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निदा फ़ाज़ली: तुम ये कैसे जुदा हो गए हर तरफ़ हर जगह हो गए

सुधाकर सिंह | Updated on: 8 February 2017, 13:39 IST

तुम ये कैसे जुदा हो गए, हर तरफ़ हर जगह हो गए...यह नज़्म सुनते ही निदा फ़ाज़ली का नाम हमारे दिलो-दिमाग़ पर छा जाता है. अदबी जमात की वह फ़नकार जिनकी ग़ज़ल और शायरी ने तमाम लोगों का दिल जीत लिया. सीधे-सादे डाकिये से लेकर बच्चों के स्कूल में दुनिया से मिलाते और रोते हुए बच्चे को हंसाने वाले निदा ने काफ़ी छोटी उम्र से लिखना शुरू कर दिया था. पिछले साल 8 फरवरी को मुंबई में उनका इंतकाल हुआ था.     

दिल्ली में पिता मुर्तुज़ा हसन और मां जमील फ़ातिमा के घर 12 अक्तूबर 1938 को तीसरी संतान ने जन्म लिया. जिसका नाम बड़े भाई के नाम के क़ाफ़िये से मिलाकर मुक़्तदा हसन रखा गया. बचपन ग्वालियर में गुज़रा, जबकि कॉलेज की पढ़ाई 1958 में ग्वालियर के (विक्टोरिया कॉलेज या लक्ष्मीबाई कॉलेज) से पूरी हुई.

साहित्य की जमात में मुक्तदा हसन, निदा फ़ाज़ली के नाम से मशहूर हैं. निदा का अर्थ है स्वर या आवाज़ और फ़ाज़िला क़श्मीर के एक इलाके का नाम है, जहां से निदा के पुरखे आकर दिल्ली में बस गए थे, इसलिए उन्होंने अपने उपनाम में फ़ाज़ली जोड़ा.

निदा ने हमेशा सरल और सादी जुबान में अपनी बात कही. हिन्दू-मुस्लिम क़ौमी दंगों से तंग आकर उनके माता-पिता पाकिस्तान जा के बस गए, लेकिन निदा यहीं भारत में रहे. रोज़ी-रोटी की तलाश में कई शहरों में भटके. उस वक्त बम्बई (मुंबई) हिन्दी/ उर्दू साहित्य का केन्द्र था. 1964 में मुंबई पहुंचे निदा ने धर्मयुग और ब्लिट्ज़ जैसी मैगजीन और अख़बार के लिए लेखन शुरू किया. 

उनकी सरल और प्रभावकारी स्टाइल ने जल्द ही उन्हें सम्मान और लोकप्रियता दिलाई. उर्दू कविता का उनका पहला संग्रह 1969 में छपा. 1998 में उन्हें प्रतिष्ठित साहित्य अकादेमी अवॉर्ड से नवाज़ा गया. एक नज़र उनकी 10 बेहतरीन नज़्मों पर:  

1. कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता 

कहीं ज़मीं तो कहीं आसमां नहीं मिलता

बुझा सका है भला कौन वक़्त के शोले 

ये ऐसी आग है जिसमें धुआं नहीं मिलता

कहां चराग़ जलाएं कहां गुलाब रखें

छतें तो मिलती हैं लेकिन मकां नहीं मिलता

ये क्या अज़ाब है सब अपने आप में गुम हैं

ज़बां मिली है मगर हम-ज़बां नहीं मिलता

2. तुम ये कैसे जुदा हो गये हर तरफ़ हर जगह हो गये

अपना चेहरा न बदला गया आईने से ख़फ़ा हो गये

जाने वाले गये भी कहां चांद सूरज घटा हो गये

3. मुंह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन

आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन

सदियों-सदियों वही तमाशा रस्ता-रस्ता लम्बी खोज

लेकिन जब हम मिल जाते हैं खो जाता है जाने कौन

4. अपना ग़म लेके कहीं और न जाया जाये 

घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाये 

घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें 

किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये

5. अपनी मर्ज़ी से कहां अपने सफ़र के हम हैं 

रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं 

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब 

सोचते रहते हैं कि किस राहगुज़र के हम हैं

6. होश वालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है 

इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िन्दगी क्या चीज़ है

उन से नज़रें क्या मिली रोशन फिजाएं हो गईं 

आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है

ख़ुलती ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शायरी 

झुकती आंखों ने बताया मयकशी क्या चीज़ है

हम लबों से कह न पाये उन से हाल-ए-दिल कभी 

और वो समझे नहीं ये ख़ामोशी क्या चीज़ है 

7. मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार 

दुख ने दुख से बात की बिन चिठ्ठी बिन तार 

छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार 

आंखों भर आकाश है बाहों भर संसार

सपना झरना नींद का जागी आंखें प्यास 

पाना खोना खोजना सांसों का इतिहास 

चाहे गीता बाचिये या पढ़िये क़ुरान 

मेरा तेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान

8. जितनी बुरी कही जाती है उतनी बुरी नहीं है दुनिया

बच्चों के स्कूल में शायद तुम से मिली नहीं है दुनिया.

चार घरों के एक मोहल्ले के बाहर भी है आबादी

जैसी तुम्हें दिखाई दी है सब की वही नहीं है दुनिया.

9. मलाला मलाला

आंखें तेरी चांद और सूरज

तेरा ख़्वाब हिमाला...

वक़्त की पेशानी पे अपना नाम जड़ा है तूने

झूठे मकतब में सच्चा क़ुरान पढ़ा है तूने 

अंधियारों से लड़ने वाली

तेरा नाम उजाला.... मलाला मलाला

स्कूलों को जाते रस्ते ऊंचे नीचे थे

जंगल के खूंखार दरिन्दे आगे पीछे थे

मक्के का एक उम्मी तेरी लफ़्ज़ों का रखवाला....मलाला मलाला

तुझ पे चलने वाली गोली हर धड़कन में है

एक ही चेहरा है तू लेकिन हर दर्पण में है

तेरे रस्ते का हमराही, नीली छतरी वाला, मलाला मलाला.

10. हर तरफ़ हर जगह बे-शुमार आदमी

फिर भी तन्हाइयों का शिकार आदमी

सुब्ह से शाम तक बोझ ढोता हुआ

अपनी ही लाश का ख़ुद मज़ार आदमी

हर तरफ़ भागते दौड़ते रास्ते

हर तरफ़ आदमी का शिकार आदमी

रोज़ जीता हुआ रोज़ मरता हुआ

हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी

घर की दहलीज़ से गेहूं के खेत तक

चलता फिरता कोई कारोबार आदमी

ज़िंदगी का मुक़द्दर सफ़र-दर-सफ़र

आख़िरी सांस तक बे-क़रार आदमी. 

साभार: कविता कोश और रेख़्ता

रचनाएं

आंखों भर आकाश, मौसम आते-जाते हैं, खोया हुआ सा कुछ, लफ़्ज़ों के फूल, मोर नाच, आंख और ख़्वाब के दरमियां, सफ़र में धूप तो होगी.

First published: 8 February 2017, 13:39 IST
 
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