्त, शर्मिष्ठा मुखर्जी, प्रियंका चतुर्वेदी, कविता कृष्णन, श्रुति सेठ, कंगना रनौत, साइना नेहवाल. बीते कुछ अरसे में ये नाम आपकी आंखों के सामने से जरूर गुजरे होंगे. इन नामों में से किसी का संबंध राजनीति से है, किसी का अभिनय और किसी का खेल से. लेकिन इनमें एक बात साझा है. पिछले दिनों इन सभी को सोशल मीडिया पर एक के बाद एक ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ा. उनके खिलाफ अश्लीलता की हद तक जाकर टिप्पणियां की गईं. बलात्कार, हत्या तक की धमकियां दी गईं.

आर्थिक विकास का दम भरकर विश्वशक्ति बनने का दावा करने वाले हमारे देश में सोशल मीडिया पर स्त्रियों की स्थिति आज भी आम सामंती मानसिकता वाले घरों की चारदीवारी के भीतर फैली सड़न जितनी ही बुरी है. इस सार्वजनिक मंच पर अपनी बात रखने पर उसी तरह से महिलाओं को छेड़छाड़, बलात्कार और हत्या की धमकी मिलती है जिस तरह से गांव की पंचायतों में कुल्टा, चरित्रहीन और चुड़ैल जैसी पदविया सदियों से दी जाती रही हैं.

चर्चित न्यूज एंकर बरखा दत्त को गालियां देते हुए ट्विटर पर उनका मोबाइल नंबर सार्वजनिक कर दिया गया. जिसके बाद उनके लिए परेशानियों का एक दुष्चक्र शुरू हो गया. सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ सेक्सुअल हैरेसमेंट का सिलसिला चल पड़ा. ऐसा नहीं है कि पुरुष पत्रकारों को ट्रोल नहीं किया जाता, लेकिन उनके खिलाफ यौन उत्पीड़न की कोशिशें नहीं होती है. यौन उत्पीड़न पूरी तरह से महिला सेलीब्रेटी के लिए सुरक्षित है.

कांग्रेस प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी पिछले दिनों उस वक्त सदमें में आ गयीं जब ट्विटर पर एक व्यक्ति ने लिखा कि उनके साथ बलात्कार करके निर्भया की तरह जघन्य क्रूरता के साथ उनकी हत्या कर दी जानी चाहिये. एक अन्य व्यक्ति ने लिखा कि वह राहुल गांधी की लिव इन पार्टनर क्यों नहीं बन जातीं?

एक हालिया अध्ययन के मुताबिक इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले 40 प्रतिशत लोगों को कभी न कभी परेशान किया जाता है.

इसी प्रकार अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला संघ की सचिव और माकपा माले के पोलित ब्यूरो की सदस्य कविता कृष्णन और राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त अभिनेत्री कंगना रनौत को भी ट्विटर और फेसबुक पर बेहद अप्रिय परिस्थितियों का सामना करना पड़ा.

अभिनेत्री श्रुति सेठ ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के "सेल्फी विद बेटी" अभियान पर ट्वीट क्या किया उनकी शामत ही आ गयी. उन्हें वेश्या और कुतिया कहकर संबोधित किया गया. दुखी और नाराज सेठ ने अपने ट्वीट हटा लिये. हालांकि बाद में उन्होंने एक खुला खत लिखकर अपनी बात रखी.

इसी तरह राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी को फेसबुक पर पार्थ मंडल नामक एक व्यक्ति ने अश्लील संदेश भेजने शुरू कर दिये. शर्मिष्ठा ने स्क्रीन शॉट्स के साथ इस विषय पर एक लंबी पोस्ट लिखी.

ये नाम तो महज बानगी हैं. इंटरनेट की दुनिया में महिलाओं पर भद्दी टिप्पणियों का सिलसिला, उन्हें जान से मारने और उनका बलात्कार करने की धमकियां देना आम होता जा रहा है. सोशल मीडिया का एक और बुरा पक्ष है महिलाओं के इनबॉक्स में घुसकर ताकाझांकी करना.

यह गंदा चलन पूरी दुनिया में बहुत तेजी से पांव पसार चुका है. इंटरनेट पर की जा रही बकवास के लिए कुछ लोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देते हैं जो कतई सही नहीं है. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कानून किसी को जान से मारने या बलात्कार करने की धमकी की इजाजत नहीं देता.

शायद यही वजह थी कि केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी को गृह मंत्रालय से यह मांग करनी पड़ी कि वह सोशल मीडिया पर महिलाओं के साथ हो रही अभद्रता से निपटने के लिए कानून बनाने की दिशा में पहल करे. उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि महिलाओं के खिलाफ टीका-टिप्पणी या उनकी ट्रोलिंग करने वाले किसी भी व्यक्ति को माफ नहीं किया जाना चाहिए.

बरखा दत्त, शर्मिष्ठा मुखर्जी, श्रुति सेठ, कंगना रनौत, साइना नेहवाल को भी ट्रोलिंग का शिकार होना पड़ा.

सोशल मीडिया पर महिलाओं को परेशान करने, उनका पीछा करने का सिलसिला दुनिया भर में बढ़ता जा रहा है. ऐसा भी नहीं है कि आपको तभी ट्रोल किया जायेगा जब आपकी कोई बात नागवार गुजरेगी. इंटरनेट और सोशल मीडिया पर हैरेसमेंट के कई चेहरे हैं. आज अभी इस वक्त जब मैं यह आलेख लिख रही हूं तब मेरा फेसबुक इनबॉक्स सैंकड़ों अपरिचित लोगों की हाय-हैल्लो से भरा हुआ है. वहां अनगिनत एकतरफा ऐसे संदेश भरे हुए हैं जिनके पीछे प्रेम निवेदन छिपे हुए हैं. ऐसे तमाम संदेशों को जवाब न देने पर अभद्र बातों का इस्तेमाल भी किया जाता है. क्योंकि पुरुषवादी अहंकार चोटिल होता है.

