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पद्मावती विवाद: रानी पद्मिनी का आईना-ए-अकबरी में भी जिक्र

सुधाकर सिंह | Updated on: 28 January 2017, 14:54 IST
(प्रतीकात्मक तस्वीर)

संजय लीला भंसाली की फिल्म पद्मावती को लेकर विवाद गरमा गया है. फिल्म का विरोध कर रही राजपूत करणी सेना के मुताबिक ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ की गई है. वहीं कई इतिहासकारों का मानना है कि पद्मिनी एक काल्पनिक चरित्र है, जिसका जिक्र मलिक मुहम्मद जायसी की रचना पद्मावत में मिलता है. 

मशहूर इतिहासकार इरफान हबीब के मुताबिक पद्मावती का इतिहास में 1540 से पहले कोई उल्लेख नहीं मिलता है. हबीब का कहना है कि राजस्थान को आधार बनाकर जायसी ने एक रोमांटिक उपन्यास पद्मावत लिखा था. वहीं करणी सेना का कहना है कि पद्मावती फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी और पद्मिनी के प्रेम प्रसंग को दिखाया गया है, जो इतिहास से छेड़छाड़ है. 

राजपूताना (वर्तमान राजस्थान) के बारे में काफ़ी अध्ययन कर चुके अंग्रेज इतिहासकार जेम्स टॉड (1782-1835 ईसवी) ने हालांकि अलाउद्दीन के चित्तौड़गढ़ पर हमले और पद्मिनी के जौहर का स्पष्ट उल्लेख किया है.

राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में रानी पद्मिनी का महल स्थित है.

पद्मावत का उत्तरार्द्ध ऐतिहासिक

जायसी के महाकाव्य पद्मावत में कुल 57 खंड हैं, जिसमें पद्मावती और रत्नसेन की लौकिक प्रेम कहानी है. जायसी खुद लिखते हैं कि उन्होंने पद्मावत की रचना 927 हिजरी में शुरू की. मलिक मुहम्मद जायसी के पद्मावत में वर्णित सम्पूर्ण घटनाक्रम को दो हिस्सों में बांटा जा सकता है.

पूर्वार्द्ध में रत्नसेन की सिंहलद्वीप यात्रा से लेकर चित्तौड़ लौटने तक हम कथा का पूर्वार्ध मान सकते हैं. पूर्वार्ध एक कल्पित कहानी है. जबकि उत्तरार्द्ध राघव के निकाले जाने से लेकर पद्मिनी के सती होने तक ऐतिहासिक आधार पर है.

अंग्रेज इतिहासकार जेम्स टॉड के मुताबिक अलाउद्दीन खिलजी ने संवत 1346 में एक बार फिर चित्तौड़गढ़ पर चढ़ाई की. इसी दूसरी चढ़ाई में राणा रतन सिंह अपने ग्यारह पुत्रों सहित मारे गए. जब राणा के ग्यारह पुत्र मारे जा चुके और स्वयं राणा के युद्धक्षेत्र में जाने की बारी आई तब पद्मिनी ने जौहर किया. 

चित्तौड़गढ़ किले के भीतर स्थित कुंड जिन्हें रानी पद्मिनी और राजपूत स्त्रियों के द्वारा जौहर में इस्तेमाल करने का दावा है.

अंग्रेज इतिहासकार टॉड का वृत्तान्त

टॉड का दावा है कि कई सौ राजपूत ललनाओं के साथ पद्मिनी ने चित्तौड़गढ़ के उस गुप्त भूधारे में प्रवेश किया जहां उन सती स्त्रियों को अपनी गोद में लेने के लिए आग दहक रही थी. इधर यह कांड समाप्त हुआ उधर वीर भीमसी (रतन सिंह) ने रणक्षेत्र में शरीर त्याग किया. टॉड ने जो वृत्तान्त दिया है वह राजपूताने में रक्षित चारणों के इतिहासों के आधार पर है.

ठीक यही वृत्तान्त 'आईना-ए-अकबरी' में दिया हुआ है. 'आईना ए अकबरी' में भीमसी के स्थान पर रतनसी (रत्न सिंह या रत्नसेन) नाम है.

इन दोनों ऐतिहासिक वृत्तान्तों के साथ जायसी द्वारा वर्णित कथा का मिलान करने से कई बातों का पता चलता है. पहली बात तो यह कि जायसी ने जो 'रत्नसेन' नाम दिया है यह उनका कल्पित नहीं है, क्योंकि प्राय: उनके समसामयिक या थोड़े ही पीछे के ग्रन्थ 'आईना-ए-अकबरी' में भी यही नाम आया था. यह नाम जरूर इतिहासकारों में प्रसिद्ध था.

जायसी ने रत्नसेन का मुस्लिम शासक के हाथों मारा जाना न लिखकर देवपाल के साथ द्वन्द्वयुद्ध में कुम्भलनेरगढ़ के नीचे मारा जाना लिखा है. उसका आधार शायद विश्वासघाती के साथ बादशाह से मिलने जाने वाला वह प्रसंग हो, जिसका उल्लेख आईना-ए-अकबरी के रचनाकार अबुल फजल ने किया है.

First published: 28 January 2017, 14:54 IST
 
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