Home » कल्चर » Pakistanis Come Together To Watch A Play On Bhagat Singh
 

'ना मैं पाकिस्तानी हूं, ना हिंदुस्तानी हूं, मैं भगत सिंह हूं'

शाहनवाज़ मलिक | Updated on: 10 February 2017, 1:48 IST

इस्लामाबाद का मशहूर लोक विरसा ऑडीटोरियम 13 अगस्त की रात 10 बजे नौजवानों के नारों से गूंज रहा था. तकरीबन सात सौ नौजवान यहां शहीद-ए-आज़म भगत सिंह पर बनाई गई डॉक्यूमेंट्री फिल्म की पहली स्क्रीनिंग के लिए जमा हुए थे. फिल्म ख़त्म होने के बाद यहां ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’, ‘भगत सिंह हमारा हीरो है’ जैसे नारे लगाए गए.

यह फिल्म बीबीसी पाकिस्तान के पूर्व संवाददाता हफ़ीज़ चाचड़ और कथक डांसर ज़ैनब डार ने मिलकर बनाई है. फिल्म का नाम है 'इनडेलिबल- भगत सिंह'. फिल्म की स्क्रीनिंग के बाद हफ़ीज़ चाचड़ से कैच की बातचीत में वह आत्मविश्वास से भरे हुए थे. उन्होंने कहा, ‘नौजवानों में भगत सिंह को लेकर ऐसी दीवानगी मैंने इससे पहले नहीं देखी.’

लोक विरसा में जिस वक़्त भगत सिंह की स्क्रीनिंग चल रही थी, उसी दौरान ऑडीटोरियम के दूसरे हिस्से में जिन्ना पर सरकारी प्रोग्राम चल रहा था जहां कुर्सियां ख़ाली थीं.

हफ़ीज़ इस फिल्म को कराची, लाहौर के अलावा भगत सिंह के गांव बंगा में भी प्रदर्शित करने की तैयारी कर रहे हैं. उनका इरादा इसे पाकिस्तान और हिंदुस्तान के विश्वविद्यालों में भी लेकर जाने का है. भगत सिंह से जुड़े दस्तावेज़ों से रूबरू होने के बाद हफ़ीज़ चाचड़ पर उनकी शख़्सियत की झलक साफ़ दिखती है. कैच न्यूज़ से उन्होंने फोन पर कहा, ‘भई मैं ना पाकिस्तानी हूं और ना ही हिन्दुस्तानी, अब तो मैं भगत सिंह हूं.’

फिल्म की शूटिंग के लिए हफ़ीज़ और ज़ैनब 23 मार्च को बंगा गांव पहुंचे. पंजाब प्रांत के फैसलाबाद ज़िले की तहसील ज़ड़ानवाला में बंगा वही गांव है जहां 28 सितंबर 1907 को भगत सिंह पैदा हुए थे. हफ़ीज़ ने बताया कि भगत सिंह की बरसी पर गांव में मेला लगा हुआ था. उनकी याद में दिए जले और लोक गीत गाए गए. बंगा के बाशिंदे इस गांव को भगतपुर कहते हैं लेकिन सरकारी दस्तावेज़ों में इसका नाम अभी भी बंगा ही है. फैसलाबाद बेशक़ नया नाम है. पहले इसे लायलपुर ज़िला कहा जाता था.

यह पहली दफ़ा है कि जब किसी पाकिस्तानी फ़िल्मकार ने भगत सिंह की ज़िंदगी पर फिल्म बनाई है. हफ़ीज़ कहते हैं कि फिल्म का मक़सद पाकिस्तानी नौजवानों को इस शहीद से रूबरू करवाना है. अविभाजित भारत के इस शहीद के बारे में पाकिस्तानी आवाम को कम मालूम है जबकि वह यहीं पैदा हुए और फांसी भी लाहौर में ही दी गई थी.