अमेरिका के प्यू रिसर्च सेंटर के एक हालिया अध्ययन के मुताबिक इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले 40 प्रतिशत लोगों को कभी न कभी परेशान किया जाता है. जबकि महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा 60 फीसदी से अधिक है.

सर्वे के मुताबिक इंटरनेट पर पीछा करने और सेक्सुअल हैरसमेंट की घटनायें युवा स्त्रियों के साथ ही होती हैं. सर्वे बताता है कि 25 से 29 आयुवर्ग की महिलाओं की तुलना में 18 से 24 साल की युवतियों के साथ ऐसी वारदातें दोगुनी से भी अधिक होती हैं.

ट्रोलिंग

नए दौर की शब्दावली में ट्रोलिंग सबसे प्रचलित शब्द है. अर्बन डिक्शनरी के मुताबिक ट्रोलिंग वह प्रक्रिया है जहां इंटरनेट पर कुछ लोग आपको न केवल अपमानित करते हैं बल्कि वे समूह बनाकर आपका शिकार करने की कोशिश करते हैं. मजाक से शुरू होकर, ओछी टिप्पणियों और धमकियों तक यह ट्रोलिंग कई स्तरों पर हो सकती है. गंदे नामों से पुकारने के अलावा एकदम पीछे पड़ जाना और यहां तक कि यौन हमले और जान से मारने की धमकी तक यहां कुछ भी हो सकता है.

ट्रोलर्स का मददगार ट्विटर

दुनिया की तमाम सोशल मीडिया साइट्स में से ट्विटर एक ऐसी साइट है जो आज भी अपने ग्राहकों को एनानिमस यानी बेनाम-बेचेहरा रहने की सुविधा देता है. यह पीठ पीछे बात करने वाले लोगों के लिए अपने आप में एक बहुत बड़ा हथियार बनता है.

मशूहर मनोचिकित्सक रूमा भट्टाचार्य से हमने सोशल मीडिया पर महिलाओं की ट्रोलिंग विषय पर बात की तो उन्होंने कहा कि अनुशासन की कमी, अपनी पहचान छिपाने की सुविधा और बिना सामने आए मुंहफट तरीके से कोई भी बात बोल देने की सुविधा ने ऐसे ट्रोलर्स को हौसला दिया है.

इस सुविधा के चलते ट्विटर पर कोई भी व्यक्ति बहुत आसानी से किसी सेलिब्रिटी या अन्य व्यक्ति को निशाना बना सकता है. ट्विटर पर आप ज्यादा से ज्यादा किसी व्यक्ति की हरकतों को रिपोर्ट कर सकते हैं. ऐसे मामलों में भी यह माइक्रो ब्लॉगिंग साइट कोई कदम उठाने में लंबा वक्त लेती है. इसलिए बेहतर विकल्प यही है कि ऐसे लोगों को ब्लॉक कर दिया जाये.

वर्ष 2014 में अमेरिकी मनोवैज्ञानिकों एरिन बकल्स, पॉल टैपनेल्स और डेलरॉय पालहस ने अपने अध्ययन में पाया कि ट्रोलिंग करने वाले परपीड़क, पुरुषवादी मानसिकता से ग्रस्त और मनोवैज्ञानिक समस्या से जूझ रहे लोग होते हैं.

अध्ययन में कहा गया कि जरूरी नहीं कि ये लोग आपराधिक प्रवृत्ति के ही हों. गुमनाम रहने की ताकत इनको हौसला देती है. प्यु रिसर्च सेंटर के शोध के मुताबिक 92 फीसदी इंटरनेट उपयोगकर्ता यह मानते हैं कि ऑनलाइन माहौल लोगों को एक दूसरे के प्रति अधिक कटु और आलोचनात्मक बनाता है. गुमनाम रहने की ताकत ट्रोलर्स को सामान्य आलोचना से आगे बढक़र दूसरों को परेशान करने की ताकत देती है.

लेकिन आखिरकार ट्रोलर्स भी मनुष्य ही होते हैं और यह बात कई बार साबित भी होती है. लेखिका लिंडी वेस्ट ने जब अपने एक ट्रोलर की क्रूरता के बारे में लंबी सार्वजनिक चर्चा की तो अंतत: उसने ईमेल करके उनसे माफी मांगी. बाद में एक टीवी शो में दोनों की मुलाकात भी हुई जहां उसने अपनी हरकतों को सार्वजनिक रूप से साजा किया.

16 दिसंबर महिलाओं के अधिकारों का दिन बन गया है. पर इसे रस्मी दिन बनाने की बजाय वास्तविक बदलाव का दिन बनाना बहुत जरूरी है. निर्भया की मौत का कर्ज और किसी तरह से चुकाया नहीं जा सकता. यह भी विडंबना है कि आज 16 दिसंबर की बरसी के मौके पर दिल्ली में एम्स के पास एक और लड़की के साथ चलती कार में बलात्कार हुआ है. चार साल बाद तारीख बता रही है कि हम जहां से चले थे वहीं खड़े हैं.

First published: 16 December 2016, 12:43 IST
 
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