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'जिन्ना का नहीं, जिया के ख्वाबों का पाकिस्तान बन रहा है'

अभिषेक रंजन सिंह | Updated on: 27 April 2016, 8:03 IST
QUICK PILL
पाकिस्तान के मशहूर लेखक मुबारक़ हैदर की किताब ‘तालिबान: द टिप ऑफ ए हॉली आइसबर्ग’ इन दिनों काफी सुर्खियों में है. उर्दू में अनुदित इस किताब का नाम ‘तहजीबी नर्गिसियत’ है. तहरीक़-ए-तालिबान समेत कई दहशतगर्द तंजीमों की ओर से उन्हें लगातार धमकियां मिल रही हैं, इसके बावजूद उन्होंने सच कहने की हिम्मत बनाए रखी है. फिलहाल वे दहशतगर्दों के खतरे के कारण ब्रिटेन में रह रहे हैं. कराची से छपने वाले डॉन, फ्राइडे टाइम्स, जंग और नवा-ए-वक़्त जैसे अख़बारों में उनके आलेख नियमित रूप से प्रकाशित होते रहे हैं. पाकिस्तान में न्यायपालिका, मीडिया और महिलाओं पर होने वाले हमलों समेत वहां के सियासी हालात पर अभिषेक रंजन सिंह की उनसे हुई विस्तृत बातचीत के मुख्य अंश:

हैदर साहब, आपकी किताब में ऐसी क्या बातें लिखी गईं हैं, जिसे लेकर पाकिस्तान में ख़ासी चर्चा हो रही है?

पाकिस्तान आज जिस दौर से गुजर रहा है, उसे लेकर पूरी दुनिया चिंतित है. मैंने अपनी किताब में उन्हीं बातों का जिक्र किया है, जिससे वहां की अवाम हर दिन दो-चार है. पिछले पंद्रह-बीस सालों के दरम्यान हमारा मुल्क कट्टरवाद की भेंट चढ़ गया है. दहशतगर्दी और इंतिहापसंदी इस क़दर फैल चुका है कि वहां आज़ाद ख्याली की बात करना ख़तरे से खाली नहीं रह गया है.

पाकिस्तान क़ायम होने के बाद वहां क्या-क्या तब्दीलियां आईं और गुजिस्ता दिनों में वहां किस तरह तालिबान जैसी दहशतगर्द तंजीमें अपनी जड़ें मजबूत कर पाईं, इस बारे में मैंने अपनी किताब 'तहजीबी नर्गिसयत' में तफ्सील से लिखा है. पाकिस्तान में भी यह किताब खूब पसंद की गई हैं और यह बेस्ट सेलर साबित हुई हैं. पाकिस्तान को मैंने पहले जिस शक्ल में देखा और आज जो पाकिस्तान हमारे सामने है, उसकी कहानी बयां करती है यह किताब.

कहा जा रहा है कि इस किताब में आपने तहरीक़-ए-तालिबान और आईएसआई के बारे में तल्ख़ टिप्पणी की हैं, क्या इसे लेकर कभी आपको ख़ौफ़ महसूस हुआ?

पाकिस्तान की सूरत-ए-हाल पर मैंने जो लिखा है और आइंदा दिनों में जो लिखूंगा उसे लेकर मुझे कभी कोई डर महसूस नहीं हुआ. ज़्यादा से ज़्यादा वे लोग ( दहशतगर्द) मेरी हत्या कर सकते हैं, इससे ज़्यादा उनके इख्तियार में कुछ नहीं है. मुल्क में कितनी आवाज़ों को ख़ामोश करेंगे ऐसे लोग. मेरा मानना है कि पाकिस्तान का आम शहरी तरक्कीपसंद हैं और अब वह धीरे-धीरे इंतिहापसंदी के ख़िलाफ़ एकजुट हो रहा है.

पाकिस्तान में तरक्कीपसंद पत्रकारों पर भी लगातार हमले हो रहे हैं, आख़िर इन हमलों की वजह क्या हैं ?