23 मार्च 1931 को जिस जगह उन्हें फांसी दी गई थी अब वहां एक चौराहा है. पंजाब सरकार ने 1961 में लाहौर सेंट्रल जेल ढहाकर एक रिहाइशी कॉलोनी आबाद कर दी थी और चौराहे का नाम शादमान चौक रख दिया था. फिर सिविल संगठनों की मुहिम पर 2014 में स्थानीय प्रशासन ने इसका नाम बदल कर भगत सिंह चौक कर दिया लेकिन कट्टरपंथी संगठनों की आपत्ति पर अब चौक के नाम का विवाद लाहौर हाईकोर्ट में लंबित है.

गांधी और जिन्ना पर राय अलग लेकिन भगत सिंह से हर किसी को प्यार

भगत सिंह से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज़ जुटाने वाले प्रोफेसर चमनलाल कहते हैं कि पाकिस्तान या हिन्दुस्तान में सरकारों ने भले ही इस महान क्रांतिकारी को नज़रअंदाज़ किया लेकिन दोनों मुल्क़ों की आवाम और ग़ैर-सरकारी तंज़ीमों ने उन्हें हमेशा याद किया है.

2007 में चमनलाल जब पाकिस्तान गए तो भगत सिंह के गांव से पांच किलोमीटर दूर स्थित एक 80 साल के बुज़ुर्ग के घर रुके जहां उन्हें भगत सिंह की तस्वीर टंगी मिली. इसी तरह हिन्दुस्तान के कोने-कोने से चमनलाल ने भगत सिंह के ऐसे 300 बुतों का रिकॉर्ड जमा किया है जिसे जनता ने अपनी मर्ज़ी और ख़ुशी से स्थापित किया है जबकि सरकारों का सारा ज़ोर महात्मा गांधी और नेहरू की मूर्तियों पर रहा.

लेखिका नूर ज़हीर कहती हैं कि 2005 में जब वह पाकिस्तान पहुंचीं तो उन्हें रावी नदी के तट पर ले जाया गया जहां फांसी के बाद भगत सिंह का अंतिम संस्कार किया गया था. नूर ज़हीर के मुताबिक कई संगठन अब भी रावी के तट पर उनकी याद में जमा होते हैं.

चमनलाल कहते हैं कि देश में एक भी यूनिवर्सिटी भगत सिंह के नाम पर नहीं बनी और ना ही कोई एयरपोर्ट उनके नाम पर है. बावजूद इसके भगत सिंह के चाहने वालों की संख्या में कमी नहीं आई. दोनों मुल्क़ों में महात्मा गांधी और जिन्ना को भला-बुरा कहने वाले मिल जाएंगे लेकिन भगत सिंह हर किसी के दिल में बसते हैं. यहां तक कि भगवा संगठन भी उनपर अपना दावा ठोंकते हुए दिख जाते हैं.

कट्टरपंथ का ज़हर और भगत सिंह की ज़रूरत

दोनों मुल्क़ों में कट्टरपंथ और उसका प्रतिरोध साथ-साथ बढ़ रहा है. इसीलिए भगत सिंह शिद्दत से याद किए जाने लगे हैं. हफ़ीज़ चाचड़ की फिल्म भी उसी मुहिम की एक कड़ी है. कुछ साल पहले ही भगत सिंह का संपूर्ण दस्तावेज़ उर्दू में प्रकाशित हुआ है. 

पाकिस्तान के मशहूर पत्रकार और वामपंथी कार्यकर्ता रहे सय्यद सिब्ते हसन ने भगत सिंह के साथी अजय घोष की किताब के महत्वपूर्ण अंशों का तर्जुमा भी किया था. लेखिका ज़ाहिदा हिना अपने लेख में उन्हें पाकिस्तान का सबसे बड़ा शहीद बता चुकी हैं.

First published: 18 August 2016, 1:18 IST
 
शाहनवाज़ मलिक @catchhindi

स्वतंत्र पत्रकार

पिछली कहानी
अगली कहानी