पाकिस्तान में न सिर्फ पत्रकारों को, बल्कि अदालतों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और औरतों पर भी हमले हो रहे हैं. पत्रकारों की हालत वहां वाकई चिंताजनक है. पहले यह माना जाता था कि पत्रकारों पर होने वाले हमलों के पीछे तालिबान और कट्टरपंथी संगठन शामिल हैं, लेकिन यही अकेली सच्चाई नहीं है, क्योंकि अब फौज और आईएसआई भी पत्रकारों पर हमले करवा रही है.

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पाकिस्तान में मीडिया का एक तबका ऐसा भी है, जो परोक्ष रूप से तालिबान और आईएसआई की हिमायत करता है. सच पूछें, तो आज न तो पाकिस्तान की अवाम सुरक्षित हैं और न ही वहां का सरकारी प्रतिष्ठान. एक-एक दिन अगर सलामती से गुजर जाए, तो यह बड़ी बात है.

कई लोगों का मानना है कि तहरीक़-ए-तालिबान को वहां की सियासी पार्टियों का भी समर्थन हासिल है?

अगर तालिबान को सियासी दलों का समर्थन नहीं मिल रहा होता, तो वह इतनी मजबूत स्थिति में नहीं होती. जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के नेता मौलाना फजलुर्रहमान और इमरान ख़ान की कयादत वाली तहरीक़-ए इंसाफ़ पार्टी ने तो हमेशा तालिबान की हिमायत की है. पाकिस्तान में आज भी ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो इस्लाम के नाम पर जनरल ज़िया उल हक़ की उन नीतियों को पसंद करते हैं, जिससे मुल्क की बर्बादी की नींव रखी. शहरों के मुक़ाबले गांवों में तालिबान की हिमायत करने वालों की संख्या अधिक है. आईएसआई और सेना में भी ऐसे लोग हैं, जो इनका समर्थन करते हैं. हालांकि पढ़ा-लिखा नौजवान, सोशल मीडिया के ज़रिए तालिबान की नीतियों की निंदा करता है.

क़ायद-ए-आज़म मुहम्मद अली जिन्ना आज के पाकिस्तान में कितने प्रासंगिक हैं?

जिन्ना के सपनों का पाकिस्तान आज कहीं नज़र नहीं आता, बल्कि जनरल जिया के सपनों का पाकिस्तान आज ज़रूर देखा जा सकता है. लाहौर, जिसे कभी बेहद प्रोगेसिव सिटी माना जाता था, वहां भी आज़ाद सोच रखने वालों के लिए स्थिति ख़तरनाक है. कॉलेज और यूनीवर्सिटी में तो बहस की परंपराएं ख़त्म होती जा रही हैं. यह एक दिन में नहीं हुआ, बल्कि पाकिस्तान धार्मिक कट्टरता की भेंट चढ़ जाए, इसके लिए काफी पहले से कोशिशें की जा रही हैं.

ईश निंदा क़ानून को लेकर आपकी क्या राय है और इसे लेकर लोगों में इतना ख़ौफ क्यों है?

काफी अहम सवाल आपने पूछा है. मेरे ख्याल से सिर्फ अल्पसंख्यक समुदाय के लोग ही नहीं, बल्कि पाकिस्तान में जो बहुसंख्यक आबादी है, उनके लिए भी यह क़ानून परेशानी का सबब बन गया है. इसी क़ानून में संशोधन के सवाल पर पाकिस्तान के दो बड़े नेता सलमान तासीर और शहबाज़ भट्टी को गोलियों से छलनी कर दिया गया. हैरत की बात यह है कि जिस मुमताज कादरी ने सलमान तासीर की हत्या की, उसे लोगों ने गाज़ी के ख़िताब से नवाज़ा. इन दोनों नेताओं की हत्या आसिया बीबी नामक एक ईसाई महिला के बचाव करने के कारण हुई. आसिया के ख़िलाफ़ ईश निंदा का आरोप है और फिलहाल वह जेल में बंद है. सलमान तासीर और शहबाज भट्टी चाहते थे कि ईश निंदा क़ानून में बदलाव किए जाएं. इस बाबत उन्होंने तत्कालीन राष्ट्रपति आसिफ़ अली जरदारी से भी बात की थी. पाकिस्तान अभी जिस दौर से गुजर रहा है, उसे देखकर नहीं लगता कि मौजूदा सरकार ईश निंदा क़ानून में बदलाव करने का जोखिम उठाएगी.

पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की स्थिति अच्छी नहीं है, लगातार ऐसी ख़बरें आती रहती हैं?

अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचार से जुड़ीं, जो ख़बरें आपको मिलती हैं वह सही है. पाकिस्तान में ईसाईयों की संख्या हिंदुओं से ज़्यादा है. दोनों समुदायों के लोगों को यहां निशाना बनाया जा रहा है. सिंध और बलूचिस्तान से अक्सर ख़बरें आती हैं कि वहां बदमाशों ने हिंदू लड़की को अगवा कर जबरन शादी कर ली या किसी हिंदू व्यापारी को अगवा कर लिया गया और फिरौती की रकम न देने पर उसकी हत्या कर दी गई.

अल्पसंख्यकों पर होने वाले हमलों को समझने की ज़रूरत है. हिंदुस्तान में बाबरी मस्जिद गिराए जाने के बाद वहां हिंदुओं पर जमकर हमले हुए. कई मंदिरों को तोड़ा गया और लोगों की हत्याएं हुईं. फिलहाल अपहरण की कुछ घटनाओं को छोड़ दें, तो हिंदुओं पर ऐसे बड़े हमले नहीं हो रहे हैं.

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हालांकि पाकिस्तान में पिछले कुछ वर्षों से ईसाईयों पर हमले अधिक हो रहे हैं. इसकी वजह कहीं न कहीं अमेरिका है, क्योंकि दहशतगर्दी को ख़त्म करने के नाम पर वह पाकिस्तान के कबायली इलाक़ों में हमले कर रहा है. इसे लेकर लोगों में नाराज़गी है और इसी नाराजगी में आतंकी पाकिस्तान में ईसाइयों पर हमले कर रहे हैं. दूसरी बात पाकिस्तान में ईसाईयों के प्रति बेहद घृणा का भाव भर दिया गया है. फिलहाल पाकिस्तान में जैसी स्थिति है, उसमें अल्पसंख्यकों का जीना दुश्‍वार हो गया है.

भूमि सुधार न होने की वजह से ग्रामीण इलाक़ों में आज भी सामंती प्रथा क़ायम है, आख़िर वहां की सरकार इस दिशा में कोई पहल क्यों नहीं करती?

पाकिस्तान की नेशनल असेंबली और सूबाई सरकारों में वहीं लोग शामिल हैं, जो ख़ुद बड़े ज़मींदार हैं. मुल्क को क़ायम हुए 66 साल हो गए, लेकिन भूमि सुधार की दिशा में कोई भी काम नहीं हुआ है. भुट्टो के जमाने में एक कोशिश ज़रूर हुई थी, लेकिन वह कामयाब नहीं हो सकी.

आपको यह जानकर हैरानी होगी कि बंटवारे के समय यहां जो जागीरें मौजूद थे, उसकी निशानियां आज भी बदस्तूर कायमम हैं. पंजाब, बलूचिस्तान और सिंध में तो कई ऐसे बड़े ज़मीदार हैं, जिनके पास हज़ारों एकड़ ज़मीन हैं. पाकिस्तान की मौजूदा सियासत में जितने भी बड़े चेहरे हैं, वे कहीं न कहीं बड़े ज़मींदार भी हैं. जब यही लोग हुकूमत में हैं, तो भला भूमि सुधार की बात कौन करेगा. भूमि सुधार न होने की वजह से पाकिस्तान के गांव आज भी सैकड़ों वर्ष पीछे है. ज़मींदारों का रवैया ग़रीबों के साथ कैसा रहा है, यह बात किसी से छुपी हुई नहीं है.

भारत में मदरसों में आधुनिक शिक्षा की बहस तेजी पकड़ चुकी है. क्या पाकिस्तान में भी ऐसा कुछ चल रहा है?

पिछले पंद्रह साल में पाकिस्तान में हज़ारों मदरसे खुल चुके हैं. यहां भारत की तरह मदरसों में आधुनिक शिक्षा नहीं दी जाती. यहां के तमाम मदरसों पर तालिबान और कट्टरपंथी संगठनों का दख़ल है. हालांकि, पहले यहां दीनी तालीम के साथ-साथ उन विषयों को भी पढ़ाया जाता था, जिससे बच्चों को भविष्य में रोज़गार मिल सके, लेकिन अब इन मदरसों में रोज़गारपरक शिक्षा का घोर अभाव है.

अरब और खाड़ी के देशों से पाकिस्तान के मदरसों को अरबों डॉलर मिलते हैं. अगर इन पैसों का इस्तेमाल विज्ञान और तकनीकि के क्षेत्र में होता, तो उससे नई पीढ़ी के लोगों को फ़ायदा मिलता. अफसोस वहां ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है.

पाकिस्तान के साहित्य में इन दिनों क्या लिखा जा रहा है ?

फैज अहमद फैज के जमाने से आज की तुलना करें, तो स्थितियां काफी बदल चुकी हैं. जनरल जिया उल हक़ की तानाशाही के ख़िलाफ़ भी तब के साहित्यकारो ने काफी कुछ लिखा-पढ़ा. लेकिन जिया के शासन में साहित्यकारों का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी था, जिसने उसकी शान में कसीदे पढ़ने शुरू कर दिए थे. उस समय चंद ऐसे साहित्यकार थे, जिन्होंने अपने लेखन में जनरल जिया की मुख़ालफत की थी. हालांकि उसी दौर में पाकिस्तानी साहित्य में धर्म आधारित लेखन की परंपरा शुरू हो गई थी.

क्या आपको ऐसा लगता है कि दहशतगर्दी के नाम पर सारे मुसलमानों को जानबूझकर बदनाम किया जा रहा है?

देखिए, यह बड़ा कठिन सवाल है और इसका जवाब भी चंद लफ्ज़ों में नहीं दिया जा सकता. जहां तक दहशतगर्दी का सवाल है, तो इसे किसी भी सूरत में जायज नहीं ठहराया जा सकता. पिछले चौबीस-पच्चीस वर्षों से दहशतगर्दी को लेकर पूरी दुनिया में चर्चा है. ऐसा कोई मुल्क नहीं है, जो इस समस्या से परेशान नहीं है. पाकिस्तान तो पिछले पंद्रह सालों से दहशतगर्दी को झेल रहा है.

हज़ारों बेगुनाह लोगों को अपनी जान गवांनी पड़ी और सैकड़ों लोग अपनी जान बचाने के लिए दूसरे मुल्कों में बस चुके हैं. दहशतगर्दी के नाम पर सभी मुसलमानों को कठघरे में खड़ा करना ग़लत है, लेकिन कट्टरपंथियों की वजह से बेगुनाह मुसलमानों को दहशतगर्दी की तोहमत झेलनी पड़ती है.

मैं एक बात ज़रूर कहना चाहूंगा कि मुसलमानों को कई मामलों में अपना नज़रिया बदलना चाहिए, क्योंकि जमाना काफी बदल चुका है और नए जमाने का साथ चलना वक्त का तकाजा भी है. यह पुरानी सोच है कि कि मुसलमान या तो दारूल इस्लाम में रहते हैं या दारूल हरब में, यानी या तो वह हुकूमत करेंगे, नहीं तो जंग करेंगे. ऐसी बातें उन्हें अपने जेहन से निकाल देनी चाहिए.

First published: 27 April 2016, 8:03 IST
 
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